Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

संसार का हर परिवर्तन पूर्व निश्चित है।

संसार की यह कहावत कि ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, पूर्ण सत्य है।

       भगवान् श्री कृष्ण ने 11 वें अध्याय के 32-34 श्लोक में स्पष्ट कहा है :-

 

      

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो,लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे,येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥32॥

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून्भुड्.क्ष्व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्र भव सव्यसाचिन्॥33॥

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथ च, कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।

मयाहतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा,युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥34॥

      

       (मैं) लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत हुआ हूँ, जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धालोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे। इससे तूं खड़ा हो और यश को प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। यह सब (शूरवीर) पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं।हे सव्यसाचिन केवल (तू) निमित्तमात्र ही हो जा।।

      

       द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योधाओं को तूं मार, भय मत कर, निःसन्देह (तू) युद्ध में वैरियों को जीतेगा, इस लिए युद्ध कर।

      

       भगवान् के उपर्युक्त उपदेश से स्पष्ट होता है कि यह सारा संसार एक ही परमसत्ता का विस्तृत स्वरूप है। जीव, संसार के हर कार्य में निमित मात्र है। ईश्वर की त्रिगुणमयी माया जीवों को भरमाती हुई अपनी इच्छा से चला रही है। जीव अन्धकार वश झूठे अहम् में आकर जबरदस्ती कर्ता बन बैठता है और इस प्रकार तामसिक वृत्तियों के चक्कर में फंस कर, जन्म-मरण के जाल में हँसा हुआ, दुःख भोग रहा है। स्थिति को और स्पष्ट करते हुए भगवान् ने18 वें अध्याय के 61 वें श्लोक में कहा है :-

      

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति।।

भामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।61॥

      

       हे अर्जुन ! शरीर रूपी यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से भरमाता हुआ, सब भूत प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। ऐसी स्थिति में भी जीव अपने अन्दर विराजमान उस परमसत्ता की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार के अभाव में जन्म-मरण के चक्कर में फंस कर भंयकर दुःख भोग रहा है। इस युग में सभी आराधनाएँ बहिर्मुखी हैं, ऐसी स्थिति में ईश्वर का दर्शन और प्रत्यक्षानुभूति असम्भव है।

      

       तोते की तरह धार्मिक ग्रन्थों को रटने से कुछ भी लाभ होने वाला नहीं है। जब तक जीव, तत्त्व से उस परमसत्ता को नहीं पहचानता है, कुछ भी लाभ होना असम्भव है। गीता रूपी ज्ञान के अमृत का भी पान करने की स्थिति में जीव आज नहीं है ऐसी स्थित स्पष्ट करती है कि संसार पूर्ण रूप से तामसिक वृत्तियों से घिर चुका है। सात्त्विक वृत्तियों का लोप प्रायः हो जाना स्पष्ट संकेत है कि संसार में आमूलचूल परिवर्तन होने वाला है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि अब संसार से तामसिक वृत्तियों का अन्त होने वाला है। जितने आध्यात्मिक गुरु, इस समय संसार में है, पहले कभी देखने-सुनने में नहीं आये। परन्तु उनके रहते हुए भी संसार में अन्धकार निरन्तर ठोस होकर जम रहा है। ऐसी स्थिति में संसार का मानव इन गुरुओं पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाये बिना नहीं रह सकता। बेचारे सभी धर्मगुरु, युग के गुण धर्म और काल की गति के प्रवाह में ऐसे फंसे हुए हैं कि वे अपने आपको बचाने में असमर्थ हैं। डूबते हुए व्यक्ति की तरह उल्टे सीधे हाथ पाँव मार रहे हैं। इतिहास बताता है कि संसार में जब-जब भी ऐसी स्थिति पैदा हुई है। उस परमसत्ता ने अवतरित होकर जीवों का कल्याण किया है।

      

       इस बारे में भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के 7 वें और 8वें श्लोक में स्पष्ट घोषणा की है :-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥4:7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥4:8॥

 

 

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

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