Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

गुरु दक्षिणा

योग की परम्परा में, आध्यात्मिकता के क्षेत्र में गुरू का अद्वितीय स्थान है। वह अपने शिष्य के आध्यात्मिक कल्याण की ही देखरेख नहीं करता है बल्कि दिव्य परमात्मा जिसे हम ईश्वर कहते हैं उस तक शिष्य के पहुँचने के लिये एक पुल का कार्य करता है। गुरू की निःस्वार्थ दूसरों की चिन्ता, प्यार तथा मदद के लिये शिष्य को, गुरू का कृतज्ञ होना चाहिए तथा आभारस्वरूप उन्हें दक्षिणा भेंट करनी चाहिए। दक्षिणा पैसे के रूप में, भौतिक कार्य या गुरू का सन्देश, अन्य आत्मसाक्षात्कार के इच्छुक व्यक्तियों तक पहुँचाने की सेवा के रूप में हो सकती है यह भेंट एच्छिक होनी चाहिए क्योंकि गुरू इसकी माँग नहीं करते हैं। योग में ऐसा मानना है कि गुरू शिष्य सम्बन्ध तभी पूर्ण रूप से परिपक्व होते हैं जब शिष्य आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने अथवा योग के मार्ग पर वांछित प्रगति होने पर गुरू को दक्षिणा भेंट करता है। ऐसी कोई निर्धारित विधि नहीं है कि गुरू को दक्षिणा किस तरह देनी चाहिए। आर्थिक एवं भौतिक स्थिति के अतिरिक्त यह गुरू के प्रति शिष्य की कृतज्ञता एवं आदर के स्तर पर मुख्यतः निर्भर करती है। एक सच्चा गुरू जैसे गुरू सियाग अपने शिष्य द्वारा छोटी से छोटी चीज जैसे फूल या फल जो कृतज्ञतापूर्वक भेंट किये जाते हैं, उन्हें कृपापूर्वक स्वीकार करते हैं। शिष्य की आध्यात्मिक योग्यता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह कितना ज्यादा और क्या गुरू को भेंट करता है बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वह अपने आध्यात्मिक उत्थान में गुरू की सहायता के प्रति कितनी गहरी कृतज्ञता महसूस करता है। शिष्य की धार्मिक शिक्षाओं या उसके मत के अनुसार कुल आय का १० प्रतिशत , एक रूपया, एक पैसा या फिर एक फूल भेंट का हो सकता है। लेकिन यह भेंट खुशीपूर्वक सम्पूर्ण मन से दी हुई होनी चाहिए तभी गुरू उसे स्वीकार करते हैं।
           लोग सोचते हैं कि गुरू को दान या धर्मादा दे रहे हैं, लेकिन सत्य यह है कि गुरू को दान की कभी आवश्यकता नहीं होती और न गुरू को कभी दान दिया जा सकता है। जिस प्रकार सूर्य, हवा, बदल, पानी आदि शक्तियों को केवल ह्रदय से धन्यवाद ही दिया जा सकता है उसी प्रकार गुरू के प्रति तो केवल कृतज्ञता ही व्यक्त की जा सकती है, ।  गुरु-पूर्णिमा का पर्व परम्परागत रूप से हर वर्ष भारत में एक ऐसे दिन के रूप में मनाया जाता है जब शिष्य, अपना जीवन सुधारने के उपलक्ष में, अपने गुरू को कृतज्ञतापूर्वक भेंट अर्पित करता है।
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