Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

आध्यात्मिक जीवन के अंतरंग क्षण

        2 फरवरी 1995 को पहली बार मैं ‘‘अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र, जोधपुर आश्रम’’ गया और वहाँ मौजूद गुरुभाईयों के आग्रह पर वहीं ध्यान लगाया। वहाँ मुझे यौगिक क्रियाएँ शुरु हो गई और मेरा सारा शरीर घूमने लगा। जबकि मुझे यह मालूम था कि उन दिनों गुरुदेव मुम्बई में हैं। मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि मैंने अब  तक ना तो गुरुदेव को देखा है, ना ही उनसे मिला हूँ फिर यह सब कैसे हुआ? मेरी जिज्ञासा और बढ़ने लगी। मैंने निरन्तर ध्यान लगाना शुरू किया और आश्चर्य की बात है कि दीक्षा लिये बगैर मुझे सारी यौगिक क्रियाएँ हुई।

        यहाँ मैं इस बात का जिक्र करना उचित समझता हूँ कि मुझे 1991 के शुरू से ही फिस्टुला (Fistula) की तकलीफ थी। मैंने एक बार एक प्राइवेट डाॅक्टर से आॅपरेशन भी करवाया था, मगर कुछ ही समय बाद पुनः तकलीफ हो गई थी। जून 1992 से मैंने एक काबिल होम्यौपैथिक डाॅक्टर से अपना इलाज शुरू किया था जो कि दीक्षा लेने के पूर्व तक चल रहा था। इस लम्बे समय में मैंने ‘‘मिर्ची’’ का प्रयोग बिल्कूल बन्द कर दिया था।

        इस छोटी सी उम्र में ऐसी बीमारी को लेकर मैं परेशान था। मेरी शुरू से ही यह धारणा रही है कि सही दीक्षा मनुष्य को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से पूर्ण बनाती है। अतः मैंने 2 फरवरी 1995 से स्वतः ही सारी दवाईयाँ बन्द कर दी और आज तक मुझे कोई तकलीफ नहीं है और अब कोई परहेज की आवश्कता भी नहीं है।

        गुरुदेव के उस समय मुम्बई में होने की वजह से मुझे तुरन्त दीक्षा नहीं मिली। मगर मैंने दृढ़ निश्चय से और पूर्ण समर्पण भाव से गुरुदेव को अपना गुरु मान के ध्यान शुरू किया। मुझे शुरुआत में कुछ यौगिक क्रियाएँ हुई और मेरी लम्बी बीमारी मात्र 15-20 दिनों में ठीक हो गई। इसके बाद मुझे प्राणायाम होने लगा, कभी दांई नासिका से तो कभी बांई नासिका से और कभी-कभी दोनों से। प्राणायाम कभी तो एकदम तेज हो जाते तो कभी एकदम शांत।

        मैं चाहकर भी सब कुछ रोक नहीं पाता। उसके बाद पातंजलि योगदर्शन मंे वर्णित बन्ध, जैसे- मूलाधार बंध, उड्डियान बंध और जालन्धर बंध लगने लगे। तेज श्वास के साथ पूरा सीना भरने लगा और फिर स्वतः ही छूट जाती। जितनी देर श्वास रुकती, मुझे तेज प्रकाष पुँज दिखने लगा। जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है तेज प्राणायाम से श्वास  ‘‘सुषुमना’’ में बहती है और ध्यान लगता है। बहुत जल्दी ही यह सब क्रियाएँ होने लगी जबकि अब तक मैंने दीक्षा भी नहीं ली थी। जिससे मेरी जिज्ञासा और बढ़ी और मैं गुरुदेव से मिलने को व्याकुल हो उठा।

        इन्हीं दिनों गुरुदेव होली के अवसर पर अपने गाँव जाने के लिये मुम्बई से जोधपुर आये और यहाँ कुछ घण्टों के लिये रुके। मुझे पहली बार 15 मार्च, 1995 को गुरुदेव से साक्षात् मिलने का अवसर मिला, मगर समय के अभाव से ज्यादा वार्तालाप नहीं हुआ और सिर्फ चरण स्पर्श का मौका मिला। उस दिन चरण स्पर्श करते समय, मुझे जो अनुभूति हुई, उसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है। मुझे लगा कि ‘‘मैं शरीर से बाहर आ गया हूँ’’ और अपने आप को एकदम हल्का महसूस किया। कुछ क्षण के लिये मैं जैसे अपने होश ही खो बैठा। गुरुदेव ने तुरन्त ही अपने स्पर्श से मुझे चेतन किया और मुस्कराने लगे। मेरे पूछने पर बताया कि 16 मार्च 1995 को अनुपगढ़ (श्रीगंगानगर) में दीक्षा का कार्यक्रम है।

        घर में लम्बे विचार विमर्श के बाद मैं अपने एक अंतरंग मित्र को लेकर ‘‘अनुपगढ़’’ गया और वहीं हमने दीक्षा ली। दीक्षा लेने के बाद वहीं ध्यान लगाया तो मुझे महसूस हुआ कि ‘‘अब तक मैं अधुरा था और आज मेरा पुनः जन्म (द्विज)हुआ है।’’ वहीं पर मुझे तेज गति से प्राणायाम होने लगा।

        मैंने नियमित ध्यान शुरू किया और आज तक मेरी एकाग्रचितता बढ़ती जा रही है। दीक्षा के कुछ ही दिनों बाद अजपा जाप शुरू हो गया और अब मेरे अन्दर हर पल हलचल रहती है।

        दीक्षा के बाद एकदम से ‘‘कुम्भक’’ लगने लगा और पेट अन्दर की ओर जाता महसूस हुआ। मूलाधार से सारा शरीर ऊपर की ओर उठने लगा। मेरे अन्दर से ‘‘कफ’’ निकलने लगा। यह सत्य है कि ‘‘बात-पित-कफ’’ के असन्तुलन से ही शरीर की ज्यादातर बीमारियाँ होती हैं। मुझे लगा कि मेरे अन्दर से कोई इनकी अनावश्यक मात्रा को निकाल कर, बाहर कर रहा है। इसके बाद मेरी दोनों आँखें पूर्ण रूप से बंद हो जाती हैं और आँखे बंद करते ही ‘‘प्रकाश ही प्रकाश’’ नज़र आता है। कभी सफेद प्रकाश तो कभी गहरे नीले रंग का प्रकाश दिखता है। अब मुझे महसूस होता है कि मेरा पेट रीढ़ की हड्डी से चिपक जायेगा और अपने रीढ़ से एक आग का गोला ऊपर की ओर उठता हुआ महसूस होता है साथ ही सारे शरीर से गर्मी निकलती है।

        सही मायने में तो दीक्षा वो है, जो मनुष्य की सम्पूर्ण क्रियाएँ ही बदल दे, उसके सोचने का तरीका ही बदल दें। शास्त्रों में वर्णित राजयोग-यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि के अनुसार सिर्फ सुपात्र को ही दीक्षा मिलनी चाहिये। आज गुरुदेव पात्र की पात्रता देखे बगेर ही दीक्षा देते हैं और पात्र अपने-आप सुपात्र बन जाता है। राजयोग के अनुसार मनुष्य को माँसाहारी भोजन नहीं करना चाहिये जबकि मैं बचपन से ही माँसाहारी भोजन करता आ रहा था और इस प्रकार मैंने दीक्षा ली और आज मेरा माँसाहारी भोजन छूट गया।

-संजय के माथुर
शास्त्री नगर जोधपुर (राज.)
संदर्भ-सवितादेव संदेश,
सन् 1995 से

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