Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

मैं बालुसिंह राजुरोहित, धीरदेसर पुरोहितान श्री डूंगरगढ़, चुरू, राज. से हूँं मेरे दीक्षा ग्रहण करने के 8 दिन पूर्व, रात में 4ः00 बजे मैं अपने घर पर कोटड़ी में नींद में सो रहा था, तब अचानक मुझे सद्गुरुदेव सफेद वस्त्र पहने हुए एक अन्य सफेद वस्त्रधारी के साथ खड़े दिखाई दिये।

मैंने कभी गुरुदेव को देखा नहीं था। मेरे बड़े पुत्र ने जिक्र अवश्य किया था, वह गुरुजी से दीक्षित था। गुरु दर्शन के होते ही मेरे शरीर के पीछे वाले हिस्से में बिजली का सा तेज झटका लगा। मैं चैंककर, खड़ा हुआ तो गुरुदेव वहाँ दिखाई देने बंद हो गये। उन दिनों में, गुरुदेव केवल पात्र शिष्य को ही दीक्षा देते थे। मेरे पुत्र ने गुरुजी से दो बार बीकानेर में दीक्षा की इजाजत चाही, परन्तु नहीं मिली तो तीसरी बार पूछा, तब इजाजत मिली। सन् 1991 में वह शुभ दिन मेरे जीवन में भी आया, जब मैंने सद्गुरुदेव से दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा ग्रहण करने के बाद लगातार सुबह-शाम गुरुदेव की तस्वीर का ध्यान और मंत्र का जप निरन्तर करता रहा।

मेरी आयु 67 वर्ष है। मैं लगातार 20 वर्ष से अफीम का सेवन करता था। दीक्षा के दो माह बाद अफीम से नशा आना स्वतः ही बंद हो गया तथा अफीम लेना बंद कर दिया। अब अफीम छोड़े मुझे तीन वर्ष हो गये हैं। अफीम छोड़ने के बाद एक-आध बार जब मैंने फिर खाया तो शरीर में तकलीफ हुई, शरीर भारी, माथे में गैस, शरीर में तनाव, थकान महसूस होने लगी, अब मैं नशे से पूर्ण मुक्त हूँ। खान-पान में बदलाव- दीक्षा प्राप्त करने से पहले मुझे स्वादिष्ट मसालेदार भोजन पसन्द था। अब ऐसा भोजन खाने से तुरन्त शरीर में गड़बड़ हो जाती है तथा ऐसा भोजन पसन्द है जो शरीर में ठण्डक पैदा करता हैं जैसे- घी, दूध, छाछ, राबड़ी आदि। व्यवहार एवं स्वभाव में परिवर्तन- पहले मैं सांसारिक चिन्तन में मस्त रहता था, दूसरों को परास्त करने में पड़ा आनन्द आता था। अब ऐसा नहीं रहा। अब मुझे दूसरों की भलाई करने तथा ईश्वर के नाम जप में ही आनन्द आता है। दिन-रात प्रभु नाम की रट लगी रहती है। गृहस्थ जीवन के सभी काम करता हूँ। मेरे परिवार के सभी सदस्य दीक्षित हैं। ज्यादातर घर से बाहर रहते हैं। जब वे घर आते हैं तो उनसे बातचीत गुरुदेव के बारे में ही होती रहती है तो बड़ा आनन्द आता है तथा गुरुदेव से दीक्षित शिष्य जो चेतन होते हैं, उनसे जब बात करता हूँ, वे मेरे परिवार जैसे लगते हैं।

मेरे सभी पुत्र श्री सद्गुरुदेव जी के इस मिशन (संस्था) में पूर्ण रूप से समर्पित होकर कार्य कर रहे हैं। पहले मेरे पुत्र धन कमाकर लाते थे तब जो खुशी होती थी, उससे कितने ही गुना अधिक खुशी अब उनके इस मिशन में कार्य करने से मुझे होती हैं। क्योंकि इस मिशन का कार्य करना ही सबसे अमूल्य धन हैं, ऐसा मेरा मानना हैं।

एक दिन प्रातः ध्यान करके उठा, फिर ध्यान लग गया और मुझे तेज नीला प्रकाष पुंज बिखेरते  हुए- एक पुरुष के दर्शन हुए। यह कैसा था? मैं वर्णन नहीं कर सकता। इतना कह सकता हूँ कि ऐसा सुन्दर पुरुश मैंने संसार में कभी नहीं देखा तथा उसके दर्शन से मेरा मन आनन्द से विभोर हो उठा- थोड़ी देर बाद यह दृष्य गायब हो गया। मैं इसे और देखने को व्याकुल हो उठा, मगर वह नहीं दिखाई दिया। ध्यान में और भी विचित्र-विचित्र दृष्य, वृक्ष, हरियाली, प्रकाश, अथाह जल आदि दिखाई देता हैं। 1992 में जामसर भण्डारे के अवसर पर गया था। वहाँ गुरुदेव से प्रार्थना की थी, कि जो मुझे प्राप्त है उससे संतुष्ट हूँ, मगर ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन की इच्छा है।

इस प्रार्थना के चार दिन बाद मेरे ललाट जहाँ तिलक-बिंदी लगाते हैं,वहाँ से एक शक्ति रेंगती हुई, कभी बिजली सी चमकती हुई सरसराहट की अनुभूति के साथा मस्तिष्क पर चढ़ गयी तथा शिखा वाले स्थान से ऊपर निरन्तर चलती रहती है। यह शक्ति तब से लेकर अब तक निरन्तर चलती रहती है, मैं किसी दूसरे व्यक्ति से बातचीत करता हूँ, उस समय भी यह क्रिया चलती रहती है। जब गुरुदेव के पास जाता हूँ तो यह अनुभूति बड़ी तेज हो जाती है।

मेरा चित शांत, क्रोध कम हो गया तथा मन में बड़ी तसल्ली रहती है।  मेरी इच्छा यह है कि जल्दी से जल्दी ईश्वर के दर्शन करूँ तथा दूसरे सारे लोग भी इस आराधना को करें।

मेरा गुरुदेव में विश्वास इतना है कि बस गुरुदेव……. बाकी कुछ नजर नहीं आता हैं और इतना विश्वास रखता हूँ कि  गुरुदेव, ईश्वर के दर्शन निश्चित रूप से करवा देंगे।

नाम – बालुसिंह राजपुरोहित
धीरदेसर पुरोहितान
श्री डूंगरगढ़, चुरू, राज.
संदर्भ-‘राजकुल संदेश’
15 सितम्बर 1994

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