Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

गुरुदेव सियाग के बारे में

संक्षिप्त जीवनी

          पूज्य सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग एक प्रवृत्तिमार्गी संत थे। सद्गुरुदेव का अवतरण (जन्म) बीकानेर के पलाना ग्राम में 24 नवम्बर 1926 को हुआ। गुरुदेव रेलवे में हैड क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। परिस्थितियों वश गुरुदेव ने सन् 1968 की शरद ऋतु से गायत्री की आराधना शुरू की और 1 जनवरी, 1969 में गुरुदेव को गायत्री (निर्गुण) की सिद्धि हो गई। स्वामी विवेकानन्द जी को पढ़ने के पश्चात् गुरुदेव ने जामसर में आराधना कर रहे शिवावतारी बाबा श्री गंगाईनाथ जी योगी को गुरु धारण कर लिया, जिनकी अहैतु की कृपा से सन् 1984 में सद्गुरुदेव को भगवान् श्रीकृष्ण (सगुण) की सिद्धि हो गई। इन दोनों सिद्धियों के कारण से गुरुदेव में शक्तिपात दीक्षा द्वारा कुण्डलिनी जागरण की सामर्थ्य आ गई। बाबा श्री गंगाईनाथ जी योगी के आदेश से सन् 1986 में रेलवे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली तथा जन कल्याण हेतु सन् 1990 से सार्वजनिक रूप से शक्तिपात-दीक्षा देना प्रारम्भ कर दिया। इस दर्शन को विश्व दर्शन बनाने हेतु 1993 में अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र, जोधपुर की स्थापना की। तब से जीवन पर्यन्त गुरुदेव, सिद्धयोग में वर्णित शक्तिपात-दीक्षा से हजारों-लाखों लोगों को चेतन कर चुके हैं। वर्तमान में भी सद्गुरुदेव की तस्वीर और संजीवनी मंत्र से लाखों लोग आराधना कर लाभांवित हो रहे हैं।
5 जून 2017, निर्जला एकादशी सोमवार को, समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग भौतिक देह को त्याग कर अनंत में विलीन हो गए।

मेरे आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ

      मैं मेरे प्रारम्भिक जीवन में, पूर्ण रूप से निरीश्वरवादी व्यक्ति रहा हूँ। ईश्वर नाम की किसी शक्ति में मुझे कोई विश्वास नहीं था। मैं, मानव की एक मात्र सत्ता में ही विश्वास रखता था, क्योंकि प्रारम्भ से ही मैं, नौकरी में मजदूर संगठन में काम करने वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में आ गया था। अतः मेरा झुकाव राजनीति की तरफ अधिक होता गया। ‘‘मेरा मूल रूप से यह स्वभाव रहा है कि मैं अपनी मान्यताओं पर हमेशा अडिग रहता हूँं।’’ इस प्रकार अपने पथ पर चलकर कम से कम समय में हर काम को पूरा करके उसके परिणाम की अपेक्षा करता हूँ। मैं ऐसे किसी काम में विश्वास नहीं रखता हूँ, जो लम्बे समय तक कोई परिणाम न दे।

      मेरी मान्यता है कि जिस प्रकार किसी खाद्य पदार्थ को मुख में डालते ही उसके स्वाद की प्रत्यक्षानुभूति होने लगती है, उसी प्रकार हर काम के बारे में प्रत्यक्षानुभूति होनी चाहिए। परिणाम के अभाव में कोई भी काम करना व्यर्थ समझता हूँ। आज की ‘‘बहिर्मुखी’’ आध्यात्मिक आराधना से कोई प्रत्यक्षानुभूति नहीं होती है, केवल अंधविश्वास के सहारे मनुष्य पूरे जीवन, कर्मकाण्ड में उलझा रहता है, परन्तु फिर भी उसे कुछ नहीं मिलता

                        इस युग के चतुर धर्म गुरुओं ने बहुत चतुराई से मान्यताएँ और सिद्धान्त बना रखे हैं। हर काम का (धार्मिक) परिणाम अगले जन्म में मिलेगा, अतः श्रद्धा और विश्वास के साथ जीवन भर तेली के बैल की तरह मनुष्य को चलाते रहते हैं। इस प्रकार संसार के असंख्य मनुष्यों का जीवन निरर्थक बना रखा हैं। यही कारण था कि मैं, धीरे-धीरे पूर्ण नास्तिक बन गया। क्योंकि मेरा यह स्वभाव है कि मैं जैसा सोचता हूँ, वही कहता हूँ और जो कहता हूँ वही करता भी हूँ। लोग मात्र कहने को नास्तिक है, थोड़ा कष्ट आते ही नास्तिकता काफूर हो जाती है। रूस जैसे देश ने भी दूसरे विश्व युद्ध में सभी धर्मों के प्रार्थना स्थल पुनः खोल दिए थे। परन्तु मैं कालीदास की तरह अपने हठ पर अड़ा ही रहा। इस प्रकार ज्योंही यह अति अपनी चरम सीमा का अतिक्रमण करने लगी, भारी विस्फोट हो गया। जैसी स्थिति हीरोशिमा वासियों की हुई , मैं ठीक वैसी ही स्थिति में पहुँच गया। ऐसी विचित्र भयावह मानसिक स्थिति हो गई कि कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। सारे भौतिक उपचार असफल हो गए। स्थिति ऐसी भयंकर हो चुकी थी कि मैं स्वयं यह सोचने लगा कि अब अन्तिम समय अधिक दूर नहीं है। ऐसी स्थिति में मेरे एक मित्र श्रीराम दुबे ने गायत्री मंत्र का जप करने की सलाह दी। मैं जिस सत्ता में कुछ भी विश्वास नहीं रखता था, मृत्यु भय के कारण सहर्ष जैसा बताया, वैसा करने को तैयार हो गया। उस समय की मेरी मानसिक स्थिति ऐसी थी कि एक तरफ तो मृत्यु मुँह बाये खड़ी थी, दूसरी तरफ उस अदृश्य शक्ति से प्राण रक्षा की करूण पुकार कर रहा था।

    ऐसी स्थिति में ‘‘एकाग्रता’’ और ‘‘करूण पुकार’’ कैसी होगी? आसानी से समझी जा सकती है। विधिवत् सवा लाख जप करने का लक्ष्य था और इस प्रकार करीब साढे़ तीन महीने का समय इस कार्य में लगा। इतने लम्बे समय तक भी एकाग्रता और करूण पुकार की स्थिति निरन्तर एक जैसी ही बनी रही। प्रातः चार बजे उठ कर, सवा सात बजे तक और शाम को सात से नौ बजे तक यह जप का कार्यक्रम अबाध गति से चलता रहता था। जिस दिन सवा लाख जप पूरे हो गए, उसके अगले दिन जप बन्द कर दिया। परन्तु आदत वश प्रातः ही ठीक चार बजे नींद खुल गई। क्योंकि जप करना नहीं था; आँख बंद किये बिस्तर पर ही लेटा रहा। सन् 1968 की सर्दी में प्रारम्भ होने वाली नवरात्रा से जप प्रारम्भ किया था। अतः काफी सर्दी पड़ रही थी। मैं रजाई ओढ़े आँख बंद किए लेटा हुआ था कि क्या देखता हूँ कि ‘‘मेरे अन्दर नाभि से लेकर कण्ठ तक एक अजीब प्रकार की सफेद रोशनी ही रोशनी दिखाई दी।’’ रोशनी के अलावा शरीर का कोई अंग जैसे लीवर, तिल्ली, फेफड़े, हार्ट आदि कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मुझे यह देखकर अचम्भा हो रहा था कि रोशनी आँखों से मिलती है, फिर यह अन्दर कैसी रोशनी है? इसके अतिरिक्त ऐसी भयंकर सफेद रोशनी में भी कोई अंग क्यों दिखाई नहीं देता है।? मैं ज्यों ही उधर अधिक एकाग्र हुआ तो मुझे भँवरे के गुँजन की आवाज सुनाई दी जो कि नाभि में से आ रही थी। मैंने सोचा पेट में भँवरे की आवाज कैसे आ रही है? ज्यों-ज्यों मैं,उस आवाज की तरफ एकाग्र होता गया, मुझे स्पष्ट सुनाई देने लगा कि गायत्री मंत्र अपने आप ही अन्दर जपा जा रहा है, उसको जपने वाला कोई नजर ही नहीं आया फिर भी वह अबाध गति से निरन्तर चलता रहा। करीब 10-15 मिनटों तक यह सब देखता, सुनता रहा और अपने मन में सोचता रहा कि कैसी विचित्र बात है कि रोशनी आँख से आती है और आवाज कण्ठ से परन्तु यह सब उन अंगों से बहुत नीचे ही कैसे सुना और देखा जा रहा है? करीब पाँच बजे स्नानघर में नल का पानी जोर से फर्श पर गिरा तो ध्यान भंग हो गया। बच्चों ने शाम को नल खुला छोड़ दिया था। इसके बाद उठकर नित्यक्रम से निवृत हो कर अपने कार्य पर चला गया। सोचा; इतने लम्बे समय तक एक ही कार्यक्रम चलने और निरन्तर ध्यान उधर ही रहने के कारण ऐसा ख्याल रह गया होगा।

      परन्तु इसके बाद एक ऐसा परिवर्तन आ गया कि मैं पान, सिगरेट, चाय आदि का प्रयोग करने में पूर्ण रूप से असमर्थ हो गया। इनके इस्तेमाल का ख्याल आते ही बहुत भंयकर घबराहट फिर होने लगती थी। इस प्रकार चाहते हुए भी इन वस्तुओं का इस्तेमाल करना असम्भव हो गया। किसी के साथ खाना खाते और जीवन के किसी भी क्षेत्र में मुझे थोड़ा सा भी झूठ बोलते हुए भी भारी घबराहट होती थी। क्योंकि जप पूर्ण रूप से बन्द कर चुका था। अतः धीरे-धीरे यह स्थिति शान्त हो गई और एक साधारण व्यक्ति की तरह, मैं फिर जीवन व्यतीत करने लगा। परन्तु एक विचित्रता शरीर में आ गई कि जीवन के किसी उद्देश्य पर अगर मेरा दिल-दिमाग अधिक एकाग्र होकर सोचने लगता तो उसका स्पष्ट परिणाम टेलीविजन की तरह बहुत पहले स्पष्ट नजर आ जाता और आगे चलकर वह घटना ठीक वैसे ही घटती जैसी मुझे दिखी थी। इस प्रकार करीब साल भर तक मुझे असंख्य प्रमाण निरन्तर मिलते ही गए और सभी भौतिक जगत् में ठीक वैसे ही घटित होते चले गये जैसे मुझे दिखे थे। ‘‘शब्दों के एक पुँज में ऐसी विचित्र सामर्थ्य और शक्ति होती है, उसकी मुझे कल्पना भी नहीं थी।’’ अतः जिज्ञासावश मैंने फिर आराधना करने की सोची। विचार आया उसे बड़ी शक्ति की आराधना करने का निर्णय लेकर, आराधना प्रारम्भ कर दी।

      भगवान श्री कृष्ण की तस्वीर गायत्री की तरह सामने रख कर कृष्ण के एक बीज मंत्र का जप प्रारम्भ कर दिया। इसकी न तो कोई निश्चित संख्या तय की और न कोई विषेश उद्देश्य। इसी जिज्ञासा से कि देखें कब क्या होता है? उसी क्रम से सुबह-शाम करीब ढाई तीन सालों तक जप चलता रहा। एक दिन विचार किया कि गायत्री मंत्र से तो कोई सौ गुणा से भी अधिक संख्या हो चुकी होगी फिर अभी तक वैसी ही कोई अनुभूति तो नहीं हुई, ऐसा सोचना था कि एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई। हर समय एक परछांई तिरछी नजर से दिखाई देने लगी। जब सीधा देखता तो कुछ नहीं दिखता। सोचा आँखों की कोई बीमारी हो गई है, डाॅक्टरों के पास गया, परन्तु ऐसी कोई बीमारी नहीं निकली। वह क्रम और जप चलता रहा। एक दिन विचार आया कि अपने को इस विद्या का कोई ज्ञान तो है नहीं, कहीं व्यर्थ कष्टों में फँस जाएंगे, मंत्र जप बन्द कर दिया, परन्तु परछांई दिखनी बन्द नहीं हुई। सोचा इसे कुछ नुकसान तो नहीं हो रहा है, दिखती है तो दिखने दो। इस प्रकार जप बन्द किये कुछ ही समय बीता होगा, एक रात्रि को मैं अपने गाँव में सो रहा था। करीब पाँच बजे प्रातः एक आवाज सुनाई दी और उसने स्पष्ट कहा कि ‘‘बेटा अब केवल ‘कृष्ण’ का जप कर।’’ यह आवाज स्पष्ट दो बार सुनाई दी। अचानक मेरी आँख खुल गई, पर किसने आवाज दी, कुछ समझ नहीं सका। परन्तु फिर भी मैंने जप बन्द रखा। वर्षों की आदत थी, बिना जप के कुछ अटपटा सा लगा रहा था। एक दिन विचार आया ‘‘बेटा’’ शब्द से सम्बोधित करके आवाज दी हैं, अतः जो भी भला बुरा होगा, उसकी जिम्मेवारी आवाज देने वाले की ही होगी। मैं इसके दोष का भागी क्यों बनूँगा? इसी विचार के साथ सभी प्रणव हटाकर केवल ‘कृष्ण’ का जप प्रारम्भ कर दिया। छोटा सा शब्द और फिर गति पकड़ ने पर पहले वाले से दस गुणा से भी तेज गति से चलने लगा। करीब साल भर हुआ होगा कि एक बहुत ही विचित्र घटना घट गई।     एक दिन प्रातः करीब चार बजे के आसपास अर्ध जाग्रत अवस्था में क्या देखता हूँ कि ‘‘मैं एक कमरे मैं बैठा हूँ। एक वैसा ही दूसरा कमरा है, उसके और मेरे कमरे के बीच में, एक दरवाजा है जिसमें बहुत ही खूब सूरत गुलाबी मखमल का पर्दा ठीक नीचे तक लटक रहा हैं। ज्यों ही मैंने उस पर्दे की तरफ देखा तो वह मुझे ऐसे हिलते हुए दिखाई दिया मानो हवा के झोंके से हिला हो। इतने में दूसरे कमरे में से आवाज आई कि देख! इसे हिला मत, यह अलग हो जाएगा। मैंने जवाब दिया कि अगर जोर का, हवा का झोंका आया तो अलग होकर फिर यथास्थिति में आ जाएगा। उधर से आवाज आई इसके हटने का अर्थ समझते हो क्या? मैंने जवाब दिया कि मैंने अभी जो अर्थ बताया क्या उससे भी भिन्न कोई होता है। उधर से आवाज आई हाँ, इसके हटने का क्या अर्थ होता है देख! इतना कहने के साथ वह पर्दे वाला दृश्य तो गायब हो गया और क्या देखता हूँ, एक मनुष्य जिसका पर्दा हट चुका है, त्रिकालदर्शी हो गया हैं। इस प्रकार उसका मोह पूर्ण रूप से भंग हो चुका है। उसका अपने-पराये का भेद पूर्ण रूप से खत्म हो चुका है। संसार के सभी प्राणियों को वह एक ही नजर से देखता है, न उसका किसी से मोह है और न ही द्वेश। इसके तत्काल बाद फिर वही गुलाबी पर्दा दिखने लगता है और फिर उधर से आवाज आती है कि देखा यह होता है इस पर्दे के हटने का अर्थ। मैंने कहा यह तो बहुत ही अच्छी बात है, इसी के लिए तो यह सब कर रहा हूँ। उधर से आवाज आती है कि यह सब ठीक तो है, परन्तु एक ‘‘योगभ्रष्ट’’ शब्द होता है। वह क्या होता है? क्या उसके बारे में जानते हो? मैंने कहा आराधना के दौरान कोई बुरा काम हो जाता है, उससे आराधना का पतन हो जाता है, दूसरी तरफ से आवाज आती है कि होता तो कुछ ऐसा ही है, परन्तु इसकी सही परिभाषा यह नहीं हैं। तुम्हारे छोटे-छोटे बच्चे हैं, पत्नी है, माँ है, वे सभी पूर्ण रूप से तुम पर आश्रित हैं। यह ठीक है कि अगर तुमने इस पर्दे को हटा दिया तो तुम्हारी स्थिति तो ठीक वैसी ही हो जायेगी, जैसी अभी तुमने देखी हैं, परन्तु इन प्राणियों को इसका ज्ञान, थोड़ा ही है। जब तुम इस जवानी में इनको छोड़ कर चल दोगे तो इनकी आत्मा की करुण पुकार और क्रन्दन तुमको ले डूबेगी। और इस प्रकार ‘‘योगभ्रष्ट’’ हो जाने के कारण तुम्हारा फिर पतन हो जायगा। अब आगे जैसा तुम ठीक समझो वैसा करो।

      यह बात सुनकर मैं बहुत ही दुविधा में फँस गया। पूछा आराधना का भी ऐसा भंयकर परिणाम हो सकता है, मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। दूसरी तरफ से आवाज आती है, कर्मगति बहुत ही गहन है, इसको कोई नहीं जान सकता। कुछ देर विचार के बाद जब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि अब आगे क्या करना चाहिए तो मैंने उसी अदृश्य आवाज से पूछा, मैं तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि अब मुझे क्या करना चाहिए। अतः कृपया मेरा पथ प्रदर्शन करें, मैं वैसा ही करने को तैयार हूँ। इस प्रकार मेरे प्रार्थना करने पर दूसरे कमरे में से अवाज आती है कि जब यह हिल चुका है तो अपने निश्चित समय पर अपने आप हट जाएगा। अब इसे हिलाना बन्द करके कर्म क्षेत्र में विचरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करो। इन शब्दों के साथ ही साथ दृश्य गायब हो गया और मेरी आँख खुल गई। भोर हो चुकी थी, अतः नित्यकर्म से निवृत हो कर, भगवान् श्री कृष्ण की तस्वीर को ‘माला’ पहना कर छुटटी ले ली। यह करीब सन् 1974 के अन्तिम समय की बात है। इसके बाद 1983 तक मजदूर संगठनों और राजस्थान किसान यूनियन के विभिन्न पदों पर सक्रिय हो कर कार्य करता रहा। परन्तु जिस प्रकार से पूर्ण आस्था आध्यात्मिक जगत् के चमत्कारों से हो चुकी थी, ध्यान उस पर निरंतर ही लगा रहता था। भौतिक जगत् के अधिकतर काम आध्यात्मिक शक्तियों के पथ प्रदर्शन से करने का एक प्रकार से आदि हो गया था। यही कारण रहा कि बहुत कम असफलता मिली। जिस काम में हाथ डाला, सफल हुआ। सन् 1982 में एक प्रकार से स्पष्ट आदेश मिल चुका था कि अब मजदूर संगठन से अलग हो जाओ। परन्तु मैंने उसकी तरफ अधिक ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार आदेश को न मानने के कारण मुझे भौतिक जीवन में भारी असफलतओं और निराशा का सामना करना पड़ा। जबकि पहले मैं जिस काम में हाथ डालता था, मेरा हर कार्य सफल होता था।

      सौभाग्य से 1983 के मार्च-अप्रैल में संत सद्गुरुदेव (बाबा श्री गंगाईनाथ जी योगी) के चरण रज माथे पर लगाने का सौभाग्य मिला। इससे जीवन में एक प्रकार से नई चेतना पैदा होकर जीवन अधिक आनन्दमयी हो गया। परन्तु मेरे जीवन में सुख का समय बहुत ही कम रहा है। जून-जुलाई 1983 में भारी मानसिक उद्विग्नता का सामना करना पड़ा। जामसर जाने के आध्यात्मिक संकेत निरन्तर होते रहे, परन्तु मैं इन्हें दुर्भाग्यवश समझ नहीं सका। इस प्रकार 23 अगस्त 1983 को मेरे कार्य से अकारण ही अलग हो गया। अकारण ही घर पर बैठा रहा, परन्तु गुरुदेव की शरण में फिर भी नहीं जा सका। दुर्भाग्य से 31.12.1983 की काल रात्रि में वह (बाबाजी) भौतिक रूप से, संसार को छोड़कर चले गये। प्रथम भण्डारे की व्यवस्था के लिए सुजानदेसर निवासी बाबा राम नाथ जी जामसर जाते समय बीकानेर स्टेशन के सामने मिले। उनसे बाबा जी के स्वर्गवास की खबर सुनकर तो जमीन ही पैरों के नीचे से खिसकती नजर आई। बाबा राम नाथ जी ने भण्डारे में चलने के लिए काफी आग्रह किया, परन्तु भारी मन से उनसे क्षमा माँग कर, गंगाशहर चला गया। मेरे भौतिक पिता का सहारा भी तीन वर्ष की अल्प आयु में ही छीन लिया गया। और आध्यात्मिक पिता भी इसी प्रकार चन्द दिनों में ही ईश्वर के सहारे छोड़ कर चले गये। इस प्रकार भौतिक जीवन की तरह आगे का आध्यात्मिक जीवन भी मुझे संघर्षो में ही बिताने को मजबूर कर दिया गया। भौतिक जीवन का सम्बन्ध तो केवल जीविकोपार्जन तक का ही बहुत सीमित दायरे का था, उसमें भी भंयकर संकटों से गुजरना पड़ा। सुख नाम की वस्तु का आभास तक कभी नहीं हुआ। इस आध्यात्मिक जीवन का क्षेत्र तो सारे विश्व का मैदान है। भौतिक जीवन की तरह ही इस जीवन में भी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करना ही पड़ा, यह स्पष्ट नजर आ रहा है। ‘‘केवल ईश्वर के सहारे नितान्त अकेले इस पूरे संसार के मैदान में बिलकुल विपरीत और विषम परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए झोंक दिया गया हूँ।’’ अर्जुन की तरह सभी रास्ते अवरुद्ध कर दिये गये हैं। मात्र एक ही संघर्ष का रास्ता खुला छोड़ा गया है, मुझे अकेले ही संसार भर की इस आसुरी वृत्तियों से जूंझना पड़ेगा, यह देख कर कभी-कभी भारी निराशा का अनुभव करता हूँ। परन्तु जब पीछे के जीवन पर नजर डालता हूँ कि किस प्रकार नितान्त अकेला ही विपरीत विषम परिस्थितियों को परास्त करता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा हूँ तो कुछ हिम्मत बन्धती है। इसके अलावा दूसरा सहारा उस अदृश्य असीम सत्ता का है, जिसने पहले ही मेरे जीवन के अन्तिम सांस तक के पूरे जीवन के दृश्य, टुकड़ों में सिनेमा के टेलर की तरह दिखा रखे हैं। और आज भी वह पूर्ण सत्ता पग-पग पर मेरा पथ प्रदर्शन कर रही है। ‘‘मुझे प्रमाण सहित यह बता दिया गया है कि जो कुछ करना है वह पूर्व निर्धारित व्यवस्था है, उसमें रत्ति भर की हेरा फेरी भी सम्भव नहीं।’’ मुझे विषम परिस्थितियों में झोंक कर आध्यात्मिक आराधनाएँ करवा कर, कितनी शक्ति अर्जित करवा दी, उसका भी मैं हिसाब लगाने में असमर्थ था कि गुरुदेव अनायास ही इतनी अपार आध्यात्मिक सम्पति विरासत में दे गये, उसका अनुमान लगाना ही मेरे लिए संभव नहीं।

      मैं स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष महसूस कर रहा हूँ कि मैं तो मात्र एक कठपुतली हूँ, जिसे असीम सत्ता अपनी इच्छा के अनुसार नचा रही हैं। ‘‘मुझे स्पष्ट बता दिया गया है कि मैं इस भव सागर के आखिरी किनारे पहुँच चुका हूँ।’’ उस दयालु सर्व शक्ति मान ने झुक कर मेरा दाहिना हाथ अपने दाहिने हाथ में मजबूती से थाम लिया है। ऐसी स्थिति में थोड़ा सा प्रयास करने पर ही, मैं, इस भव सागर से बाहर निकल जाऊँगा। मुझे स्पष्ट समझा दिया गया है कि इसके लिए मेरा प्रयास नितान्त आवश्यक है, उसके बिना कार्य पूरा होना सम्भव नहीं है। कुछ इसी प्रकार के दिशा-निर्देशों और आदेशों के सहारे अकेला ही चल पड़ा हूँ। मुझे स्पष्ट बता दिया गया है कि ‘‘किन घाटियों, दर्दों और भंयकर से भंयकर जंगलों और रेगिस्थानों को पार करता हुआ कैसे, मैं उस सबसे उच्च शिखर पर पहुँचूँगा?’’ संसार के लोग इस समय उस पूर्ण सत्ता के बारे में बहुत थोड़ा ज्ञान रखते हैं, परन्तु पिछले कुछ समय से इन प्रयासों में अभूतपूर्व तेजी आई है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उस परम सत्ता का अवतरण हो चुका हैं और तय क्रमिक विकास के साथ अपना प्रकाष तेजी से संसार में फैला रही है। जैसे सूर्योदय का समय नजदीक आता जाता है, तारों का प्रकाश क्षीण होता जाता है। तारे अपनी सत्ता की इस गिरती हुई स्थिति को बिलकुल पसन्द नहीं करते हैं, परन्तु उसके बावजूद इन सभी तारों के विरोध के, सूर्योदय का समय नहीं घटता। इस प्रकार ज्यों ही वह उदय होता है, सभी तारों की सत्ता उनके यथास्थिति बने रहने पर ही लोप हो जाती है, संसार की आज ठीक वही स्थिति है। विभिन्न मत-मतान्तरों और धर्मों के धर्म गुरुओं को यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है, परन्तु तारों की तरह उनका भी कोई वश नहीं चलेगा। सभी पूर्ण असहाय होकर ताकते रह जाएँगे। महर्षि अरविन्द ने इसे स्पष्ट देख लिया था। अतः उन्होंने उस शक्ति के अवतरण की स्पष्ट घोशणा कर दी थी। मैं स्पष्ट महसूस कर रहा हूँ, जब मैं प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार की बात करता हूँ तो संसार के लोग अविश्वास के साथ प्रश्न वाचक दृष्टि से मेरी तरफ देखने लगते हैं। उन्हें मेरी बात का बिलकुल विश्वास नहीं होता। जब मैं ‘नाम खुमारी’ और ‘नाम अमल’ की बात करता हूँ तो उनको बिलकुल ही विश्वास नहीं होता। प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार की बात हमारे सभी ऋषि कह गये हैं, जिसे पिछली सदी में स्वामी विवेकानन्द जी ने संसार के सामने दोहराया है। नाम खुमारी और नाम अमल के बारे में स्पष्ट रूप से संत सद्गुरु नानक देव जी तथा कबीर साहब खुलासा कर गये हैं। परन्तु तामसिक शक्तियों का एक छत्र साम्राज्य होने के कारण, इस युग का मानव इसे समझने में असमर्थ है। इसमें इस युग का मानव दोषी नहीं है, यह तो इस युग का गुणधर्म है। अगर संसार की ऐसी स्थिति नहीं होती तो उस परम सत्ता का अवतरण सम्भव नहीं होता।

      जब मैं सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर तथा आत्मा की बात करता हूँ और उसकी प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार को सम्भव बताता हूँ तो इस युग के लोग हतप्रभ मेरी तरफ ताकने लगते हैं। इस प्रकार मैं देखता हूँ कि अगर मैं माया के लोकों के परे के सत् लोक, अलख लोक और अगम लोक की बात करनी प्रारम्भ कर दी तो इस युग का मानव पूर्ण रूप से विद्रोह कर देगा। जब माया के क्षेत्र में रहते हुए होने वाली अनुभूतियाँ का इस युग के मानव को ज्ञान होना असम्भव लगता है तो मायातीत लोकों की तो बात पूर्ण रूप से काल्पनिक और असत्य मानेगा। मुझे उपर्युक्त आध्यात्मिक जगत् के विभन्न लोकों की जानकारी और प्रत्यक्षानुभूति काफी समय से हो रही है। इस प्रकार की सभी अनुभूतियाँ भौतिक जगत् में भी सत्यापित होती रही हैं। परन्तु मैं दूसरों को यह अनुभूति करवाने की स्थिति में नहीं था। गुरुदेव के स्वर्गवाश के बाद, जब मेरे से सम्बन्धित लोगों को ये सभी अनुभूतियाँ होने लगी तो मुझे बहुत आश्चर्य होने लगा। क्योंकि मैं हिन्दू धर्म के दार्शनिक पक्ष से, पहले से पूर्ण रूप से अनभिज्ञ था, इस लिए मैं इसे बिलकुल नहीं समझ सका। दर्शन शास्त्र के कई लोगों से सम्पर्क करने पर पता लगा कि जब सच्चा आध्यात्मिक संत अपने अन्तिम समय के निकट पहुँच जाता है तो उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाने के कारण वह त्रिकाल दर्शी हो जाता है। इस प्रकार शक्तिपात द्वारा सभी आध्यात्मिक शक्तियों किस व्यक्ति को सौंप कर जाना है, इसका पूर्ण ज्ञान उसको हो जाता है। अतः वह अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर उसे अपने पास बुला कर समर्पण करवाता है, और इस प्रकार समर्पण के समय शक्ति पात के सिद्धान्त द्वारा अपनी सारी शक्तियाँ उस व्यक्ति में प्रविष्ट कर देता है। परन्तु जब तक वह संत भौतिक रूप से इस संसार में मौजूद रहता है, सारी शक्तियाँ मूल रूप से उसी के अधीन कार्य करती हैं। ज्यों ही वह शरीर त्याग करता है, सारी शक्तियाँ उस व्यक्ति में पूर्ण रूप से प्रविष्ट कर जाती हैं, जिसमें उस संत ने शक्तिपात किया था। इस प्रकार उस व्यक्ति के द्वारा उन शक्तियों का चमत्कार भौतिक रूप से जब प्रकट होने लगता है तो धीरे-धीरे सारी स्थिति उसके समझ में आती जाती है। इस प्रकार ‘‘मेरे गुरुदेव’’ ने अनायास ही कृपा करके विरासत में मुझे इतना अपार ‘‘आध्यात्मिक धन’’ दे दिया है, जिसका पूर्ण ज्ञान मुझे आज की स्थिति में तो नहीं है। श्री अरविन्द ने स्पष्ट कहा है, संसार का कोई भी कार्य कमोवेश ‘‘अध्यात्म शक्ति’’ से परिपूर्ण है।

      इस युग के तथाकथित अध्यात्मवादियों ने भौतिक जगत् और आध्यात्मिक जगत् को दो भागों में विभक्त करके बीच में जो कृत्रिम लक्ष्मण रेखा खींच दी है, वही आध्यात्मिक ज्ञान के लोप होने का मुख्य कारण है। श्री अरविन्द ने स्पष्ट कहा है, ‘‘जब भौतिक सत्ता, आध्यात्मिक सत्ता की अधीनता स्वीकार करके उसके आदेशों का पालन प्रारम्भ कर देगी, उसी दिन धरा पर स्वर्ग उतर आएगा।’’ एक साल के कारावास के काल में श्री अरविन्द को जो अनुभूतियाँ हुई, उनका वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि ‘‘भगवान् ने मुझे स्पष्ट बता दिया है कि जो लोग आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनमें मेरी शक्ति काम कर रही है और जो लोग विरोध कर रहे हैं, वे भी मेरी शक्ति के आदेश से ही कार्यरत हैं। इस प्रकार सारा संसार मेरी ही शक्ति के कारण क्रियाशील है। मेरी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता।’’ इस प्रकार हम देखते हैं कि संसार के सभी प्राणी कठपुतली मात्र हैं जैसे-जैसे परम सत्ता नचाती है, नाचना पड़ता है। इस प्रकार मुझे अच्छी तरह समझा दिया गया है। जो कुछ होना है वह पूर्व नियोजित है, उन्हीं अनुभूतियों के आधार पर, मैं हर क्षेत्र में भौतिक साधन की कुछ भी परवाह किये बिना निकल पड़ता हूँ। आज तक की प्रत्यक्षानुभूतियों ने मुझे पूर्ण रूप से आश्वस्त कर दिया है। भौतिक साधनों के अभाव में कोई भी कार्य नहीं रुक सकता। प्रारम्भ से लेकर आज तक की मेरी वस्तु स्थिति पर, जब मैं एक साथ नजर डालता हूँ तो पाता हूँ कि मेरे माध्यम से जो सत्ता अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रही है, उसमें मेरी बुद्धि और मेरी किसी भी शक्ति के सहयोग का रत्ति भर भी योगदान नहीं रहा है। मेरे न चाहते हुए भी वह परम सत्ता मुझे अपनी मर्जी से नचा रही हैं। इसी कारण जो कुछ भी मेरे माध्यम से करवाया जा रहा है, इस लिए मेरे अन्दर कर्ता भाव बिल्कुल नहीं है। इस सम्बन्ध में, मैं पूर्ण रूप से आश्वस्त हूँ। मुझे किसी प्रकार का वहम (भ्रम) नहीं है।

      मैंने गुरुदेव-ईश्वर से स्पष्ट शब्दों में प्रार्थना कर रखी है कि मैं हर प्रकार से नाचने को तैयार हूँ, परन्तु उसमें घाटा नफा आपका ही होगा। मैं तो मात्र मजदूरी का ही अधिकारी हूँ। मुझसे सम्बन्धित लोग श्रद्धा वश जब मुझे किसी कार्य का श्रेय देते हैं तो मैं उन्हें स्पष्ट रूप से कह देता हूँ कि भाई जो कुछ हो रहा है, वह ईश्वर के आदेश और गुरु कृपा के कारण हो रहा है। मैं तो मात्र आप लोगों की तरह साधारण प्राणी हूँ, जो कुछ हो रहा है, उसका श्रेय लेने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। मेरी महत्त्वाकांक्षाएँ तो मुझे कुछ और ही करने को प्रेरित करती हैं, परन्तु परिस्थितियों वश मुझे करना कुछ और ही पड़ रहा हैं। अतः मैं यह झूठा श्रेय लेने को बिलकुल तैयार नही हूँ।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग 12/02/1988

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