Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

जी एस एस वाई क्या है ?

योग क्या है?
विस्तृत वैदिक (हिन्दू) साहित्य का वह समस्त ज्ञान जो भारतीय आध्यात्मिकता से संबंधित है, योग उसका सम्पूर्ण भाग समझा जाता है। ‘योगसूत्र’ जिसमें 195 सूत्र हैं, उनमें अष्टांग योग की आठ अवस्थाओं के बारे में स्पष्ट रूप से समझाकर लिखा गया है कि साधक एक एक तत्त्व को जीतता हुआ अपने असली स्वरूप में बदल जाता है।
प्राचीन काल में इन अवस्थाओं से गुजरने के लिए साधक को हठयोग का सहारा लेना पड़ता था लेकिन सिद्धयोग में सद्गुरु कृपा से, चेतन शक्ति कुण्डलिनी के नियंत्रण में सारे नियम विधानों का पालन सहज में ही होता रहता है। योग, दिव्य के साथ मिलन है अर्थात् आत्मा का परमात्मा (सार्वलौकिक चेतना शक्ति) से मिलन या योग सूत्र में लिखा हैं कि चित् की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
भारतीय योग दर्शन में वर्णित ‘‘योग’’ का मूल उद्देश्य ‘‘मोक्ष’’ है। आज संसार में भारतीय योग के नाम से जो शारीरिक कसरत करवाई जा रही है, उसका भारतीय योगदर्शन में वर्णित योग से कोई सम्बन्ध नहीं है।
‘‘भारतीय योग तो वेद रूपी कल्पतरू का अमर-फल है।’’ यह योग साधक के त्रिविध तापों ( आदि-भौतिक, आदि-दैहिक व आदि-दैविक) का शमन (नाश) कर देता है। जब तक साधक इन त्रिविध तापों (सम्पूर्ण रोगों) से पूर्ण मुक्त नहीं हो जाता है तब तक समाधिस्थ नहीं हो सकता और समाधिस्थ हुए बिना, परमतत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार असम्भव है। यह ज्ञान सद्गुरु की कृपा के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। इस सम्बन्ध में वराहोपनिशद् के दूसरे अध्याय में कहा है-
दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्।
दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरोः करुणां बिना।। 77।।
सद्गुरु की दया के बिना विषय-त्याग दुर्लभ है, तत्त्व दर्षन दुर्लभ है और सहजावस्था भी दुर्लभ है।
सिद्धयोग का दर्शन
सिद्धयोग, योग के दर्शन पर आधारित है जो कई हजार वर्ष पूर्व प्राचीन ऋषि मत्स्येन्द्रनाथ जी ने प्रतिपादित किया तथा एक अन्य ऋषि पातंजलि ने इसे लिपिबद्ध कर नियम बनाये जो ‘योगसूत्र’ के नाम से जाने जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार मत्स्येन्द्रनाथ जी पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस योग को हिमालय में कैलाश पर्वत पर निवास करने वाले शाश्वत सर्वोच्च चेतना के साकार रूप भगवान शिव से सीखा था। ऋषि को, इस ज्ञान को मानवता के मोक्ष हेतु प्रदान करने के लिए कहा गया था। ज्ञान तथा विद्वत्ता से युक्त यह योग, गुरु शिष्य परम्परा में समय-समय पर दिया जाता रहा है।
सिद्धयोग क्या है?
यह योग (सिद्धयोग) नाथमत के योगियों की देन है, इसमें सभी प्रकार के योग जैसे भक्तियोग, कर्मयोेग, राजयोग, क्रियायोग, ज्ञानयोग, लययोग, भावयोग, हठयोग आदि सम्मिलित हैं, इसीलिए इसे पूर्ण योग या महायोग भी कहते हैं। इससे साधक के त्रिविध ताप आदि दैहिक (Physical) आदि भौतिक ( Mental) आदि दैविक (Spiritual) नष्ट हो जाते हैं तथा साधक जीवनमुक्त हो जाता है। महर्षि श्री अरविन्द ने इसे पार्थिव अमरत्त्व (Terrestrial Immortality) की संज्ञा दी है। पातंजलि योगदर्शन में साधनापाद के 21 वें श्लोक में योग के आठ अंगों- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि का वर्णन है। बौद्धिक प्रयास से इस युग में उनका पालन करना असम्भव है।
इसलिये इतने महत्त्वपूर्ण दर्शन के बारे में नगण्य लोगों को ही जानकारी है। सद्गुरुदेव साधक की शक्ति (कुण्डलिनी) को चेतन करते हैं। वह जाग्रत कुण्डलिनी साधक को उपर्युक्त अष्टांगयोग की सभी साधनाएँ स्वयं अपने अधीन करवाती है। इस प्रकार जो योग होता है उसमें साधक का सहयोग या असहयोग कोई काम नहीं करता है। कुण्डलिनी के नियंत्रण में सारी क्रियाएँ स्वतः ही होती है इसलिए इसे सिद्धयोग कहते हैं। जबकि अन्य सभी प्रकार के योग मानवीय प्रयास से होते हैं।
गुरु-शिष्य परम्परा में शक्तिपात-दीक्षा से कुण्डलिनी जाग्रत करने का सिद्धांत है। यह शक्तिपात केवल समर्थ सद्गुरु की कृपा द्वारा ही प्राप्त होता है।
सिद्धयोग क्यों आवश्यक है?
दुनिया भर में बड़े शहरों तथा छोटे कस्बों में रहने वाले अनगिनत लोग तनावपूर्ण जीवन जीते हुए किसी ऐसी सर्वरोगनाशक औषधि की तलाश में रहते हैं, जो उन्हें तनाव तथा सभी प्रकार की बीमारियों से, जिन पर वर्तमान औषधियाँ कारगर नहीं होती, छुटकारा दिला सके। कुछ लोग सनातन सत्य तथा परमात्मा की हार्दिक तलाश में हैं। इसमें से बहुत से लोग अपने इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु योग अपनाते हैं।
आज योग की चर्चा सम्पूर्ण विष्व में है। कुछ समय बाद धीरे-धीरे उनका उत्साह कमजोर पड़ना आरम्भ हो जाता है क्योंकि उनमें से अधिकांश लोग यह जानते हैं कि या तो समय की कमी या फिर कार्य के अनियमित घन्टे होने के कारण रोजाना योग के थका देने वाले खानपान व रहन सहन संबंधी नियम अधिक समय तक बनाये रखना आसान नहीं है। इसके अलावा योग की विभिन्न क्रियाऐं जैसे आसन, बन्ध, मुद्रायें, प्राणायाम आदि बहुत से लोगों के लिए करना आसान नहीं हैं, अधिकांश लोगों में गुरु अथवा योगा टीचर की निगरानी के बिना आरंभ में योग की मुद्रायें करने का परामर्श नहीं दिया जाता है।
जिनके पास समय व धन की कमी है उनके लिये योग की कक्षाओं में जाना या तो अव्यावहारिक होता है या अधिक खर्चीला होता है। क्या इसका यह मतलब है कि योग जनसाधारण के लिये नहीं है? जिनके पास या तो समय की कमी है या जो साधन सम्पन्न नहीं है, जो नियमानुसार योग के प्रशिक्षण में पहुँच सकें। सामान्यतः उत्तर होगा, हाँ तो फिर योग सबके लिये सम्भव नहीं है।
फिर भी, एक अत्यधिक विकसित आध्यात्मिक गुरु, अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग करके अपने शिष्यों के लिये योग के अभ्यास अत्यधिक साधारण व आसान बना सकता है जो शिष्य के लिए अपनाना, सरल व प्रभावशील हो। गुरुदेव सियाग एक ऐसे ही आध्यात्मिक गुरु हैं जो अपने शिष्यों के लिये जिम में जाये बिना या घर पर योग के थका देने वाले, गहन प्रशिक्षणों के किये बिना ही सिद्धयोग के द्वारा, योग के सर्वोत्तम लाभ उपलब्ध करा देते हैं। सिद्धयोग में, एक इच्छुक व्यक्ति को गुरुदेव सियाग से दीक्षा लेनी होती है तथा उनके बताये अनुसार ध्यान एवं मंत्रजाप करना होता है। इसी आराधना से जीवन में परिवर्तन आता है और आ रहा हैं, जिनके हजारों-लाखों लोग साक्षी हैं।
सिद्धयोग के अभ्यास
में क्या शामिल है?
सिद्धयोग में गुरुदेव सियाग के प्रति पूर्ण विश्वास एवं समर्पण के साथ दीक्षा में दिये गये मन्त्र का जाप एवं ध्यान शामिल है। गुरुदेव सियाग एक साधक को, जो उनका शिष्य बनना चाहता है ‘एक मन्त्र-(एक दिव्य शब्द’) देते हैं, जिसका चुपचाप मानसिक रूप से जाप करना होता है तथा वह बतलाते हैं कि प्रतिदिन ध्यान कैसे करना है? रोजाना ध्यान, मानसिक रूप से मंत्रजाप के साथ होता है। कुछ दिनों तक लगातार मंत्र का जाप करते रहने से ‘‘अजपा जाप’’ (साधक के बिना जपे ही अंदर की कोई और ही षक्ति जपना षुरू कर देती है, या मंत्र नाद में बदल जाता है, जिसे साधक एकाग्र होकर सुनता रहता है)बन जाता है। यह सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि जाप, कितनी सघनता, निष्कपटता, विश्वास तथा तीव्रता के साथ किया गया है।
कुछ साधकों में यह जाप एक सप्ताह में ही अजपा बन सकता है तथा अन्य में कुछ महीने या अधिक समय भी लग सकता है। इसका मुख्य कारण है कि साधक इस आराधना के प्रति कितना गंभीर है। शिष्य को मंत्र जाप के साथ-साथ सुबह शाम 15-15 मिनट के लिए ध्यान भी करना होता है।
एक दीक्षित व्यक्ति जैसे-जैसे सिद्धयोग के मार्ग पर आगे बढ़ता है, वह शीघ्र ही महसूस करता है कि तनाव दूर हुआ है, ध्यान केन्द्रित करने की शक्ति बढ़ी है तथा विचार अधिक धनात्मक हुए हैं। ध्यान की अवस्था में बहुत से साधकों को विभिन्न प्रकार की यौगिक मुद्राएँ तथा क्रियाएँ स्वतः होती हैं।
साधक इन यौगिक क्रियाओं को न तो अपनी इच्छानुसार कर सकता है तथा न ही नियन्त्रित कर सकता है। यह क्रियाएँ हर साधक के लिए, उसके शरीर की आवश्यकतानुसार अलग-अलग होती हैं। ऐसा इस कारण होता है कि यह दिव्य शक्ति, जो गुरु सियाग की आध्यात्मिक शक्ति के नियंत्रण में कार्य कर रही होती है, वह यह अच्छी तरह से जानती है कि साधक को शारीरिक एवं मानसिक रोगों से छुटकारा दिलाने एवं उसे आध्यात्मिक मार्ग पर, आगे बढ़ाने के लिए कौनसी विशेष मुद्राएँ/क्रियाएँ आवश्यक हैं। इस कारण सिद्धयोग में यौगिक मुद्राएँ, अन्य योग विद्यालय में इच्छानुसार वांछित प्रभाव लाने के लिए, किसी क्रम विशेष में व्यवस्थित विधि द्वारा कराई जाने वाली यौगिक क्रियाओं के अनुसार नहीं होती हंै। सिद्धयोग में लोगों को समूह में ध्यान करते देखकर, एक निरीक्षणकर्ता यह देखकर अचम्भित हो जाता है कि भाग लेने वाले लगभग प्रत्येक व्यक्ति की यौगिक मुद्राएँ भिन्न-भिन्न हैं। बहुत से साधक ध्यान के दौरान ऐसा इन्द्रियातीत आनंद, उमंग एवं खुशी अनुभव करते हैं, जो उन्होंने पहले कभी भी महसूस नहीं की हुई होती है।
सिद्धयोग कैसे कार्य करता है?
प्राचीन भारतीय धर्मग्रन्थ वेदों के अनुसार मानव शरीर परमपिता, जिसे हम ईश्वर या विभिन्न नामों से पुकारते हंै, की समग्र स्थूल अवस्था है अर्थात् जो ब्रह्माण्ड में है, वही पिण्ड में है। मानव शरीर में सूक्ष्म स्तर पर नसों एवं नाड़ियों का एक जाल है जो रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से लेकर गले में थायराइड ग्रन्थि तक एक निश्चित अन्तराल पर एक के ऊपर एक, इस तरह छः चक्रों अथवा ऊर्जा केन्द्रों को आपस में जोड़ता है।
यह चक्र सुषुम्ना नाड़ी में होते हैं, जो रीढ़ की हड्डी के समानान्तर नीचे से ऊपर की ओर, सिर के ऊपरी हिस्से तक जाती है। सिर के इस ऊपरी भाग को सहस्रार कहते हैं, जो ईश्वर का निवास स्थान है।
जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है तो यह सहस्रार में स्थित अपने स्वामी से मिलने के लिए लहराती हुई ऊपर की ओर उठती है। समर्थ सद्गुरु, साधक की कुण्डलिनी को चेतन करते हैं। जाग्रत कुण्डलिनी पर समर्थ सद्गुरु का पूर्ण नियन्त्रण होता है, वे ही उसके वेग को अनुशासित एवं नियन्त्रित करते हैं। समाधिस्थ होने के लिए पहली शर्त है, पूर्ण रोग मुक्ति। भारतीय योग दर्शनानुसार कोई रोग असाध्य नहीं है। गुरुकृपा रूपी शक्तिपात दीक्षा से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर छह चक्रों का भेदन करती हुई, सहस्रार तक पहुँचती है। कुण्डलिनी द्वारा जो योग करवाया जाता है, उससे मनुष्य के सभी अंग पूर्णतः स्वस्थ हो जाते हैं।
साधक का जो अंग बीमार या कमजोर होता है, मात्र उसी की यौगिक क्रियाएँ, ध्यानावस्था में होती हंै एवं कुण्डलिनी शक्ति उसी बीमार अंग का योग करवाकर उसे पूर्ण स्वस्थ कर देती है।
सिद्धयोग के लाभ
मनुष्य में होने वाली बीमारियों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने दो श्रेणियों में बाँटा है (1) शारीरिक तथा (2) मानसिक। भारतीय योगियों ने पाया कि शारीरिक तथा मानसिक बीमारियों के अलावा आध्यात्मिक बीमारियाँ भी होती हैं। दूसरे शब्दों में, कर्म का आध्यात्मिक नियम, पूर्व जन्म के कर्म इस जन्म की बीमारियों तथा दुःखों के कारण हैं, जो मनुष्य को जन्म-जन्मान्तर तक कभी समाप्त न होने वाले चक्र में बाँधे रखते हैं। सिर्फ रोगों को दूर करने के उद्देश्य से, इसे काम लेना इसके मुख्य उद्देश्य को ही छोड़ देना है, क्योंकि यह तो साधक को उसके कर्मों के, उन बन्धनों से मुक्त करता है जो निरन्तर चलने वाले जन्म-मृत्यु के चक्र में उसे बाँधकर रखते हैं।
योग दर्शन मानव शरीर तथा लौकिक अतिमानस के बीच अति सूक्ष्म सम्बन्ध को मान्यता देता है जो शरीर विशेष की रचना के लिए उत्तरदायी है।
पातंजलि ऋषि ने अपनी पुस्तक ‘योग सूत्र’ में बीमारियों का वर्गीकरण तीन श्रेणियों में किया है 1. शारीरिक (आदि दैहिक), 2. मानसिक (आदि भौतिक) तथा 3. आध्यात्मिक (आदि दैविक)।
मनुष्य की आध्यात्मिक बीमारियों के लिए आध्यात्मिक इलाज की आवश्यकता होती है। मनुष्य की आध्यात्मिक बीमारियों का आध्यात्मिक इलाज, योग के नियमित अभ्यास द्वारा केवल आध्यात्मिक गुरु जैसे गुरुदेव सियाग की मदद द्वारा ही सम्भव हो सकता है।
एक मात्र गुरु ही है जो शिष्य को उसके पूर्व जन्मों के कर्म बन्धनों को काटकर उसे, जीवन के सही उद्देश्य, आत्मसाक्षात्कार द्वारा बीमारियों तथा दुःखों से छुटकारा दिलाने में उसकी सहायता कर सकता है।
गुरुदेव सियाग ने अनेक केसेज में यह सिद्ध किया है कि सिद्धयोग का नियमित अभ्यास, लम्बे सत्र से चली आ रही बीमारियों जैसे गठिया, डायबिटीज तथा अन्य घातक रोगों जैसे कैंसर, एच.आई.वी./एड्स में न सिर्फ आराम ही पहुँचा सकता है बल्कि उन्हें पूर्ण रूप से ठीक भी कर सकता है।
अनगिनत मरीज, जिनका चिकित्सकों के पास कोई इलाज नहीं था और मरने के लिए छोड़ दिये गये थे, उन्होंने सिद्धयोग को अन्तिम विकल्प के रूप में अपनाया और गुरुदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया तथा दीक्षा ली, वह न सिर्फ जीवित है बल्कि पूर्ण स्वस्थ होकर अपना सामान्य जीवन भी जी रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जहाँ किसी बीमारी में लाभ पहुँचाने या उसे ठीक करने में असमर्थ रहता है, वहाँ योग सफलतापूर्वक उसे ठीक करता है।
हमारा शरीर एक माध्यम है, जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिये वैदिक दर्शन, साधकों के लिए जो आध्यात्मिकता के पथ पर आगे बढ़ना चाहते हैं, पूर्ण स्वस्थ होने की आवश्यकता पर बल देता है। दैनिक जीवन के एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट की जा सकती है। मान लो हमें ‘अ’ स्थान से ‘ब’ स्थान तक की यात्रा करनी है। अगर वाहन चालू व बिलकुल ठीक हालत में है तो वह स्थान ‘ब’ तक हमें जल्दी और सुविधापूर्वक पहुँचाएगा, बजाए उस वाहन के, जो बुरी हालत में है। संक्षेप में, आध्यात्मिक प्रगति के लिए पूर्ण रूप से स्वस्थ होना पहली आवश्यकता है। सिद्धयोग का नियमित अभ्यास ठीक यही करता है कि वह हमें सबसे पहले पूर्ण रूप से स्वस्थ करता है।
कुण्डलिनी शक्ति
परमपिता का अर्द्धनारीश्वर भाग शक्ति कहलाता है, यह ईश्वर की पराशक्ति है (प्रबल लौकिक ऊर्जा शक्ति)। जिसे हम राधा, सीता, दुर्गा या काली आदि के नाम से पूजते हैं। इसे ही भारतीय योगदर्शन में ‘‘कुण्डलिनी’’ कहा गया है। यह दिव्य शक्ति मानव शरीर के मूलाधार में (रीढ़ की हड्डी का निचला हिस्सा) सुषुप्तावस्था में रहती है। यह रीढ़ की हड्डी के आखिरी हिस्से के चारों ओर साढ़े तीन आँटे लगाकर कुण्डली मारे सोए हुए, सांप की तरह पड़ी रहती है। इसीलिए यह कुण्डलिनी कहलाती है। चूँकि कुण्डलिनी यह लौकिक ऊर्जा है जो अतिमानस से उत्पन्न हुई है, यह एक त्रिकालदर्शी शक्ति है जो योग करने वाले का, उसकी सत्यता का भान एवं आत्मसाक्षात्कार कराती है और उसे संसार के दुःखों तथा बन्धनों से, अन्तिम रूप से मुक्त कराने के पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति कराती है।
कुण्डलिनी तथा 72,000 नाड़ियों के पेचीदा नेटवर्क के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन नाड़ियों का पूरे मानव शरीर में एक जाल बिछा रहता है। इनमें से तीन मुख्य नाड़ियाँ है जो मूलाधार से आपस में लिपटती हुई ऊपर की ओर मस्तिष्क के ऊपरी हिस्से तक जिसे सहस्रार कहते हैं, जाती है। मध्य नाड़ी जो प्रमुख है, सुषुम्ना कहलाती है। दो अन्य नाड़ियाँ, जो सुषुम्ना के अगल-बगल चलती है, इड़ा तथा पिंगला के नाम से जानी जाती है। सुषुम्ना में थोड़े-थोड़े अन्तराल पर, एक के ऊपर एक, नीचे से ऊपर की ओर छः चक्र या चेतना के केन्द्र या लौकिक ऊर्जा केन्द्र तथा तीन ग्रन्थियाँ होती हैं।
इन नाड़ियों, चक्रों तथा ग्रन्थियों का तमाम जाल, अलग आयाम में स्थित है। जिसके बारे में विज्ञान को कुछ पता नहीं है। यह इतनी सूक्ष्म अवस्था में है कि अति उन्नत प्रयोगशाला के उपकरण भी इनकी उपस्थिति का पता नहीं लगा सकते हैं।
जब ध्यान तथा मंत्र जाप से कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है तो यह सुषुम्ना के रास्ते ऊपर उठती हुई सहस्रार तक पहुँचती है, जो उसका अन्तिम गन्तव्य स्थान है, जहाँ इसके स्वामी ‘परम शिव’ शाश्वत अतिमानस का निवास है। चूँकि यह सुषुम्ना के चारों ओर लपेटे लेते हुए ऊपर उठती है, यह पूरे नाड़ी तंत्र को ऊर्जावान बना देती है तथा एक-एक कर, छः चक्रों-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र और तीन ग्रन्थियों ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि एवं रुद्र ग्रन्थि का भेदन करती है, और अन्त में साधक को समाधि स्थिति, जो कि समत्व बोध की स्थिति है, प्राप्त करा देती है।
जाग्रत कुण्डलिनी, सुषुम्ना के रास्ते से अतिमानस से सीधा सम्पर्क स्थापित कर लेती है। इससे मानव शरीर पूर्णतः रोगमुक्त हो जाता है तथा साधक ऊर्जायुक्त होकर आगे की, आध्यात्मिक यात्रा हेतु तैयार हो जाता है। शरीर के लिए रोग मुक्त होने के सिद्धयोग ध्यान के दौरान जो बाह्य लक्षण हैं, उनमें यौगिक क्रियाएँ जैसे दायें-बायें हिलना, कम्पन, झुकना, लेटना, रोना, हंसना, सिर को तेजी से घुमाना, ताली बजाना, हाथों एवं शरीर की अनियन्त्रित गतियाँ, तेज रोशनी या रंग दिखाई देना या अन्य कोई आसन, बंध, मुद्रा या प्राणायाम की स्थिति आदि मुख्यतः होती है।
कुण्डलिनी जागरण का प्रभाव
आरम्भ करने वाला कभी-कभी स्वैच्छिक होने वाली यौगिक क्रियाओं से यह सोचकर भयभीत हो जाता है कि या तो कुछ गलत हो गया है और फिर किसी अदृश्य शक्ति की पकड़ में आ गया है लेकिन यह भय निराधार है।
वास्तव में यह यौगिक क्रियाएँ या शारीरिक हलचलें दिव्य शक्ति द्वारा निर्दिष्ट है और प्रत्येक साधक के लिये भिन्न-भिन्न होती हंै। ऐसा इस कारण होता है कि इस समय दिव्य शक्ति जो गुरुदेव सियाग की आध्यात्मिक शक्तियों के माध्यम से कार्य कर रही होती है, वह यह भलीभाँति जानती है कि साधक को शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्त करने के लिए क्या विशेष मुद्राएँ आवश्यक है? यह क्रियाएँ कोई भी हानि नहीं पहुँचाती। शरीर-शोधन के दौरान असाध्य रोगों सहित सभी तरह के शारीरिक एवं मानसिक रोगों से पूर्ण मुक्ति मिल जाती है। यहाँ तक कि वंशानुगत रोग जैसे हीमोफिलिया से भी छुटकारा मिल जाता है। सभी तरह के नशे छूट जाते हैं।
साधक बढ़ा हुआ अन्तज्र्ञान, भौतिक जगत् के बाहर अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को अनुभव करना, अनिश्चितकाल तक का भूत व भविष्य देख सकने की क्षमता आदि प्राप्त कर सकता है। आत्मसाक्षात्कार होने के पश्चात् आगे चल कर साधक को सत्यता का भान हो जाता है जो उसे कर्मबन्धनों से मुक्त करता है और इस प्रकार कर्मबन्धनों के कट जाने से दुःखों का ही अन्त हो जाता है।
कुण्डलिनी के सहस्रार में पहुँचने पर साधक की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण हो जाती है। इस अवस्था तक पहुँचने पर साधक को स्वयं के ब्रह्मा होने का पूर्ण एहसास हो जाता है इसे ही मोक्ष या अद्वैत कहते हैं। फिर भी यदि कोई साधक इन क्रियाओं से अत्यधिक भयभीत है तो वह इन्हें रोकने हेतु गुरुदेव सियाग से प्रार्थना कर सकता है, प्रार्थना करने पर क्रियाएँ तत्काल रुक जायेंगी।
मानव शरीर
आत्मा का भौतिक घर
हमारे ऋषियों ने गहन शोध के बाद इस सिद्धान्त को स्वीकार किया है कि जो ब्रह्माण्ड में है, वही सब कुछ पिण्ड (शरीर) में है। इस प्रकार मूलाधार चक्र से आज्ञा चक्र तक का जगत् माया का और आज्ञा चक्र से लेकर सहस्रार तक का जगत् परब्रह्म का है।
वैदिक ग्रन्थों में लिखा है कि मानव शरीर, आत्मा का भौतिक घर मात्र है। आत्मा सात प्रकार के कोशों से ढकी हुई हैः- 1. अन्नमय कोश (द्रव्य, भौतिक शरीर के रूप में, जो भोजन करने से स्थिर रहता है), 2. प्राणमय कोश (जीवन शक्ति), 3. मनोमय कोश (मस्तिष्क जो स्पष्टतः बुद्धि से भिन्न है), 4. विज्ञानमय कोश (बुद्धिमत्ता), 5. आनन्दमय कोश (आनन्द या अक्षय आनन्द जो शरीर या दिमाग से सम्बन्धित नहीं होता), 6. चित्मय कोश (आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता) तथा 7. सत्मय कोश (अन्तिम अवस्था जो अनन्त के साथ मिल जाती है)। मनुष्य के आध्यात्मिक रूप से पूर्ण विकसित होने के लिए सातों कोशों का पूर्ण विकास होना अति आवश्यक है।
भौतिक विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य ने प्रथम चार कोशों को चेतन करने में सफलता पा ली है, अन्तिम तीन कोशों को वह किस प्रकार चेतन करेगा?
श्री अरविन्द ने अपनी फ्रैन्च सहयोगी शिष्या के साथ, जो श्रीमाँ के नाम से जानी जाती थी, अपनी ध्यान की अवस्थाओं के दौरान यह महसूस किया कि अन्तिम विकास केवल तभी हो सकता है, जब लौकिक चेतना (जिसे उन्होंने कृष्ण की अधिमानसिक शक्ति कहा है) पृथ्वी पर अवतरित हो।
प्रथम चार कोश जो मानवता में चेतन हो चुके हैं, वहाँ विद्या पर अविद्या का आधिपत्य है। शेष तीन आध्यात्मिक कोश जो मानवता में चेतन होना बाकी हैं, यहाँ अविद्या पर विद्या का प्रभुत्व है। उपर्युक्त सातों कोशों के पूर्ण विकास को ही ध्यान में रखकर महर्षि श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है कि ‘‘आगामी मानव जाति दिव्य शरीर (देह) धारण करेगी।’’
हमारे ऋषियों ने मनुष्य शरीर को विराट स्वरूप प्रमाणित करके, उसके अन्दर सम्पूर्ण सृष्टि को देखा, इसके जन्मदाता परमेश्वर का स्थान सहस्रार में और उसकी पराशक्ति (कुण्डलिनी) का स्थान मूलाधार के पास है। साधक की कुण्डलिनी चेतन होकर सहस्रार में लय हो जाती है, इसी को मोक्ष कहा गया है।
सिद्धयोग के क्या फायदे हैं?
– इससे साधक के सभी प्रकार के असाध्य रोग जैसे कैंसर, एच.आई.वी./एड्स, गठिया, दमा व डायबिटीज आदि शारीरिक रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
– मानसिक रोग जैसे भय, चिन्ता, अनिन्द्रा, आक्रोश, तनाव, फोबिया आदि से मुक्ति;
– सभी प्रकार के नशों जैसे शराब, अफीम, स्मैक, हेरोइन, भांग, बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, जर्दा आदि से बिना परेशानी के छुटकारा।
– मनोवैज्ञानिक एवं भावनात्मक असंतुलन को दूर कर शरीर को पूर्ण स्वस्थ बनाता है।
– आध्यात्मिकता के पूर्ण ज्ञान के साथ भूत तथा भविष्य की घटनाओं को ध्यान के समय प्रत्यक्ष देख पाना सम्भव।
– एकाग्रता एवं याददाश्त में वृद्धि।
– साधक को उसके कर्मों के उन बन्धनों से मुक्त करता है, जो निरन्तर चलने वाले जन्म-मृत्यु के चक्र में उसे बाँध कर रखते हैं।
– ईश्वरीय शक्ति द्वारा तामसिक वृत्ति के शान्त होने से मानव जीवन का दिव्य रूपान्तरण।
– साधक को उसकी सत्यता का भान एवं आत्मसाक्षात्कार कराता है।
– गृहस्थ जीवन में रहते हुए भोग और मोक्ष के साथ ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति सम्भव।
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