Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

21 जुलाई 1995 की संध्या मेरे लिए बहुत विचित्र मंगलमयी सिद्ध हुई थी। इस दिन मुझे गुरुदेव जी से दीक्षा लेने का शुभ अवसर मिला था। उसी शाम मुझे ध्यान लगा और यौगिक क्रियाएँ स्वतः होने लगी। मैं शुरू से ही विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते अपने आप पर से विश्वास उठ गया। मैं भयभीत एवं परेशान हो गया। गुरुमंत्र का उपयोग न करने का निश्चय किया किन्तु परिणाम बिल्कुल विपरीत था। ध्यान केवल स्मरण करने पर लगने लगा। जब मैंने पूर्ण समर्पण किया तो फिर सब कुछ ठीक तरह से चलता रहा।

मुझे ध्यान के दौरान आनन्द की अनुभूति होती है और आम क्रिया-कलाप में कोई कष्ट नहीं होता बल्कि कभी-कभी ऐसा लगता है, जो कार्य मेरे लिये मुश्किल हो सकता था, सहज में ही हो जाता। यह मेरे लिये एक शोध व कोतूहल का विषय बन चुका है। दीक्षा के पश्चात जो कुछ हुआ, उन घटनाओं का संक्षेप में विवरण देना चाहता हूँ।

मेरा स्वभाव शुरू से ही डरपोक और शर्मिला था, किन्तु अब अपने आप को आत्मविश्वास से पूर्ण महसूस करने लगा हूँ। एक रात घर में सर्प दिखाई दिया, उस समय पर मैंने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए सर्प को एक साधारण लकड़ी के टुकड़े से मार दिया और अग्नि को समर्पित किया। इसका परिणाम अगले दिन सुबह ध्यान के दौरान तक पश्चाताप के साथ मिला। मेरा शरीर बुरी तरह से काँपने लगा और हाथ जोड़कर मानो मैं क्षमा माँग रहा हूँ।

एक रात मुझे ध्यानवस्था में बृहस्पति ग्रह पर हो रही एक क्रांति का दृश्य अनुभव हुआ। एक धरातल पर सारे पिण्डों के टकराने और फिर से उछलकर कुछ दूरी पर गिरने जैसा प्रतीत हुआ। मुझे कुछ शक हुआ कि कहीं यह मेरा भ्रम तो नहीं तो मैंने आँखें खोलकर बाहरी वातावरण को ठीक से निरखा। फिर आँखें बंद होते ही मानो फिल्म फिर से शुरू हो गई। यह दृश्य लगभग एक मिनट का था।

ध्यान के दौरान ही एक स्वर्ण धातु से निर्मित विशालकाय मछली की मूर्ति दिखाई दी जिसका अग्र भाग किसी कबाड़े में दबा दिखाई दिया और यह धरातल पर लगभग 45 डिग्री अंश का कोण बनाती हुई स्थिर अवस्था में दिखाईदी। इसके पीछे कुछ मानवाकृतियाँ दिखाई दी। जिसमें कुछ लोग स्थिर तो कुछ चलते फिरते नज़र आ रहे थे। सब लोग निश्चित और उस मूर्ति से बेखबर प्रतीत होते थे। उन्होंने शरीर पर ढ़ीले-ढ़ाले वस्त्र धारण किये हुए थे। मानो किसी रोमन सभ्यता का परिचायक हो। संध्या का समय जान पड़ता था। किसी भी मानव को पहचाना जाना मुश्किल था। कुछ समय बाद अजीबो गरीब विशालकाय पक्षियों को देखा। जिनकी आकृति कुछ उल्लू व चील से मिलती-जुलती थी। कुछ समय बाद अदृश्य हो गये।

विज्ञान मेरा रूचिकर विषय है। अतः बरमुण्डा त्रिकोण और उड़न तस्तरियांे जैसी शक्तियों को जानने की शुरू से ही जिज्ञासा है। क्योंकि ये दोनों अब तक रहस्य के रूप में सम्पूर्ण मानव जाति के विज्ञान को चुनौती देते हैं। गुरुजी की कृपा रहते यदि मुझे इन अनसुलझे रहस्यों को उजागर करने का अवसर मिला तो मैं अवश्य ही प्रयत्न करूंगा।

मेरी माताजी के पैरों का तेज दर्द एक दिन में गायब हो गया। पैर दबाते-दबाते मंत्र जाप किया जिससे ध्यान में जुड़ गया और विभिन्न प्रकार से प्रहार व दबाव तथा हवा में विभिन्न प्रकार से हाथों की मुद्राएँ धारण करते हुए, लगभग एक घंटे तक ध्यानावस्था में रहा तथा अगले दिन से दर्द कम होता गया। योग के दौरान कभी-कभी मेरा मस्तक पैर को स्पर्श करते हुए मानो किन्हीं नाड़ियों की जाँच कर रहा था। मुझे ठीक तरह से याद नहीं लेकिन मुझे ऐसा आभास हुआ कि रुधिर वाहिनियाँ अन्दर कहीं प्रवाह में रुकावट पैदा कर रही थी। मुझे बहुत से आश्चर्य होते हैं। कभी-कभी तो बिल्कुल भी विश्वास नहीं होता है किन्तु जो मेरे साथ घटित हुआ है, उसे झुठला भी तो नहीं सकता।

नाम – जयराज राव
इलेक्ट्रोनिक्स सर्विस इंजिनियर
जिला-जोधपुर (राज.)

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