Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

गुरुदेव की दिव्य लेखनी से.....

गुरु क्या है?

हमारे धर्मशास्त्रों में ‘गुरु’ की बहुत महिमा गाई गई है। गुरु का पद ईश्वर से भी बड़ा माना गया है। इसलिए वेदान्त धर्म को मानने वाले, आजकल संसार के लोग जिन्हे हिन्दू कह कर संबोधित करते है, गुरु शिष्य-परम्परा को बहुत महत्त्व देते हैं। हमारी इसी मान्यता के कारण कुछ चतुर लोगों ने इस पद पर एकाधिकार कर लिया है।एक वर्ग विशेष के घर में जन्मा बच्चा, जन्म से ही गुरु पैदा होता है। धर्म और गुरुपद का जितना दुरुपयोग इस युग में हो रहा है, आज तक कभी नहीं हुआ। गुरुओं की एक प्रकार से बाढ़ आ गई है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध, इस युग में पूर्ण रूप से आर्थिक आधार पर टिका हुआ है।

       आज का गुरु पूरे परिवार का स्वतः गुरु बन जाता है। यह सम्बन्ध आर्थिक शोषण पनपा रहा हैं, अतः हमें इस सम्बन्ध में गहराई से चिन्तन करने की आवश्यकता है। हमारे शास्त्रों में गुरुपद की जो महिमा की गई है, वह गलत नहीं हो सकती, फिर इस पद की दुर्गति क्यों हो रही है? हमें इस बात की असलियत का पता लगाना चाहिए कि आखिर गुरु तत्व क्या है ?  क्या ऐसे ही गुरुओं का हमारे शास्त्रों में गुणगान किया गया है ? हमारे संतों ने गुरु के बारे जो कुछ कहा है, उन्हीं गुण धर्म का प्राणी गुरु कहने योग्य है। संत कबीर ने गुरु की महिमा करते हुए कहा है कि –

कबीरा धारा अगम की, सद्गुरु दई लखाय।

उलट ताहि पढ़िए सदा, स्वामी संग लगाय॥

इसके अलावा सभी संतों ने गुरु की एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर महिमा गाई है।

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, किसके लागू पाय।

बलिहारी गुरुदेव की, गोविन्द दियो मिलाय।”

       उपर्युक्त बातों से यही नतीजा निकलता है कि जिसमें गोविन्द से मिलाने की शक्ति है, मात्र वही गुरु कहलाने का अधिकारी है, गुरु पद का अधिकारी है। यह काम जो नहीं कर सकता, उसे कम से कम गुरु कहलाने का तो अधिकार नहीं है, बाकी वह कुछ भी बन सकता है। गुरु एक पद है । इस पर पहुँचने के लिए कई बातों की आवश्यकता है। जैसे भौतिक जगत् के पदों के लिए निर्धारित भौतिक ज्ञान की जरूरत है, उसी प्रकार इस पद पर पहुँचने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान की जरूरत है, क्योंकि यह पद आध्यात्मिक है।

       जिस प्रकार लोहे में विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में से गुजरने के बाद चुम्बकीय आकर्षण पैदा होता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य गहन आध्यात्मिक आराधनाओं से गुजरता हुआ, अपने संत सतगुरु की शरण में जाता है। गुरु अगर पात्र समझता है तो अपनी शक्तिपात उस शिष्य में कर देता है, जो कि पूर्ण रूप से समर्पित हो चुका होता है। इस प्रकार की शक्तिपात से मनुष्य ‘द्विज’ बन जाता है। इस प्रकार वह गुरु पद का अधिकारी तो हो जाता है, परन्तु उसे वह पद तब तक प्राप्त नहीं होता, जब तक उसका गुरु पंच भौतिक शरीर में रहता है। ज्यों हि गुरु का शरीर शान्त होता है, वे सभी आध्यात्मिक शक्तियाँ उस शिष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाती है । इस सारी क्रियाओं का ज्ञान केवल गुरु को ही होता है।

       जिस शिष्य में शक्तिपात किया जाता है, वह गुरु के रहते हुए अनभिज्ञ ही रहता है। ज्यों ही गुरु का शरीर शान्त होने पर सारी शक्तियाँ उसमें प्रविष्ट होकर भौतिक जगत् में अपना प्रभाव दिखाने लगती है तो धीरे-धीरे उसे आभास होने लगता है। इस प्रकार जिसे अनेक जन्मों के कर्म फल के प्रभाव से ईश्वर कृपा और गुरु के आशीर्वाद से गुरु पद प्राप्त होता है वही सच्चा आध्यात्मिक गुरु होता है। जिस प्रकार कर्मफल के अनुसार विशेष योग्यता पाने के बाद भौतिक पद की प्राप्ति होती, ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक गुरु का पद प्राप्त होता है। भौतिक पद का समय निर्धारित है परन्तु आध्यात्मिक जगत् का गुरुपद जीवन भर के लिए प्राप्त होता ।

       ऐसा गुरु भौतिक जगत् में अपना कार्य पूर्ण करके जब अपने अन्तिम समय के पास पहुँच जाता है तो उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। वह त्रिकालदर्शी बन जाता है। अपनी इस विचित्र स्थिति के कारण, वह उस उपयुक्त पात्र को, एक आसन पर बैठा ही खोज लेता है, जिसे वह गुरु पद सौंप कर, इस भौतिक संसार से विदा लेनी चाहता है। अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल से उसे अपने पास बुलाकर समर्पण करवाता है और फिर आश्वस्त होकर प्रभु के ध्यान में लीन हो जाता है। इस प्रकार जिस व्यक्ति को गुरु पद प्राप्त किया हुआ होता है, इसमें मनुष्य का प्रयास अधिक सहायक नहीं होता। सच्चा गुरु वही होता है जो पूर्ण रूप से चेतन हो चुका होता है, उसका सीधा सम्बन्ध ईश्वर से होता है ।

       इसलिए जो प्राणी ऐसे गुरु से जुड़ जाता है, उसे तत्काल आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होने लगती है। आध्यात्मिक शक्तियाँ उसका भौतिक जगत् में पथ प्रदर्शन करने लगती है। इस प्रकार वह प्राणी भौतिक तथा आध्यात्मिक रूप से बहुत उपर उठ जाता है। तामसिकता उससे कोसों दूर भागती है। इस प्रकार शान्त, स्थिर और निर्भय, वह प्राणी अपना ही नहीं संसार के अनेक जीवों का कल्याण करता हुआ, अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। यह होता है। आध्यात्मिक संत सद्गुरुदेव की कृपा का प्रभाव। ऐसा संत पुरुष जो मनुष्यों को द्विज बनाने की स्थिति में पहुँच जाता है, गुरु कहलाने का अधिकारी होता है। गुरु पद कोई खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं है। यह पद न किसी जाति विशेष में जन्म लेने से प्राप्त होता है, न कपड़े रंग कर स्वांग रचने से, न किसी शास्त्र के अध्ययन से। यह तो मन रंगने की बात है। ईश्वर करोड़ों सूर्यों से भी अधिक उर्जा का पूँज है, ऐसी परमसत्ता से जुड़ने के कारण, गुरु पारस बन जाता है। अतः जो मनुष्य इस पारस के सम्पर्क में आता है, सोना बन जाता हैं । ऐसे गुण धर्म के बिना जितने भी गुरु संसार में विचरण कर रहे हैं, सभी ने अपने पेट के लिए विभिन्न स्वांग रच रखे हैं। संसार के भोले प्राणियों को भरमाकर अपना स्वार्थसिद्ध कर रहे हैं। आध्यात्मिक जगत् में धन की मुख्य भूमिका नहीं होती। यह तो श्रद्वा, विश्वास, प्रेम, दया और समर्पण का जगत् है, धन की भूमिका इस जगत् में गौण है। सच्चा संत सद्गुरु भाग्य से ही मिलता है, इसमें मानवीय प्रयास अधिक सहायक नहीं होते हैं।

Read more

शक्तिपात - दीक्षा क्या है ?

गुरु-शिष्य परम्परा में दीक्षा का, एक विधान है। सभी प्रकार की दीक्षाओं में “शक्तिपात – दीक्षा” सर्वोत्तम होती है। इसमें गुरु अपनी इच्छा से, चार प्रकार से शिष्य की शक्ति (कुण्डलिनी ) को चेतन करके सक्रिय करता है –(1) स्पर्श से (2) दृष्टि मात्र से (3) शब्द (मंत्र) से (4) संकल्प मात्र से भी। दीक्षा के बाद साधक को तत्काल उस परमतत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति होती है, उस दीक्षा को ”शाम्भवी दीक्षा” कहते हैं। यह महान् दीक्षा है। बहुत ही थोड़े साधकों को ऐसी दीक्षा की शक्ति के प्रभाव को सहने की सामर्थ्य होती है। ऐसे साधकों को पातंजलि योगदर्शन में “भवप्रत्यय योगी” की संज्ञा दी है। इस सम्बन्ध में समाधिपाद के 11 वें सूत्र में कहा है 

      भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।( 19-1)

 विदेह और प्रकृतिलय योगियों का (उपर्युक्त योग ) भवप्रत्यय कहलाता है।”

     (1) स्पर्श दीक्षाः- इसमें गुरु अपनी शक्ति; शिष्य में तीन स्थानों – भूमध्य में अर्थात् आज्ञा-चक्र में, दूसरा हृदय, तीसरा मेरूदण्ड के नीचे मूलाधार पर स्पर्श करके प्रवाहित करता है।      

     (2) मंत्र दीक्षाः- गुरु की शक्ति, शिष्य में मंत्र के द्वारा प्रवाहित होती है। ‘गुरु’ जिस मंत्र की दीक्षा देता है, उसे उसने लम्बे समय तक जपा हुआ होता है। मंत्र शक्ति को आत्मसात किया हुआ होता है। उस मंत्र में और गुरु में कोई अन्तर नहीं रहता । गुरु का सम्पूर्ण शरीर मंत्रमय बन जाता है, ऐसे चेतन मंत्र की, गुरु जब दीक्षा देता है, वही मुक्ति देता है।      

     (3) दृष्टि (हक-दीक्षा ):- अर्थात् मात्र दृष्टि द्वारा दी जाने वाली दीक्षा। ऐसी दीक्षा देने वाले गुरु की दृष्टि, “अन्तर-लक्षी’ होती है। यह दीक्षा वही गुरु दे सकता है, जिसने सद्गुरु से दीक्षा ली हुई हो, और जो स्वयं भी अन्तर लक्षी हो। अन्यथा यह दीक्षा देना पूर्ण रूप से असम्भव है।     

     ऐसे महात्माओं की आँखें खुली होती है, परन्तु वास्तव में उनका ध्यान निरन्तर अन्तरात्मा की ओर ही लक्षित रहता है। ऐसे संतों की तस्वीर देखने से सही स्थिति का पता लग जाता है। ऐसे संतो में-संत सद्गुरुदेव श्री नानक देवजी महाराज, संत श्री कबीर दासजी, श्री रामकृष्ण परमहंस इत्यादि अनेक संत हमारी पवित्र भूमि में प्रकट हो चुके हैं।      

      मेरे परम पूज्य, मोक्षदाता संत सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाईनाथजी योगी (ब्रह्मलीन) भी उपर्युक्त संतों की स्थिति में पहुँचे हुए, परम-सिद्धयोगी थे। यह सच्चाई सद्गुरुदेव का चित्र देखते ही प्रकट होती है। ऐसे परम दयालु सर्वशक्तिमान, मुक्तिदाता सद्गुरुदेव की, अहैतु की कृपा के कारण ही मेरे जैसे साधारण व्यक्ति में भी वह शक्ति प्रकट हो गई।     

     (4) मानस (संकल्प-दीक्षा) जिसमें गुरु से दीक्षा लेने का मानस बनाने मात्र से ही दीक्षा मिल जाती हैं । ऐसे कई उदाहरण मुझे मेरे आध्यात्मिक जीवन में देखने को मिले हैं। मेरे अनेक शिष्य हैं, जिनमें कुछ तो अत्यधिक चेतन हैं। उनसे बातें करने से तथा मेरी व गुरुदेव की तस्वीर देखने मात्र से कई लोगों का ध्यान लगने लगता हैं तथा यौगिक क्रियाएँ स्वतः होने लगती हैं। परन्तु ऐसे शिष्य बहुत कम ही हैं। इस तथ्य से एकलव्य की प्रतीक-साधना सत्य प्रमाणित होती है।       हमारे शास्त्रों के अनुसार जब तक मनुष्य की कुण्डलिनी जाग्रत होकर सहस्रार में नहीं पहुँचती, तब तक मोक्ष नहीं होती । पृथ्वी तत्त्व का आकाश तत्व में लय होने का नाम ही मोक्ष है, कैवल्यपद की प्राप्ति है। सिद्धयोग अर्थात् महायोग में शक्तिपात-दीक्षा द्वारा गुरु अपनी शक्ति से शिष्य की कुण्डलिनी को जाग्रत करता है। गुरु की व्याख्या करते हुए कहा गया है- “वह शिष्यों को उनके अन्तर में प्रभावी किन्तु सुप्त शक्ति (कुण्डलिनी ) को जाग्रत करता है और साधक को उस परमसत्य से साक्षात्कार-योग्य बनाता है।

”कुण्डलिनी जागरण के सम्बन्ध में कहा है –      

 ‘‘यावत्सा निद्रिता देहे तावत जीवः पशुर्यथा।

ज्ञानम् न जायते तावत कोटियाग-विधैरपि।’’

 स्वामी विष्णु तीर्थ – शक्तिपात ।।

      ‘‘जब तक कुण्डलिनी शरीर में सुषुप्तावस्था में रहेगी, तब तक मनुष्य का व्यवहार पशुवत् रहेगा। और वह उस दिव्य-परमसत्ता का ज्ञान पाने में समर्थ नहीं होगा, भले ही वह हजारों प्रकार के यौगिक अभ्यास क्यों न करे।” गुरु कृपा रूपी, शक्तिपात दीक्षा से जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है, तब क्या होता है? इस सम्बन्ध में कहा है –      

सुप्त गुरु प्रसादेन यदा जागृति कुण्डली।

तदा सर्वानी पद्मानि भिदयन्ति ग्रन्थयो पिच॥

( ‘‘स्वात्माराम, हठयोग प्रदीपिका”- 3,2 )

      ‘‘जब गुरुकृपा से सुप्त कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है, तब सभी चक्रों और ग्रन्थियों का (ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रूद्रग्रन्थि ) भेदन होता है। इस प्रकार साधक समाधि स्थिति, जो कि समत्त्व बोध की स्थिति है, प्राप्त कर लेता है। शक्तिपात होते ही साधक को प्रारब्ध कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ (आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम ) स्वतः ही होने लगती हैं। शिष्य में जाग्रत हुई शक्ति (कुण्डलिनी) पर गुरु का पूर्ण प्रभुत्व रहता है, जिससे वह उसके वेग को नियन्त्रित और अनुशासित करता है।

      कुण्डलिनी को हमारे शास्त्रों में ‘जगत् जननी’ कहा है। वह उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है, जो सर्वज्ञ है, सर्वत्र है, सर्वशक्तिमान है। अतः जिस साधक की कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है, उसे अनिश्चितकाल तक के भूत-भविष्य एवं वर्तमान काल की प्रत्यक्षानुभूति एवं साक्षात्कार होने लगता है।

      भौतिक विज्ञान मानता है कि जो शब्द बोला जा चुका है, वह कभी नष्ट नहीं होता। अगर मानव के पास उपयुक्त यन्त्र हो तो उसे पुनः सुना जाना सम्भव है। हमारा योगदर्शन कहता है कि केवल सुना ही नहीं जा सकता है, बोलने वाले को बोलते हुए देखा-सुना जाना भी सम्भव है। जो फिल्म बन चुकी है, उसको देखने-सुनने में क्या कठिनाई है।

      हमारा योग-दर्शन तो स्पष्ट शब्दों में कहता है कि जो घटना नहीं घटी है, उसको भी देखा व सुना जाना संभव है। अनेक शिष्य इसको प्रमाणित करने में सक्षम हैं। हमारा पतंजलि योगदर्शन उपर्युक्त तथ्यों को प्रमाणित करता है। इसी शक्तिपात-दीक्षा के कारण ही पश्चिम को दिव्य आनन्द और अनिश्चित काल तक के भूत-भविष्य की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार होगा, बाइबल की भविष्यवाणियों का मात्र यही अर्थ है।

      प्रेरितों के कार्य के 2:14 से 18 में स्पष्ट शब्दों में कहा है – ” पतरस उन ग्यारह के साथ खड़ा हुआ और ऊँचे शब्द से कहने लगा, कि हे यहूदियों, हे यरूशलेम के सब रहने वालों, यह जान लो और कान लगाकर मेरी बातें सुनो। जैसा तुम समझ रहे हो, ये नशे में है , ऐसा नही, क्योंकि अभी तो पहर ही दिन चढ़ा है।

       परन्तु यह बात है, जो योएल भविष्यवक्ता के द्वारा कही गई है ! कि परमेश्वर कहता है कि अन्त के दिनों में ऐसा होगा कि मैं अपना आत्मा सब मनुष्यों पर उड़ेलूंगा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारी बेटियाँ भविष्यवाणी करेंगी और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे और तुम्हारे पुरनिए (वृद्ध ) स्वप्न देखेंगे। वरन् मैं अपने दासों और अपनी दासियों पर भी उन दिनों में अपने आत्मा में से उड़ेलूंगा और वे भविष्यवाणी करेंगे।”

      इसी संदर्भ में, जिस सहायक के भेजने की भविष्यवाणी यीशु ने की है, उसी की शक्तिपात-दीक्षा के कारण यह दिव्य-आनन्द और ज्ञान प्राप्त होगा। इस सम्बन्ध में प्रेरितों के कार्य 2:33 में कहा है – इस प्रकार परमेश्वर के दाहिने हाथ से सर्वोच्च पद पाकर और पिता से वह पवित्र आत्मा प्राप्त करके जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी, उसने यह उँडेल दिया है, जो तुम देखते और सुनते हो।’

      इस शक्तिपात-दीक्षा का वर्णन अनेक दार्शनिक ग्रन्थों में मिलता है। जैसा कि स्वामी श्री विवेकानन्द जी ने कहा है, ” यह ज्ञान मात्र हमारे दर्शन की ही देन है।” परन्तु कलियुग के गुणधर्म के कारण यह दिव्य विज्ञान इस समय हमारी धरती पर से लोप प्रायः हो चुका है। शक्तिपात-दीक्षा के बाद, मेरे साधकों की कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है। इससे उन्हें विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ जैसेः- आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम स्वतः होने लगते हैं। वह शक्ति (कुण्डलिनी)साधक का शरीर, प्राण, मन और बुद्धि अपने स्वायत( अधीन ) कर लेती है।

      इस प्रकार साधक को जो विभिन्न प्रकार के आसन्न, बन्ध, मुद्राएँ और प्राणायाम होते हैं, उनमें साधक का स्वयं का प्रयास कुछ भी नहीं रहता है। न तो वह उन्हें करने की स्थिति में होता है और न ही रोकने की। भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को इस दिव्य विज्ञान के कारण, अनेक समस्याओं का समाधान करने में भारी सफलता मिलेगी। कुण्डलिनी (चित्ति) उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है। अतः उसमें ज्ञान की ”पराकाष्ठा” है। वह अजर-अमर है तथा सर्वज्ञ एवं सर्वत्र है। अतः उसके जाग्रत होने पर साधक को भूत, भविष्य एवं वर्तमान की पूर्ण जानकारी होने में कोई आश्चर्य नहीं है। ईश्वर को सच्चिदानन्द धन (सत् चित् व आनन्द) कहते हैं।

       अतः कुण्डलिनी के जाग्रत होने पर साधक को इन्द्रियातीत दिव्य अक्षय आनन्द की निरन्तर प्रत्यक्षानुभूति होने लगती है। इस दिव्य आनन्द के सामने सभी प्रकार के नशों से घृणा हो जाती है और बिना किसी प्रकार के कष्ट के, उनसे सहज रूप में पूर्ण मुक्ति मिल जाती है। मेरे साधकों में बहुत लोग ऐसे हैं जो शराब, अफीम, भांग, गांजा आदि के नशों से बुरी तरह ग्रसित थे। इस दिव्य आनन्द के कारण सभी साधक उन सभी प्रकार के नशों से, बिना किसी प्रक कष्ट या मानसिक कष्ट के पूर्ण रूप से मुक्त हो चुके हैं।

      यही नहीं इस दिव्य आनन्द के कारण मानसिक तनाव पूर्ण रूप से शान्त हो जाता है तथा उससे सम्बन्धित सभी रोग जैसे उन्माद, रक्तचाप, अनिद्रा आदि बिना दवा के स्वतः पूर्णरूप से खत्म हो जाते हैं। विद्युत उपचार से ठीक न होने वाले कई रोगी पूर्ण रूप से रोग मुक्त हो चुके हैं। दो ऐसे रोगी आये जो इन्सुलीन चिकित्सा से भी ठीक नहीं हो सके थे, इस शक्तिपात-दीक्षा से मिलने वाली आनन्द रूपी शान्ति के कारण पूर्णरूप से स्वस्थ हो चुके हैं। हमारे दर्शन में योगदर्शन के अतिरिक्त भी इस दिव्य आनन्द का वर्णन मिलता है। गीता के 5 वें अध्याय के 21 वें तथा 6 वें अध्याय के 15वें 21वें 27 वें तथा 28 वें श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने जिस बारीकी से इस दिव्य आनन्द की व्याख्या की है, अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।

      बाह्मस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।

स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥5:21॥

       ‘‘बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अन्त:करण वाला पुरूष अन्तःकरण में जो भगवत्-ध्यान जनित आनन्द है, उसको प्राप्त होता है (और) वह पुरूष सच्चिदानन्दधन परब्रह्म परमात्मारूप योग में एकीभाव से स्थित हुआ, अक्षय आनन्द को अनुभव करता है।

      युजन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।6:15॥

       ‘‘इस प्रकार आत्मा को निरन्तर (परमेश्वर के स्वरूप में ) लगाता हुआ स्वाधीन मनवाला योगी मेरे में स्थित रूप परमानन्द पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है।”

      सुखमात्यन्तिकं यत्तद बुद्धि ग्राह्यमतीन्दियम।

वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।। 6:21।।गीता ‘‘

      ‘‘इन्द्रियों से अतीत केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ यह योगी भगवत स्वरूप से चलायमान नहीं होता है।”

      प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।

उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।6:27॥

      ‘‘क्योंकि जिसका मन अच्छी प्रकार शान्त है (और ) जो पाप से रहित है (और ) जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दनधन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को अति उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।”

      युजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्श मत्यन्तं सुखामश्नुते ॥ 6:28।। “

        ‘‘पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ, सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनन्द को अनुभव करता हैं।”

       वैदिक मनोवैज्ञानिक ( अध्यात्म विज्ञान ) के अनुसार मनुष्य का शरीर सात प्रकार के कोशों (शैलों) से संघटित हैं, जिनके खोलों (कोशों) में आत्मा अन्तर्निहित है। वे हैं- (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञान मय कोश (5)आनन्दमय कोश(6) चितमय कोश (7) सतमय कोश। हमारे विकास की वर्तमान अवस्था में साधारण मानव ने अपने नित्य व्यवहार के लिए पहले तीन कोशों का ही विकास किया है।

      कुछ मनुष्य सामर्थ्यपूर्वक विज्ञानमय कोश का प्रयोग करने में भी सक्षम है । क्योंकि इस समय विज्ञान अपने निज धाम से संचालित न होकर, बुद्धिप्रधान मन में स्थित होकर कार्य करता है। यही कारण है, विज्ञान सृजन के स्थान पर विध्वंश का कार्य अधिक कर रहा है। योगी इससे भी परे साक्षात् विज्ञान ( विज्ञानमय कोश के निजधाम ) तक जा पहुँचता है। जब विज्ञान अपने निजधाम में संचालित होकर कार्य करेगा, तब इसका सम्पूर्ण उपयोग मात्र सृजन में ही होगा। इसीलिए महर्षि श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है ।

      ‘‘भारत, जीवन के सामने योग का आदर्श रखने के लिए उठ रहा है। वह योग के द्वारा ही सच्ची स्वाधीनता, एकता और महानता प्राप्त करेगा और योग के द्वारा ही उसका रक्षण करेगा।”

      याज्ञवल्क्य जैसे महानतम ऋषि तो साक्षात् आनन्द तक पहुँच चुके हैं। परन्तु अन्तिम दो कोश अभी तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। सिद्धयोग अर्थात् महायोग जो गुरु कृपारूपी शक्पिात दीक्षा से सिद्ध होता है, उसके साधक सातों कोशों का ज्ञान प्राप्त करने में सफल हुए हैं।

      ऐसे अनेक उदाहरण हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं। पतंजलि योग दर्शन तो केवल 195 सूत्रों में कैवल्य पद पर पहुँचने की क्रियात्मक विधि बताता है।

      ‘‘मनुष्य योनि ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।” सभी का मत है कि मानव का सृजन उसके सृजनहार की प्रतिमूर्ति के रूप में हुआ है। अतः मनुष्य अपना क्रमिक विकास करते हुए अपने सृजनहार के ‘तद्प’ बन सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने मनुष्य की व्याख्या करते हुए गीता के 13 वें अध्याय के 22 वें श्लोक में स्पष्ट शब्दों में कहा है

      उपदष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहे स्मिन्युरूषः परः ॥

       ‘‘पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ( त्रिगुणातीत ) है। (केवल ) साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीव रूप से भोक्ता तथा ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दधन होने से ‘‘परमात्मा” ऐसा कहा गया है।”

      इस इन्द्रियातीत आनन्द को संतों ने “हरि नाम की खुमारी” की संज्ञा दी है। संत सद्गुरु श्री नानकदेवजी ने कहा है

      भांग धतुरा नानका, उतर जाय प्रभात।

नामखुमारी “नानका चढ़ी रहे दिन रात ।।”

      संत कबीर दास जी ने कहा है –

      नाम-अमल’ उतरे न भाई।

और अमल छिन्न-छिन्न चढ़ि उतरै।

नाम -अमल’ दिन बढ़े सवायो।।”

      बाइबल भी स्पष्ट कहती है- ”यह एक आन्तरिक आनन्द है, जो सभी सच्चे विश्वासियों के हृदय में आता है। यह आनन्द हृदय में बना रहता है, सांसारिक आनन्द से तब तक भरता है, जब तक उमड़ न जाय। प्रभु का आनन्द जो हमारे हृदयों में बहता है, हमारे हृदयों से उमड़ कर दूसरों तक बह सकता है।” यह आनन्द ही शान्ति स्थापित करेगा। 

-समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

संसार का हर परिवर्तन पूर्व निश्चित है।

संसार की यह कहावत कि ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, पूर्ण सत्य है।

       भगवान् श्री कृष्ण ने 11 वें अध्याय के 32-34 श्लोक में स्पष्ट कहा है :-

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो,लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे,येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥32॥

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून्भुड्.क्ष्व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्र भव सव्यसाचिन्॥33॥

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथ च, कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।

मयाहतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा,युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥34॥

       (मैं) लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत हुआ हूँ, जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धालोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे। इससे तूं खड़ा हो और यश को प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। यह सब (शूरवीर) पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं।हे सव्यसाचिन केवल (तू) निमित्तमात्र ही हो जा।।

       द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योधाओं को तूं मार, भय मत कर, निःसन्देह (तू) युद्ध में वैरियों को जीतेगा, इस लिए युद्ध कर।

       भगवान् के उपर्युक्त उपदेश से स्पष्ट होता है कि यह सारा संसार एक ही परमसत्ता का विस्तृत स्वरूप है। जीव, संसार के हर कार्य में निमित मात्र है। ईश्वर की त्रिगुणमयी माया जीवों को भरमाती हुई अपनी इच्छा से चला रही है। जीव अन्धकार वश झूठे अहम् में आकर जबरदस्ती कर्ता बन बैठता है और इस प्रकार तामसिक वृत्तियों के चक्कर में फंस कर, जन्म-मरण के जाल में हँसा हुआ, दुःख भोग रहा है। स्थिति को और स्पष्ट करते हुए भगवान् ने18 वें अध्याय के 61 वें श्लोक में कहा है :-

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति।।

भामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।61॥

       हे अर्जुन ! शरीर रूपी यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से भरमाता हुआ, सब भूत प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। ऐसी स्थिति में भी जीव अपने अन्दर विराजमान उस परमसत्ता की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार के अभाव में जन्म-मरण के चक्कर में फंस कर भंयकर दुःख भोग रहा है। इस युग में सभी आराधनाएँ बहिर्मुखी हैं, ऐसी स्थिति में ईश्वर का दर्शन और प्रत्यक्षानुभूति असम्भव है।

       तोते की तरह धार्मिक ग्रन्थों को रटने से कुछ भी लाभ होने वाला नहीं है। जब तक जीव, तत्त्व से उस परमसत्ता को नहीं पहचानता है, कुछ भी लाभ होना असम्भव है। गीता रूपी ज्ञान के अमृत का भी पान करने की स्थिति में जीव आज नहीं है ऐसी स्थित स्पष्ट करती है कि संसार पूर्ण रूप से तामसिक वृत्तियों से घिर चुका है। सात्त्विक वृत्तियों का लोप प्रायः हो जाना स्पष्ट संकेत है कि संसार में आमूलचूल परिवर्तन होने वाला है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि अब संसार से तामसिक वृत्तियों का अन्त होने वाला है। जितने आध्यात्मिक गुरु, इस समय संसार में है, पहले कभी देखने-सुनने में नहीं आये। परन्तु उनके रहते हुए भी संसार में अन्धकार निरन्तर ठोस होकर जम रहा है। ऐसी स्थिति में संसार का मानव इन गुरुओं पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाये बिना नहीं रह सकता। बेचारे सभी धर्मगुरु, युग के गुण धर्म और काल की गति के प्रवाह में ऐसे फंसे हुए हैं कि वे अपने आपको बचाने में असमर्थ हैं। डूबते हुए व्यक्ति की तरह उल्टे सीधे हाथ पाँव मार रहे हैं। इतिहास बताता है कि संसार में जब-जब भी ऐसी स्थिति पैदा हुई है। उस परमसत्ता ने अवतरित होकर जीवों का कल्याण किया है।

       इस बारे में भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के 7 वें और 8वें श्लोक में स्पष्ट घोषणा की है :-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥4:7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥4:8॥

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

धर्म क्या है ?

इस समय संसार भर के सभी धर्मों के धर्माचार्य केवल प्रदर्शन, शब्द जाल, तर्कशास्त्र और अन्ध विश्वास के सहारे लोगों को अध्यात्मवाद सिखा रहे हैं। शब्द जाल और तर्क शास्त्र के सहारे धर्म की व्याख्या, इस प्रकार तोड़-मरोड़ करके कर रहे हैं कि धर्म एक प्राणहीन मुर्दा लाश (शव) मात्र रह गया है। निष्प्राण धर्म कल्याण किस प्रकार कर सकता है?

       सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने धर्म को एक व्यवसाय मात्र बना लिया है। धर्म के सहारे आर्थिक तथा राजनैतिक लाभ उठाया जा रहा है। ऐसा लग रहा है, मानो संसार के सभी धर्माचार्यों को पक्का विश्वास हो गया है कि ईश्वर नाम की कोई शक्ति संसार में है ही नहीं। यह केवल काल्पनिक धारणा लोगों में फैलाई हुई है। इस झूठी धारणा के सहारे जितना चाहो प्राणियों का शोषण कर सकते हो। ऐसा लगता है, कुए में ही भांग पड़ गई है। सभी धर्म एक ही रास्ते पर चलने लगे हैं। | सभी धर्माचार्य अगले जन्म में मिलने का झूठा झांसा देकर संसार को लूट रहे हैं। धन के आधार पर पाप माफी का प्रमाण पत्र तक देने लगे हैं। इससे घोर अपराध क्या होगा? अगर ऐसी विषय स्थिति में भी भगवान् अवतार नहीं लेते हैं तो समझ लेना चाहिए कि प्रलय का समय बहुत सन्निकट है। आज संसार में धर्म के नाम पर लूट अन्याय और अत्याचार जितना पनप रहा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। हमारा इतिहास बताता है कि जब-जब ही ऐसी स्थिति पैदा हुई है, भगवान् ने अवतार लिया है।

        धर्म की व्याख्या करते समय हमारे ऋषियों ने स्पष्ट कहा है कि धर्म प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार का विषय है। प्रदर्शन, शब्द, जाल, तर्क शास्त्र और अन्धविश्वास से इसका दूर का भी सम्बन्ध नहीं हैं। पिछली सदी में स्वामी विवेकानन्द जी संसार में एक आध्यात्मिक संत के रूप में प्रकट हुए। अमेरिका में उन्होंने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था “विभिन्न मत मतान्तरों या सिद्धान्तों पर विश्वास करने के प्रयत्न हिन्दू धर्म में नहीं है, वरन् हिन्दू धर्म तो प्रत्यक्षानुभूति या साक्षात्कार का धर्म है। केवल विश्वास का नाम हिन्दू धर्म नहीं है, हिन्दू धर्म का मूल मंत्र तो ‘मैं’ आत्मा हूँ यह विश्वास होना और ‘तदूप’ बन जाना है।”

       इसी संदर्भ में स्वामी जी ने एक कदम और आगे बढ़ कर कह डाला किः- “अनुभूति-अनुभूति की यह महती शक्तिमयी वाणी भारत के ही आध्यात्मिक गगन मण्डल से आविर्भूत हुई है। एक मात्र हमारा वैदिक धर्म ही है, जो बारम्बार कहता है, ईश्वर के दर्शन करने होंगे, उसकी प्रत्यक्षानुभूति करनी होगी, तभी मुक्ति संभव है। तोते की तरह कुछ शब्द रट लेने से काम चल ही नहीं सकता।” स्वामी जी ने कहा है धर्म में प्रत्यक्षानुभूति न हो तो वह वास्तव में धर्म कहलाने योग्य है ही नहीं। क्या इस समय संसार के किसी भी धर्म का धर्माचार्य उपर्युक्त बात दोहराने की स्थिति में है ? इस समय तो ईश्वर और धर्म की अपनी-अपनी तर्क बुद्धि के अनुसार अजीब-अजीब व्याख्या करके धर्माचार्य संसार के लोगों को भ्रमित कर रहे हैं।

       प्रत्यक्षानुभूति या साक्षात्कार की बात करने तक का साहस किसी में दिखाई नहीं देता। इस समय संसार में मनुष्य जाति में एक ऐसा विशेष वर्ग पैदा हो गया है जो ईश्वर तथा धर्म का, एक मात्र ठेकेदार अपने आप को घोषित कर बैठा है। अगर आपको आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करना है तो उसके प्रमाण पत्र के बिना काम नहीं चलेगा। अपने प्रमाण पत्र की वह भरपूर कीमत लेकर आपको जिस रास्ते पर चलने का आदेश देगा, उसी पर आपको चलना होगा। जो मान्यताएँ उस वर्ग विशेष ने बना रखी हैं, वही धर्म सम्मत है, बाकी सब रास्ते नरक में ले जाने वाले अधर्म के हैं।

        इस समय संसार में धर्म के नाम पर भीख से लेकर हत्या तक की छूट है। कैसा भयंकर रूप बना डाला; इस युग के मानव ने, धर्म का? इस युग का मानव धन के लिए धर्म की ओट में घृणित से घृणित कार्य करने से भी नहीं झिझकता। ऐसी स्थिति में संसार में शान्ति, प्रेम, दया और सद्भाव कैसे संभव है?

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

जाति पाति पूछे ना कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।

इस समय संसार के सभी धर्मों में एक वर्ग विशेष अपने आप को धर्म का ठेकेदार घोषित कर बैठा है। सभी धर्मों में ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि उनकी आज्ञा के बिना ईश्वर से मिलना असम्भव है। सभी धार्मिक ग्रन्थ इस मानवीय व्यवस्था का खुला विरोध करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के नवें अध्याय में स्पष्ट कहा है :-

       अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

       साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥30॥

     यदि अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरे को भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, यथार्थ निश्चय वाला है।

       क्षिप्नं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।।

       कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥31॥

     (वह) शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है। (और) सदा रहने वाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! निश्चय -पूर्वक सत्य जान, मेरा भक्त नष्ट नहीं होता है।

       मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य,ये पि स्युः पापयोनयः।

       स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्ते पियान्ति परां गतिम्॥32॥

     क्योंकि हे अर्जुन स्त्री, वैश्य (और ) शुद्रादिक तथा पापयोनिवाले भी जो कोई होवे वे भी मेरे शरणगत होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

       किं पुनर्बाह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।

       अनित्यमसुख लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥33॥

     फिर क्या कहना पुण्य शील ब्राह्मणजन तथा राजर्षि भक्तजन मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस लिए सुख रहित क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर।

     गीता के उपर्युक्त श्लोक स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर का कोई भी ठेकेदार नहीं है। हर प्राणी के लिए प्रभु के द्वार खुले हैं। परन्तु फिर भी युग के गुणधर्म के कारण संसार में इतना अन्धकार फैल गया है कि किसी को सही रास्ता नजर ही नहीं आता। इस युग में लोग भ्रमित करने वाले झूठा स्वांग रचकर प्रदर्शन करने वाले ढोंगी लोगों की तरफ अधिक आकर्षित होते हैं। अपने विवेक से कोई चलने की स्थिति में नहीं है। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है :-

       सामो हं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यो स्ति न प्रियः।

       ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषुचाप्यहम्॥26॥

     मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न मेरा (कोई) अप्रिय है, न प्रिय है, परन्तु जो मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं भी उनमें (हूँ)।

     इतना होने पर भी इस समय के धर्म गुरु स्वार्थवश, इसी पवित्र ग्रन्थ की व्याख्या तोड़-मरोड़ कर करते हैं कि लोग भ्रमित हो जाते हैं। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, त्याग-तपस्या, दान-पुण्य, स्वर्ग-नरक आदि की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि लोग भयभीत होकर, अपनी सहज बुद्धि भी खो बैठते हैं। इस प्रकार संसार के भोले भाले लोगों को धर्म की आड़ में ठगने का व्यापार सर्वत्र फैला हुआ है। इस सम्बन्ध में स्वामी श्री विवेकाननद जी ने इन तथाकथित धर्म गुरुओं को फटकारते हुए कहा था :-

     तुम लोगों में किसी प्रकार की धार्मिक भावना नहीं है, रसोई ही तुम्हारा ईश्वर है तथा हँडिया बर्तन तुम्हारे शास्त्र। स्वामी जी ने संसार के धर्म गुरुओं का सही चित्र प्रस्तुत किया है। इस समय संसार भर के सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने धर्म को पेट से जोड़ रखा है। पेट के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं।

     ज्यों-ज्यों इनका विरोध बढता गया, इन्होंने भी अपने संगठन बनाकर अपनी सुरक्षा का पूरा प्रबन्ध कर लिया। एक प्रकार से दूसरा समाज बराबर संगठित करके, हर मुकाबले की तैयारी कर ली। इस समय धर्म, भय, लालच, प्रलोभन और धोखे से सिखाया जाता है। प्रेम, सद्भाव, श्रद्धा, विश्वास नाम की कोई वस्तु; इस समय नहीं मिलेगी। केवल भ्रमित और भयभीत करके त्याग तपस्या, दान-पुण्य, स्वर्ग नर्क आदि की काल्पनिक व्याख्या करके जितना अधिक ठगा जा सके, निरन्तर यही प्रयास चल रहा है। यह स्थिति अब चरम सीमा पर पहुँच चुकी है।

     अब संसार के लोग आगे ठगे जाने के लिए तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि सभी धर्म के मठाधीश इस समय अन्तिम संघर्ष में लगे हुए हैं। परन्तु परिवर्तन संसार का नियम है।

     इससे संसार की कोई वस्तु बच नहीं सकती। अतः इस धार्मिक व्यवस्था का भी अन्त अधिक दूर नहीं है।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

भारत में आध्यात्मिक जागृति

इस समय भारत में आध्यात्मिक जगत् में पूर्ण रूप से अन्धकार है। जब तक भारत का आम नागरिक अपनी इस कमजोरी को दिल से स्वीकार करके दूर करने का सामूहिक प्रयास प्रारम्भ नहीं करता है, यह भयंकर अन्धकार मिटने वाला नहीं है। हम भारतीयों में यह कमी है कि हमारी कमजोरी को स्वीकार नहीं करते। उसे छिपाने के लिए तर्क शास्त्र के सहारे अनेक झूठे तर्क देकर झूठ को सत्य प्रमाणित करने का प्रयास निरन्तर करते रहते हैं। इस प्रकार हमने सच्चाई के स्थान पर झूठ के अम्बार लगा लिए हैं।

     हम आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण रूप से खोखले हो चुके हैं। जब तक हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते है, हमारी स्थिति में कोई भी परिवर्तन आने वाला नहीं है।

     भारत के अन्धकार के बारे में महर्षि अरविन्द ने कहा है :- “यह कई कारणों से है। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के आने से पहले ही तामसिक प्रवृत्तियों और छिन्न-भिन्न करने वाली शक्तियों का जोर हो चला था। उनके आने पर मानो सारा तामस् ठोस बनकर यहाँ जम गया है। कुछ वास्तविक काम होने से पहले यह जरूरी है कि यहाँ जागृति आये। तिलक, दास, विवेकानन्द इनमें कोई भी साधारण आदमी न थे, लेकिन इनके होते हुए भी तामस् बना हुआ है। इस सम्बन्ध में ‘श्री माँ’ ने भी कहा है :- “भारत के अन्दर सारे संसार की समस्याएँ केन्द्रित हो गई हैं, और उनके हल होने पर सारे संसार का भार हल्का हो जायेगा।” उपर्युक्त तथ्यों में जब तक आप भारतीय, खुले दिल से स्वीकार करके, सच्चाई का मार्ग नहीं खोजोगे, अन्धकार मिटने वाला नहीं हैं।

     जहाँ सच्चाई होगी, वहीं ईश्वर की शक्ति प्रत्यक्ष रूप से कार्य करेगी। ईश्वर कृपा से, मानव; मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और सुख शान्ति का जीवन बिताता है। हमारे देश की दरिद्रता, गरीबी, हर वस्तु का अभाव, हिंसा, घृणा, द्वेष, क्रूरता आदि स्पष्ट दर्शाती है कि यहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण रूप से अन्धकार है। केवल भ्रमित करने वाले उपदेश तरह-तरह के स्वांग और प्रदर्शन शब्द जाल और तर्क शास्त्र से समस्या का समाधान होता तो अब तक चेतना कभी की आ गई होती।

     परन्तु इन सब के चलते अन्धकार दिनों दिन ठोस होता जा रहा है। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा। इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने अमेरिका से जो पत्र लिख कर भारत भेजे, उनसे स्थिति बहुत स्पष्ट हो जाती है। स्वामी जी ने अगस्त 1895 में अमेरिका से श्री आलासिंग पेरूमल को पत्र लिखा वह इस प्रकार है :- “वास्तव में भारत ने मेरे लिए जो किया है, उससे कहीं अधिक मैंने भारत के लिए किया है। वहाँ तो मुझे रोटी के एक टुकड़े के लिये डलिया भर गालियाँ मिलती हैं। मैं कहीं भी क्यों न जाऊँ, प्रभु मेरे लिए काम करने वालों के, दल के दल भेज देता है। वे लोग भारतीय शिष्यों की तरह नहीं है, अपने गुरु के लिए प्राणों तक की बाजी लगा देने को प्रस्तुत हैं।

      पाश्चात्य देशों में प्रभु क्या करना चाहते हैं? यह तुम हिन्दुओं को कुछ ही वर्षों में देखने को मिलेगा। तुम लोग प्राचीन काल के यहूदियों जैसे हो और तुम्हारी स्थिति नांद में लेटे हुए कुत्ते की तरह है, जो न खुद खाता है। और न दूसरों को ही खाने देना चाहता है। तुम लोगों में किसी प्रकार की धार्मिक भावना नहीं है। रसोई ही तुम्हारा ईश्वर है तथा हँडिया बर्तन तुम्हारा शास्त्र। अपनी तरह असंख्य सन्तानोत्पादन में ही तुम्हारी शक्ति का परिचय मिलता है।” उपर्युक्त तस्वीर हमारे अध्यात्मवाद को स्पष्ट करती है, जिसके दम्भ पर हम फूले जा रहे हैं।

      इसी सम्बन्ध में स्वामी जी ने एक पत्र 01 सितम्बर 1895 को पेरिस से लिखा था। उस पत्र में हमारे अध्यात्मवाद की असली तस्वीर नजर आती है। स्वामी जी ने लिखा है :- “मैं जैसा भारत का हूँ, वैसे ही समग्र जगत् का भी हूँ।” इस विषय को लेकर मनमानी बातें बनाना निरर्थक है। मुझसे जहाँ तक हो सकता था, मैंने तुम लोगों की सहायता की है, अब तुम्हें स्वयं ही अपनी सहायता करनी चाहिए।

     ऐसा कौन सा देश है, जो कि मुझ पर विशेष अधिकार रखता है? क्या मैं किसी जाति के द्वारा खरीदा हुआ दास हूँ? अविश्वासी नास्तिकों, तुम लोग ऐसी व्यर्थ की मूर्खतापूर्ण बातें मत बनाओ। मैंने कठोर परिश्रम किया है। और मुझे जो कुछ धन मिला है, उसे मैं कलकत्ते और मद्रास भेजता रहा हूँ। यह सब करने के बाद अब मुझे उन लोगों के मूखतापूर्ण निर्देशानुसार चलना होगा? क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती? मैं उन लोगों का किस बात का ऋणी हूँ? क्या मैं उनकी प्रशंसा की कोई परवाह करता हूँ या उनकी निन्दा से डरता हूँ। बच्चे, मैं एक ऐसे विचित्र स्वभाव का व्यक्ति हूँ कि मुझे पहचानना तुम लोगों के लिए भी अभी संभव नहीं है। तुम अपने कार्य करते रहो। नहीं कर सकते तो चुपचाप बैठ जाओ। अपनी मूर्खता के बल पर मुझ से अपनी इच्छानुसार कार्य कराने की चेष्टा न करो।

     मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं, जीवन भर मैं ही दूसरों की सहायता करता रहा हूँ। श्री रामकृष्ण परमहँस के कार्यों में सहायता प्रदान करने के लिए जहाँ के निवासियों में दो-चार रुपये भी एकत्र करने की शक्ति नहीं है, वे लोग लगातार व्यर्थ की बातें बना रहे हैं और उस व्यक्ति पर अपना हुक्म चलाना चाहते हैं, जिसके लिए उन्होंने कभी भी कुछ नहीं किया, प्रत्युत जिसने उन लोगों के लिए जहाँ तक हो सकता था, सब कुछ किया।

     जगत् ऐसा ही अकृतज्ञ है। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि ऐसे जातिभेद जर्जरित कुसंस्कारयुक्त दया रहित, कपटी, नास्तिक कायरों में से जो केवल शिक्षित हिन्दुओं में ही पाये जा सकते हैं। एक बनकर जीने मरने के लिए, मैं पैदा हुआ हूँ। मैं कायरता को घृणा की दृष्टि से देखता हूँ। कायर तथा राजनीतिक मूर्खतापूर्ण बकवासों के साथ, मैं अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। किसी प्रकार की राजनीति में मुझे विश्वास नहीं है। “ईश्वर तथा सत्य ही जगत् में एक मात्र राजनीति है, बाकी सब कूड़ा-करकट है।” मुझे, उस परमसत्ता ने आध्यात्मिक जगत् की जो प्रत्यक्षानुभूति करवाई है, वह उपर्युक्त तथ्यों से सत्यापित होती है। जब तक हम झूठे दम्भ को त्यागकर उस परमसत्ता से वास्वतिक सम्बन्ध स्थापित नहीं करेंगे, काम नही बनेगा। झूठ के पैर नहीं होते। आखिर हम देशवासियों को कितने दिन धोखा दे सकेंगे? काल की गति ने किसी को माफ नहीं किया, बड़ी से बड़ी तामसिक सत्ता भी उसके सामने नहीं टिक सकी। भगवान् श्री कृष्ण ने कहा हैः-

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो,

लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि तां न भविष्यन्ति सर्वे,

येऽवस्थितः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

     वही परमसत्ता संसार में अवतरित हो चुकी है। जिसकी भविष्यवाणी संसार के बहुत से संत कर चुके हैं। अतः अब तामसिकता का अन्त होकर, युग परिवर्तन में अधिक देर नहीं है।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

विश्व को सच्ची शान्ति और आनन्द भारत से ही मिलेगा।

शान्ति और आनन्द मनुष्य को हृदय से प्राप्त होता है। भौतिक संसाधनों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अन्तर और बाह्य में जब तक पूर्ण सामंजस्य पैदा नहीं होगा, संसार के मानव को सच्ची शान्ति और आनन्द मिलना असम्भव है। श्री अरविन्द ने स्पष्ट कहा है कि ”पश्चिम के लोग भौतिक जीवन को उसकी चरम सीमा तक पहुँचा चुके हैं, अब भारत का काम शुरू होता है। उसे इन सब चीजों को अध्यात्म शक्ति के अधीन करके धरती पर स्वर्ग बसाना है। हमारे धर्म गुरु संसार के सामने चाहे कितना ही ढिंढोरा पीटें, परन्तु इस समय भारत के आध्यात्मिक जगत् में जितना अन्धकार है, पहले कभी नहीं था। इस सम्बन्ध में श्रीमा(श्री अरविन्द आश्रम ) ने स्पष्ट कहा है।

     “भारत के अन्दर सारे संसार की समस्याएँ केन्द्रित हो गई हैं और उनके हल होने पर सारे संसार का भार हल्का हो जायेगा।” यह एक कटु सत्य है कि इस समय भारत में तमस् संसार भर से अधिक हैं और लोगों को इस बात से भारी दुःख होता होगा, मुझे तो इससे खुशी है। हर वस्तु का एक निश्चित सीमा के लांघते ही रूप परिवर्तित हो जाता है, हमें मालूम है कि जब-जब ही इस भू-खण्ड पर राक्षसों का पूर्ण आधिपत्य हुआ है, ईश्वर ने राम और कृष्ण के रूप में अवतरित होकर, राक्षसों को मार कर, पृथ्वी का भार हल्का किया है। भगवान् श्री कृष्ण ने इस सम्बन्ध में गीता में स्पष्ट कहा है।:-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।4:7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभावामि युगे युगे ।। 48॥

     श्री अरविन्द की भविष्यवाणी है कि :- 24 नवम्बर 1926 को श्री कृष्ण का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। श्रीकृष्ण अतिमानसिक प्रकाश नहीं हैं। श्री कृष्ण के अवतरण का अर्थ है, अधिमानसिक देव का अवतरण जो जगत् को अतिमानस और आनन्द के लिए तैयार करते हैं। श्रीकृष्ण आनन्दमय हैं। वे अतिमानस को अपने आनन्द की और उद्बुद्ध (Inspire) करके विकास का समर्थन और संचालन करते हैं, पूर्ण सत्य हैं।

     अलीपुर जेल में भगवान् ने श्री अरविन्द को स्पष्ट आदेश दिया था “मैं इस देश को अपना संदेश फैलाने के लिए उठा रहा हूँ, यह संदेश उस सनातन धर्म का संदेश है जिसे तुम अभी तक नहीं जानते थे, पर अब जान गये हो। तुम बाहर जाओ तो अपने देशवासियों से कहना कि तुम सनातन धर्म के लिए उठ रहे हो, तुम्हें स्वार्थसिद्धि के लिए नहीं, अपितु संसार के लिए उठाया जा रहा है।

     जब कहा जाता है कि भारत वर्ष महान् है तो उसका मतलब है कि सनातन धर्म महान् है। मैंने तुम्हें दिखा दिया कि मैं सब जगह और सब में मौजूद हूँ। जो देश के लिए लड़ रहे हैं, उन्हीं में नहीं, देश के विरोधियों में भी, मैं ही काम कर रहा हूँ। जाने या अनजाने, प्रत्यक्ष रूप से सहायक हो कर या विरोध करते हुए, सब मेरा ही काम कर रहे हैं। मेरी शक्ति काम कर रही है और वह दिन दूर नहीं जब काम में सफलता प्रप्त होगी।” भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में जो व्याख्या की है, श्री अरविन्द को दिये उपर्युक्त आदेश से पूर्ण रूप से मेल खाती है। गीता में भगवान् ने स्पष्ट कहा है :-

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।

     संसार के सभी धर्मों के संतों ने मुख्य तौर पर एक ही भविष्यवाणी की है कि वह शक्ति भारत के उत्तरी भाग में मानव के रूप में अवतरति होगी। सभी का मत है कि इस सदी के अन्त तक वह अपने क्रमिक विकास के साथ संसार के सामने प्रकट होकर पूरे विश्व को संचालित करने लगेगी। मेरी प्रत्यक्षानुभूति के अनुसार वह पूर्ण सत्ता सन् 1993 तक भारत में अपना पूर्ण प्रकाश फैला देगी।

     इसके बाद सदी के अन्त तक संसार की सारी भौतिक सत्ता को अपने अधीन करके उसका संचालन करने लगेगी। इस प्रकार कलियुग का अंत होकर संसार में पूर्ण सात्त्विक शक्तियों का, एक छत्र साम्राज्य स्थापित हो जायेगा। इस तरह जब भौतिक सत्ता का सीधा संचालन आध्यात्मिक सत्ता करने लगेगी तो युग परिवर्तन हो कर पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आवेगा।जो कुछ होने वाला है उसका आभास संसार भर के संतों की भविष्यवाणी से स्पष्ट होता है।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

आध्यात्मिक चेतना कैसे फैलती है ?

आध्यात्मिक चेतना ईश्वरीय शक्ति के प्रयास से फैलती हैं। इसमें मानवीय बुद्धि द्वारा किया गया प्रयास सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता। मानवीय प्रयास को अधिक से अधिक वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित प्रचार से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। मनुष्य अपने पूर्ण ज्ञान और शक्ति के सहारे काफी लम्बे समय तक आध्यात्मिक प्रचार चला सकता है। भौतिक साधनों के द्वारा निरन्तर लाखों लोगों को इकट्ठा कर सकता है।

     परन्तु इस प्रकार चलाया गया कोई भी अभियान समाप्त होने के बाद कोई भी असर पीछे नहीं छोड़ता। इस प्रकार के असंख्य अभियानों से जब लोगों को कुछ भी परिणाम नहीं मिला तो लोग विमुख हो गये। इस प्रकार विमुख हुए लोगों की संख्या जब अधिक हो गई तो लोगों में विद्रोह की हिम्मत आ गई और धार्मिक गुरुओं का खुला विरोध होने लगा। क्योंकि इस युग के गुरुओं के पास जो वस्तु बची हुई है, उसके अलावा वे कुछ भी देने की स्थिति में नहीं है।

     ऐसी स्थिति में दिन-दिन बिगड़ती हुई हालात को काबू करने के लिए, इस युग के धर्म गुरुओं ने प्रदर्शन, शब्दजाल, तर्क बुद्धि और धन के सहारे विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। ज्यों-ज्यों इस प्रक्रिया से धर्मगुरुओं ने अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास तेज किया, हालात काबू से बाहर हो गए।चन्द मरणासन्न स्त्री-पुरुषों के अलावा उनके पास कुछ भी नहीं बचा। वे भी अपने जीवन भर के किये हुए कर्मो के भय से भयभीत होकर बचाव के लिए रह गये। अपनी ही तस्वीर से भयभीत ये शक्तिहीन असहाय लोग कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं। धर्मगुरु भी अच्छी प्रकार समझते हैं कि जीवन भर इन्होंने जो अन्याय अत्याचार करके लूटा है, उसी का भय इनको बुरी तरह से खा रहा है। उनकी इस कमजोरी को अच्छी प्रकार समझते हुए धर्म गुरु इन्हें त्याग, तपस्या, दान-पुण्य, पाप आदि की व्याख्या अपने हिसाब से बताकर किसी प्रकार अपना बचाव करने में लगे हुए हैं।

     ‘‘सृजन की शक्ति तो चढ़ते हुए सूर्य में होती है। इसीलिए संसार का मानव, उदय होते हुए सूर्य को नमस्कार करता है, कोई भी अस्त होते हुए सूर्य को नमस्कार नहीं करता। इस युग के शक्तिहीन और असहाय धर्मगुरु अस्त होते हुए सूर्य के सहारे कितने दिन तक जिन्दा रह सकेंगे, यह स्पष्ट बात है।’’ जिस प्रकार डूबता व्यक्ति तिनके के सहारे नहीं बच सकता, ठीक उसी प्रकार यह कागज की नाव तो डूबेगी। अब इसे बचाना असम्भव हो गया है। इतिहास साक्षी है, क्षीण होती हर सत्ता नई शक्ति के उदय होने का संकेत है। इस युग का मानव ऐसी किसी व्यवस्था में विश्वास नहीं करता जो कोई परिणाम नहीं देती। ईश्वर अगर है तो उससे सम्पर्क करके प्रार्थना करने पर निश्चित रूप से परिणाम मिलने चाहिए। परिणाम के अभाव में हमारे दिमाग में दो प्रश्न पैदा होते हैं या तो ईश्वर नाम की कोई शक्ति है ही नहीं, और अगर है तो हमारा संदेश उसके पास पहुँच ही नहीं रहा है। क्योंकि हमारे सभी संत कह गये हैं कि ईश्वर परम दयालू है। ईश्वर कृपा के उदाहरणों से हमारे धार्मिक ग्रन्थ भरे पड़े हैं।

     हम देखते हैं, इस युग में प्रचलित आराधना पद्धति से की गई प्रार्थना का कोई उत्तर नहीं मिल रहा है। इससे यही नतीजा निकलता है कि हमारे प्रार्थना पत्र पर पाने वाले का सही पता नहीं लिखा होता है। पता अगर ठीक होता तो उसका उत्तर निश्चित रूप से मिलता। अतः इस युग के मानव को अगर उस परमसत्ता की खोज करनी है तो उसका सही पता जानना आवश्यक है। भौतिक विज्ञान ने इस प्रकार की खोज से अपनी जो उच्चसत्ता और शक्ति प्राप्त कर ली है, ठीक उसी प्रकार अध्यात्म विज्ञान भी अपनी परमोच्च स्थिति पर पहुँच सकता है।

     अब समय आ गया है कि, अब वह परमसत्ता स्वयं प्रकट होकर अपने प्रकट किये हुए भौतिक विज्ञान को अधीन करके संसार में स्वयं का सुख शान्ति का राज्य स्थापित करें। जब तक वह परम सत्ता स्वयं प्रकट होकर अपनी प्रकट की हुई ताकत को अपने अधीन संचालित नहीं करेगी, संसार में सुख शान्ति असम्भव है। | इस समय सारे भौतिक विज्ञान की उपलब्धियाँ, तामसिक शक्तियों के अधीन हैं। तामसिकता का गुणधर्म, हिंसा, घृणा, द्वेष और विनाश है। इन शक्तियों से सृजन की उम्मीद के बल पर आज तक कई प्रयास किये, परन्तु सृजन के स्थान पर निरन्तर संहार ही प्रगति करता रहा। इस शताब्दी के प्रारम्भ से ही अनेक राजनेताओं ने शान्ति लाने का प्रयास किया, परन्तु वे इसमें पूर्ण रूप से असफल सिद्ध हुए। प्रथम विश्व महायुद्ध ने संसार में भयंकर नरसंहार और अशान्ति फैला दी। सारा संसार अशान्त और आतंकित हो गया। तब उन भौतिक सत्ता सम्पन्न राष्ट्राध्यक्षों ने संसार में शांति लाने हेतु राष्ट्र संघ(लीग ऑफ नेशन्स) का निर्माण किया।

     यह प्रयास भी असफल रहा, और दूसरा विश्वयुद्ध पहले से भी भयंकर हुआ। तब शान्ति लाने का और प्रयास करते हुए उन्होंने ‘संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ) का निर्माण किया। परन्तु हम देख रहे हैं कि यू. एन. ओ. भी शान्ति लाने में पूर्ण रूप से असफल हो चुका है।

     संसार में इस समय एक भी ऐसा क्षण नहीं बीत रहा है, जिसमें भौतिक विज्ञान ने नरसंहार बन्द किया हो। वर्षों से संसार के किसी न किसी हिस्से में नर संहार और युद्ध निरन्तर जारी है। विश्व की सर्वोच्च शक्तियों के सभी प्रयास असफल हो रहे हैं। संसार में अब तो हर क्षेत्र में नरसंहार प्रारम्भ हो गया है। दोनों विश्व युद्धों से भी अधिक विनाश रात दिन संसार में हो रहा है। सभी बहिर्मुखी बौद्धिक प्रयास असफल हो चुके हैं। क्योंकि शान्ति अन्दर से आती है, शान्ति का सम्बन्ध दिल से है।

      अतः अन्तर्मुखी आराधना से उस परम सत्ता से जुड़े बिना शान्ति असम्भव है। मैं प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर रहा हूँ कि जो विकास मेरे तथा मेरे गुरुदेव में हो चुका है, वह आध्यात्मिक और भौतिक जगत् में प्रत्यक्ष परिणाम दे रहा है। मुझसे जुड़ने वाले सभी लोगों को वह परम आनन्द और परम शान्ति मिल रही है।

      जिसको कि विभिन्न संतों ने ‘‘नाम खुमारी” और “नाम अमल” की संज्ञा दी हैं। मैं तथा मेरे गुरुदेव जितना आरोहण कर चुके हैं, उस पथ की यात्रा में मुझसे जुड़ने वाले लोगों को किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हो रही है।

     उन्हें इस आरोहण में जिन विचित्र-विचित्र लोकों की प्रत्यक्षानुभूतियाँ हो रही है, उससे सभी आनन्द विभोर हो रहे हैं। मूलाधार से लेकर अगम लोक, जहाँ तक वे पहुँच सके हैं, हमारे ऋषियों द्वारा वर्णित सभी बातों की प्रत्यक्ष उपलब्धि हो रही है। इसके साथ-साथ सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से सम्बन्धित अनेक प्रकार की घटनाएँ, आध्यात्मिक शक्तियाँ पहले बता रही है। और सभी क्रमिक रूप से भौतिक जगत् में सत्यापित हो रही हैं। इससे इन दोनों शरीरों के अन्दर ‘आत्मा’ की बात हमारे संतों ने जिस प्रकार बताई है, उसके भी स्पष्ट चिह्न जिन्हें मैं बहुत पहले देख चुका हूँ, मेरे अनुयाइयों को प्रत्यक्ष रूप से मिल रहे हैं।

      भौतिक जगत् में जिन आध्यात्मिक बातों को आज तक मानव केवल मनघडंत और काल्पनिक मानता है, वे सभी असंख्य प्रमाणों सहित सत्य प्रमाणित हो रही हैं। मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र तक के माया के जगत् की सभी शक्तियों की प्रत्यक्षानुभूति, त्रिगुणमयी माया (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) सहित हो रही हैं। ये सभी शक्तियाँ भौतिक जगत् में भी सत्यापित हो रही हैं। आज्ञाचक्र से ऊपर के लोक पूर्ण रूप से सात्त्विक है तथा यहाँ शब्द का रूप बदल कर निरन्तर सूक्ष्म रूप धारण करता जाता है। अतः इनकी प्रत्यक्षानुभूतियाँ पूर्ण रूप से मानवीय भाषा में व्यक्त नहीं की जा सकती। पूरे प्रयास के बावजूद सभी अन्त में यही कह देते हैं कि जो कुछ हम देख रहे हैं, सुन रहे हैं और अनुभव कर रहे हैं, उसे हम भाषा द्वारा व्यक्त करने में अपने आपको असमर्थ महसूस कर रहे हैं। मुझे बहुत बार लोग पूछते हैं कि क्या इन रहस्य पूर्ण बातों को कभी मानवीय भाषा में बताना सम्भव होगा।

      मैं उन्हें हमेशा एक ही उत्तर देता हूँ कि मैंने तुम्हें प्रारम्भ में ही बता दिया था कि अध्यात्म ज्ञान प्रत्यक्षानुभूतियों और साक्षात्कार का विषय है। इसमें मानवीय बुद्धि और ज्ञान कुछ भी सहयोग देने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है मैंने आप लोगों को आज तक कोई उपदेश नहीं दिया, कोई कर्मकाण्ड या बहिर्मुखी आराधना की भी सलाह नहीं दी। मैंने हमेशा यही बात कही कि इस जगत् में प्रेम सद्भाव, समर्पण, दया और सात्त्विक भाव से ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है। संसार के भौतिक वैभव से यह प्राप्त होने वाला ज्ञान नहीं है।

     भौतिक सत्ता तो अधिनस्थ बहुत ही छोटी शक्ति है। मैं देख रहा हूँ, तीनों शरीरों को भेद कर जिसने आत्मा का क्षणिक प्रकाश देख लिया, उसे पिछले जन्म का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार आत्मा से जितना प्रगाढ़ सम्बन्ध होगा, उसी के अनुसार उसे पिछले कई जन्मों का ज्ञान होना सम्भव है। इस प्रकार हमारे धर्म का पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी भौतिक रूप से सत्यापित किया जा सकता है। आज मेरे माध्यम से जो कुछ हो रहा है, वह ईश्वर की कृपा और गुरुदेव के आशीर्वाद का परिणाम है। प्रारम्भ से लेकर मेरे जीवन के अन्तिम तक के बारे में मुख्य-मुख्य सभी कार्यों का स्पष्ट आदेश, उस परम सत्ता ने दे दिया है। मैं सप्रमाण पूर्ण रूप से आश्वस्त हूँ। इसके अलावा वह पूर्ण सत्ता पग-पग पर पूर्णरूप से मेरा पथ प्रदर्शन कर ही है। मुझसे जुड़ने वाले लोगों से सम्बन्ध स्थापित करने वाले सभी जिज्ञासु लोगों में भी वह सात्विक करण्ट अनायास दौड़ने लगता है।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

नाम खुमारी एक सच्चाई है ।

 मैं देख रहा हूँ, इस युग के मानव जब कबीर और नानक की ‘नाम अमल’ और ‘नाम खुमारी’ की बात सुनते हैं, या पढ़ते हैं तो उन्हें इस बात पर बिल्कुल ही विश्वास नहीं होता। अपने ज्ञान के अनुसार वे इस बात को ईश्वर के लिए श्रद्धा से काम में लिए हुए अतिशयोक्ति अलंकार के अतिरिक्त कुछ भी मानने को तैयार नहीं। मैं लोगों की इस मान्यता के लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता हूँ। क्योंकि आध्यात्मिक जगत्, सात्त्विक शक्तियों के ह्रास के कारण ही संसार के मानव की यह स्थिति है।

     मनुष्य ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है। उस परमसत्ता की अभिव्यक्ति मात्र इसी योनि से सम्भव है। मानव शरीर में ही वह असीम सत्ता अपने पूर्ण विकसित स्वरूप में स्थित हैं। इसीलिए सभी संतों ने इस योनि को दुर्लभ बताया है। परन्तु युग के गुण-धर्म के कारण असहाय मानव इसका स्वाद नहीं चख पाने के कारण इसको मात्र काल्पनिक या अतिशयोक्ति समझ रहा है। मैंने करीब तीन हजार पर्चे प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार तथा नाम खुमारी के बँटवाये। पर्चे के अन्त में यह बात स्पष्ट रूप से छापी गई थी कि :-

     ‘‘जो भी भाई-बहिन प्रत्यक्षानुभूति और नाम खुमारी के सम्बन्ध में अपनी जिज्ञासा शान्त करना चाहे, स्वयं सत्संग में सम्मिलित हो कर देखें।” मुझे यह देख कर अचम्भा हुआ कि स्वामी राम सुख दास जी के प्रवचन सुनने वाले को इसका विश्वास नहीं हुआ। मात्र एक जिज्ञासु ही मेरे पास आ सका। परन्तु जो एक जिज्ञासु आया, मैं उससे पूर्ण सन्तुष्ट हूँ। वह इस पथ का राही होना, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मात्र भारत में ही उस परमसत्ता की आखिरी चिन्गारी बची हुई है, जिसको प्रज्वलित करके संसार भर में वह सात्त्विक प्रकाश फैलाया जा सकता है।

     मुझे जो स्पष्ट इशारा था, वह सही निकला कि, यह प्रकाश सर्वोच्च लोक से आ रहा है, अतः पहले उन्हीं लोगों को चेतन करेगा। इस प्रकार संसार के शक्ति सम्पन बुद्धिजीवी लोग जब इस प्रकाश से चेतन होंगे तो नीचे इसका प्रकाश सहज ही फैल जायेगा। मेरी प्रत्यक्षानुभूतियाँ और उस परमसत्ता का आदेश ठीक मेल खा रहा है। देश में जो तमस व्याप्त है, उसके बारे में श्री अरविन्द ने लिखा है :-

     ‘‘यह कई कारणों से हैं। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के आने से पहले ही तामसिक प्रवृतियों और छिन्न-भिन्न करने वाली शक्तियों का जोर हो चला था। उनके आने पर मानो सारा तमस् ठोस बनकर, यहाँ जम गया।

     कुछ वास्तविक काम होने से पहले यह जरूरी है कि यहाँ जागृति आये। तिलक, दास और विवेकानन्द इनमें से कोई साधारण आदमी न थे, लेकिन इनके होते हुए भी तमस् बना हुआ है।”। महर्षि अरविन्द की उपर्युक्त बात से यह बात स्पष्ट होती है कि ”अन्धकार इतना ठोस बन कर जम गया है कि उस अधिमानसिक देव के अवतरण के अलावा अब इसका कोई इलाज नहीं बचा है।” मेरे विचार से भी इस प्रकाश का सबसे पहले भारत में फैलना जरूरी है। श्री अरविन्द को भगवान् ने अलीपुर जेल से छूटने से पहले जो आदेश दिया था, उसका भी यही अर्थ निकलता है। भगवान् का आदेश था कि :- “तुम बाहर जाओ तो अपने देश वासियों को कहना कि तुम सनातन धर्म के लिए उठ रहे हो, तुम्हें स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, अपितु संसार की भलाई के लिए उठाया जा रहा है। जब कहा जाता है कि भारत वर्ष महान् है तो उसका मतलब है कि सनातन धर्म महान् है।

     इससे स्पष्ट है कि संसार को आकर्षित करने के लिए, पहले भारत उठना, चेतन होना जरूरी है, इसके बिना संसार को चेतन करना बहुत कठिन काम है। हम देखते हैं कि हमारे आम देशवासियों की एक प्रवृत्ति बन गई है कि वे पश्चिमी जगत् की आँख बन्द करके नकल करने में लगे हैं। दूसरी तरफ पश्चिमी जगत् के लोग भारत की गलियों की खाक छानते हुए शान्ति की खोज कर रहे हैं। बहुत ही विचित्र स्थिति है। जिस अपार सात्त्विक धन के हम मालिक हैं, उन्हें तो इसका कुछ भी ज्ञान नहीं, और समुद्रों पार से आकर विदेशी उसकी खोज कर रहे हैं, बहुत ही अजीब स्थिति है। मुझे अच्छी तरह याद है, ऋषिकेश में मुनि की रेति में गंगा के किनारे मैं खड़ा था। इतने में कुछ विदेशी भगवा वस्त्र पहने, वहाँ आकर खड़े हो गये। थोड़ी ही देर में कोट पेन्ट धारी कुछ सज्जन सपरिवार वहाँ आ गये। उनमें से एक सज्जन ने अंग्रेजी भाषा में उन विदेशियों से बात शुरू कर दी। क्योंकि मैं भी पास ही खड़ा था, इस लिए मैं भी सुनने लग गया।

     हिन्दुस्तानी सज्जन ने कहा कि ”आप लोग बहुत समझदार और सभ्य लोग हैं, आप इन ठगों के चक्कर में कैसे फँस गये? ये लोग केवल आप लोगों से धन ठगने के लिए, विभिन्न प्रकार के स्वांग रच रहे हैं। इनके पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जिसके लिए आप ठगाये जा रहे हो”। इस पर एक विदेशी बोला”आप क्या कह रहे हो, मुझे समझ नहीं आ रहा है ऐसा लगता है आप पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। क्या आपने इन संन्यासियों के पास आकर कभी जानने का प्रयास किया कि ये क्या कर रहे हैं? मैं देख रहा हूँ हमारा दैनिक जीवन में जो खर्च होना चाहिए उससे एक पैसा भी अधिक नहीं लिया जा रहा है।

     मैं जब हमारे देशवासियों की यह हालत देखता हूँ तो बहुत हैरानी होती है। हमारे देश के सभ्य और साधन सम्पन्न लोग पूर्ण रूप से धर्म से विमुख हो चुके हैं। जब तक उन्हें प्रत्यक्षानुभूति, साक्षात्कार और नाम खुमारी की अनुभूति नहीं करवाई जाती, चेतना असम्भव है।

     शरीर के जिस अंग में बीमारी होती है, डॉक्टर चीर-फाड़ द्वारा उसी अंग का इलाज करते हैं, तभी पूरा शरीर स्वस्थ होता है। अतः हमें पहले इन्हीं बीमार लोगों का इलाज करना है, तभी चेतना सम्भव है। हम देख रहे हैं, हमारे देश के प्रायः सभी राजनेता, वाम मार्गी तामसिक तांत्रिकों के चक्कर में चढ़े हुए हैं। ऐसे अनेक तामसिक तांत्रिक राज सत्ता का भयंकर दुरुपयोग करके अपनी काली शिक्षा का प्रसार-प्रचार करके देश में अन्धकार फैला रहे हैं। इस प्रकार समाज का जो वर्ग इन तामसिक लोगों के चक्कर में है तथा जो इन ढोगियों से तंग आकर धर्म से विमुख हो चुका है, सर्वप्रथम उनका इलाज किये बिना देश में चेतना असम्भव है। पश्चिमी जगत् के लोग सच्चाई को परखने और स्वीकार करने में कभी नहीं झिझकते। सबसे कठिन काम तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथाकथित सभ्य और सम्पन्न लोगों का इलाज करना हैं। इनका इलाज होने पर पूरा शरीर स्वस्थ हो जायेगा। सत्ता धारी और इन सम्पन्न और सभ्य लोगों की कोई अधिक संख्या नहीं है।

     जब वह परमसत्ता सक्रिय रूप से संसार के सामने प्रकट होकर, अपना कार्य शुरू कर देगी तो अन्धकार के दूर होने में कोई देर नहीं लगेगी। मुझे स्पष्ट बता दिया गया है कि हर परिवर्तन का समय सुनिश्चित है। समय आने पर सारी परिस्थितियाँ अनुकूल होकर थोड़े प्रयास से सारे कार्य सम्पूर्ण हो जायेंगे।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

‘‘मंत्र शक्ति’’ पर इस युग के मानव का विश्वास क्यों खत्म हुआ ?

शब्द की उत्पति मात्र उस परम सत्ता की देन है। हर अक्षर किसी न किसी शक्ति का स्वरूप है। सारी शक्तियाँ मनुष्य के शरीर में स्थित हैं। हर शक्ति का उपयुक्त स्थान है। अतः उपयुक्त मंत्र का जप उसके स्थान विशेष पर ध्यान केंद्रित करके, करने पर निश्चित समय में, वह शक्ति अवश्य चेतन हो जायेगी। हमारे धर्म की गुरु-शिष्य परम्परा इस पर विस्तार से प्रकाश डालती है।

     चेतन गुरु से जो मंत्र प्राप्त किया जाता है। उस मंत्र को सिद्ध करने की शिष्य को कोई आश्यकता नहीं होती।चन्द दिनों में वह शक्ति अपनी प्रत्यक्षानुभूति कराने लगती है। जिस व्यक्ति ने चेतन गुरु से दीक्षा ली है, और शक्तिपात के द्वारा गुरु अपनी ताकत उसे दे कर गया है, केवल वही मंत्र दीक्षा देने का अधिकारी है। ऐसा व्यक्ति जब मंत्र दीक्षा देता है तो वह शक्ति मानव के कल्याण हेतु कार्य करती है। परन्तु अगर मंत्र दीक्षा देने वाला गुरु चेतन नहीं है तो उस मंत्र की शक्ति कभी भी प्रकट नहीं होगी। अगर अधिक कष्टों के कारण एकाग्रता अधिक हुई तो लाभ के स्थान पर हानि होने की अधिक सम्भावना है, क्योंकि जब वह शक्ति चेतन होगी तो सक्षम गुरु के आशीर्वाद के अभाव में मनुष्य उसकी ताकत को सहन नहीं कर सकेगा और अनेक प्रकार की मानसिक व दिमागी बीमारियाँ लगने की ही सम्भावना अधिक रहेगी।

      अगर चेतन गुरु ने मंत्र दीक्षा दी है तो वह शक्ति कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकती है। आजकल लोग पुस्तकों से मंत्र का ज्ञान प्राप्त करके उसका जप करते हैं। वह निर्जीव मंत्र न हानि पहुँचा सकता हैं और न ही लाभ। इस प्रकार लम्बे समय तक जब कोई उत्तर नहीं मिलता तो लोग यह मान लेते हैं कि मंत्र-तंत्र की बात झूठी और काल्पनिक है। इससे मानव का भला बुरा कुछ भी होना सम्भव नहीं है। क्योंकि सात्त्विक जगत् के गुरुओं का नितान्त अभाव है। अतः यह शक्ति लोप हो चली है। थोड़े बहुत तुच्छ वाम मार्गी उपासक कहीं-कहीं अपनी तामसिक शक्तियों का हल्का फुल्का चमत्कार दिखा कर, संसार के अनभिज्ञ लोगों को ठग रहे हैं। क्योंकि सात्त्विक शक्तियाँ मानव का बुरा करने की शक्ति नहीं रखती, उसे तो ईश्वर ने मात्र भलाई करने की शक्ति प्रदान की है।

      ये वाम मार्गी तामसिक शक्तियों के उपासक किसी प्रचलित सात्त्विक शक्ति के नाम से अपना धन्धा चला रहे हैं। इस प्रकार मंत्र, तंत्र, जादू टोना, ताबीज, गंडा आदि नामों के माध्यम से लोगों को ठग रहे हैं। क्योंकि इस युग में इन्हीं लोगों का बोलबाला है, अतः नाम खुमारी की बात पर लोगों का विश्वास ही नहीं होता, क्या करें ?

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

मात्र सनातन धर्म ही विश्व शांति का रक्षक

 महर्षि श्री अरविन्द ने घोषणा की थी कि ‘भारत ही भगवान् को धरती पर लायेगा।’ महर्षि श्री अरविन्द ने कहा था कि अंधकार ठोस बनकर जम गया है, अब संतों से शांति असंभव है। अब धरा पर भगवान् के अवतार की आवश्यकता है। और महर्षि ने मात्र इसीलिए आराधना की। महर्षि अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल हुए और उन्होंने घोषणा कर दी कि “24 नवंबर 1926 को ही श्री कृष्ण का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। श्री कृष्ण अतिमानसिक प्रकाश नहीं है। श्री कृष्ण के अवतरण का अर्थ है अधिमानसिक देव का अवतरण जो जगत् को अतिमानस और आनन्द के लिए तैयार करता है। श्रीकृष्ण आंनदमय है। वे अतिमानस को अपने आनंद की ओर उद्बुद्ध करके विकास का समर्थन और संचालन करते हैं।”

     इसी संदर्भ में महर्षि श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की हुई है कि वह शक्ति जो 24.11.1926 को मनुष्य के रूप में जन्म ले चुकी है, सन् 1993 के अंत तक अपने क्रमिक विकास के साथ संपूर्ण विश्व के सामने प्रकट हो जाएगी।

     भगवान् ने श्री अरविन्द को अलीपुर जेल में आदेश दिया था कि ‘मैं इस देश को अपना संदेश फैलाने के लिए उठा रहा हूँ, यह संदेश उस ‘सनातन धर्म’ का संदेश है, जिसे तुम अभी तक नहीं जानते थे, पर अब जान गये हो। तुम बाहर जाओ तो अपने देशवासियों को कहना कि तुम सनातन धर्म के लिए उठ रहे हो। तुम्हें स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, अपितु संसार के लिए उठाया जा रहा है। जब कहा जाता है कि भारतवर्ष महान् है तो उसका मतलब है सनातन धर्म महान् है। मैंने तुम्हें दिखा दिया है, कि मैं सब जगह और सब मैं मौजूद हैं। जो देश के लिए लड़ रहे हैं, उन्हीं में ही नहीं, देश के विरोधियों में भी काम कर रहा हूँ। जाने या अनजाने, प्रत्यक्ष रूप से सहायक होकर या विरोध करते हुए, सब मेरा ही काम कर रहे हैं। मेरी शक्ति काम कर रही है, और वह दिन दूर नहीं जब काम में सफलता प्राप्त होगी।’

     यीशु मसीह की भविष्यवाणियों के अनुसार भी उस सहायक के पूर्व से आने की बात कही गई है। उस सहायक के आने का यही समय है। इसके अतिरिक्त विश्व के कई भविष्य वक्ताओं ने भी कहा है कि 20 वीं सदी के अंत से पहले एक नई सभ्यता जिसका उद्गम भारत से होगा, संपूर्ण विश्व को आँधी तूफान की तरह ढक लेगी।

      विश्व भर के सभी धर्मों में मात्र सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जो मनुष्य को विकास की चरम सीमा तक पहुँचाने की बात कहता है। वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य शरीर की संरचना सात प्रकार के तत्त्वों से हुई है, जिनके अन्दर आत्मा अन्तर्निहित है। इन सात तत्त्वों की अलग-अलग व्याख्या करते हुए ऋग्वेद कहता है- (1.) अन्नमयकोश (2.) प्राणमय कोश (3.) मनोमय कोश (4.) विज्ञानमय कोश (5.) आनन्दमय कोश (6.) चित्मय कोश (7.) सतमय कोश।

      आज तक इनमें से प्रथम चार कोश ही मानवता में विकसित हो पाये हैं। बाकी तीनों (सत् +चित्+ आनन्द – सच्चिदानन्द) कोश अभी तक विकसित नहीं किए जा सके। वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार अन्नमय कोश से विज्ञानमय कोश तक अपरार्द्ध या सत्ता का निम्नतर भाग है, जहाँ विद्या पर अविद्या का आधिपत्य है।

     आनन्द से सत् तक परार्द्ध या उच्चतर अर्द्ध जिसमें अविद्या पर विद्या का प्रभुत्व है और वहाँ अज्ञान, पीड़ा या सीमा का नाम नहीं। क्योंकि प्रथम चारों कोशों में विद्या पर अविद्या का आधिपत्य है, इसलिए विज्ञान का प्रयोग सृजन के स्थान पर विध्वंश में ही अधिक हो रहा है।

      विश्व में,मात्र वैदिक धर्म ही अवतारवाद का जनक है, वही कहता है ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार संभव है। संसार के बाकी पैगम्बरवादी धर्मों में यह सामर्थ्य नहीं है। वे तो मात्र पैगम्बर के बताए अनुसार ही ईश्वर को जानते हैं। प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार करने का कोई पथ उन धर्मों में नहीं है। जब सात में से चार तत्त्वों की जानकारी विश्व को हो चुकी है तो बाकी तीन कोशों का भी ज्ञान प्राप्त करना संभव है। परन्तु उस ज्ञान को प्राप्त करने की सामर्थ्य केवल सनातन धर्म में ही है, क्योंकि वह ईश्वरवाद का जनक है। पैगम्बरवादी धर्म यह कार्य नहीं कर सकते। क्योंकि अब बाकी तीनों तत्त्वों (सत्+चित्+आनन्द – सच्चिदानन्द) के चेतन होने का नम्बर है, अतः यह कार्य मात्र भारत ही करेगा। अनादिकाल से यह ज्ञान विश्व को भारत ही देता रहा। इसी दिव्य ज्ञान का प्रसार-प्रचार संपूर्ण विश्व में पुनः करके अपने स्वर्ण युग में प्रवेश कर जाएगा।

     मनुष्य योनि में चरम विकास की बात कहते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के १३ वें अध्याय के २२वें श्लोक में पुरूष की व्याख्या करते हुए कहा है

उपद्रष्टानुमन्ता भर्ता भोक्ता महेश्वर।

परमात्मेति चाप्युक्तो देह स्मिन्पुरूषः पर।।

     वास्तव में पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर (त्रिगुणातीत ) ही है (केवल ) साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता ( एवं ) सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता (तथा ) ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दधन होने से ‘परमात्मा’ ऐसा कहा गया है। गीता की उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार मनुष्य आत्म साक्षात्कार करते हुए ‘तदुप’ बन सकता है। अतः वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार उपर्युक्त सातों तत्त्वों को चेतन करके मनुष्य अपने चरम विकास को प्राप्त कर सकता है। भारत के ही नहीं, विश्व भर के अनेक भविष्यवक्ताओं ने जो भविष्यवाणी की है कि भारत का ही दर्शन 21वीं सदी में मान्य होगा। 21 वीं सदी में भारत पुनः अपने ‘जगद्गुरु’ के पद पर आसीन हो जाएगा।

     इसी प्रकार भारतीय योगदर्शन भी क्रियात्मक ढंग से उस परमपद को प्राप्त करने की विधि बताता है। हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है, मनुष्य वास्तव में विराट है। अतः हमारा दर्शन स्पष्ट शब्दों में कहता है। कि जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है। इसीलिए ज्ञानसंकलिनी तन्त्र में कहा है

देहस्थाः सर्व्व विधाश्च देहस्थाः सर्व्व देवताः।

देहस्थाः सर्व्व तीर्थानि गुरु वाक्येन लभ्यते।।

     उपर्युक्त दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार ऋषियों ने जब संपूर्ण ब्रह्माण्ड को देखकर, उस परमतत्त्व की खोज मनुष्य शरीर में आरंभ की तो पाया, कि उस परमसत्ता का निवास सहस्रार में है। उसी ने अपनी शक्ति के सहारे इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की, जिसका निवास स्थान उसने मूलाधार में पाया।इन्हीं दोनों तत्वों के कारण संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति हुई। प्रभु की वह शक्ति सहस्रार से नीचे चली और असंख्य ब्रह्माण्डों और लोकों की रचना करती हुई मूलाधार में आकर स्थित हो गई।

      यह शक्ति सुषुप्त अवस्था में रहती है। केवल मनुष्य योनि में ही इसे जाग्रत किया जा सकता है। यह कार्य गुरुकृपा रूपी शक्तिपात से ही संभव है।

      सिद्धयोग में गुरु शिष्य परम्परा में शक्तिपात दीक्षा का विधान है। गुरु शक्तिपात करके साधक की कुंडलिनी को चेतन करते हैं। चेतन होते ही वह शक्ति सुषुम्ना के रास्ते, अपने स्वामी से मिलने सहस्रार की तरफ ऊर्ध्वगमन करने लगती है। गुरु का उस पर पूर्ण प्रभुत्व होता है, अतः वे उसका नियंत्रण और संचालन स्वयं करते हैं। वह शक्ति ऊर्ध्व गमन करती हुई छह चक्रों और तीनों ग्रन्थियों को वेधन करती हुई साधक को समाधि स्थिति, जो कि समत्वबोध की स्थिति है, प्राप्त करा देती है। इस प्रकार पृथ्वी तत्त्व के आकाश तत्त्व में लय होने को ही मोक्ष अर्थात् कैवल्य पद प्राप्त होने की संज्ञा दी गई।

     शक्तिपात से जब कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है तो ऊर्ध्व गमन करने लगती है। कई जन्मों के संस्कारों के कारण रास्ता अवरुद्ध रहता है। अतः साधक को विविध प्रकार की यौगिक क्रियाएँ जैसे आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम स्वतः होने लगते हैं। वह शक्ति साधक का शरीर, प्राण, मन और बुद्धि अपने स्वायत्त कर लेती है। इस प्रकार जो क्रियाएँ होती हैं, उसमें साधक का किसी प्रकार का सहयोग या असहयोग कार्य नहीं करता है। साधक न तो उन्हें करने की स्थिति में होता है, और न ही रोकने की। वह शक्ति सीधा अपने नियंत्रण में सभी क्रियाएँ करवाती है। इस प्रकार भौतिक विज्ञान को यह खुली चुनौती है। मेरे शिष्यों में अनेक इंजिनियरिंग के छात्र तथा इंजिनियर हैं। उन सभी को ये क्रियाएँ होती हैं। इससे पातंजलि योगदर्शन में वर्णित सभी सिद्धियों के ज्ञान के साथ-साथ हर प्रकार से पूर्ण स्वस्थ होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

     पातंजलि योगदर्शन में साधक को जिन सिद्धियों का ज्ञान प्राप्त होता है उनमें एक का नाम प्रातिभ ज्ञान है। इस ज्ञान का वर्णन विभूतिपाद के 33वें तथा 36 वें सूत्र में वर्णन किया गया है। इस संबंध में ऋषि ने कहा हैः|

     ततःप्रातिभश्रावण वेदनास्वादवार्ता जायन्ते। विभूतिपाद

     उससे प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता ये ( छह सिद्धियाँ) प्रकट होती है- (1.) प्रातिभ – इससे भूत, भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म, ढ़की हुई और दूर देश में स्थित वस्तुएँ प्रत्यक्ष हो जाती है।(2.) श्रावण – इससे दिव्य शब्द सुनने की शक्ति आ जाती है। (3.) वेदन – इससे दिव्य स्पर्श का अनुभव करने की शक्ति आ जाती है। (4.) आदर्श – इससे दिव्य रूप का दर्शन करने की शक्ति आ जाती है। (5.) आस्वाद – इससे दिव्य रस का अनुभव करने की शक्ति आ जाती है।(6.)वार्ता- इससे दिव्य गंध का अनुभव करने की शक्ति आ जाती है।

      उपर्युक्त ज्ञान के अतिरिक्त पातंजलि योगदर्शन में वर्णित सभी बातों की मेरे अनेक साधकों को प्रत्यक्षानुभूति एवं साक्षात्कार हो रहे हैं, जो कि भौतिक जगत् में पूर्ण सत्य प्रमाणित हो रहे हैं। मेरे शिष्यों में अधिकतर शिक्षित स्त्री-पुरूष हैं। बहुत से भौतिक विज्ञान के शिक्षक और छात्र हैं। सभी को उपर्युक्त ज्ञान प्राप्त हो रहा है। मेरी मान्यता है कि भौतिक विज्ञान के शोधकर्ताओं की असंख्य समस्याओं का समाधान इस ज्ञान से हो जाएगा। समाधि स्थिति में वह परमसत्ता हर समस्या का समाधान शोधकर्ता को करवा देगी। इस प्रकार विश्व के मानव की असंख्य समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

     मैं संसार में इस ज्ञान को बाँटने के लिए ही मेरे गुरु के आदेश से निकला हूँ। यह ज्ञान मात्र गुरु कृपा से ही प्राप्त होना संभव है। इसकी कीमत मात्र गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण है। और किसी विधि या बौद्धिक प्रयास के यह ज्ञान प्राप्त होना असंभव है। इस समय मानव, बुद्धि को बहुत बड़ी मानता है। परन्तु इस युग का मानव भूल जाता है,कि ‘मन’ बुद्धि को दिन में कई सब्जबाग दिखाकर चकमा दे जाता है। भारतीय योगदर्शन में मन को स्थिर करके ही यह ज्ञान प्राप्त करने की क्रियात्मक विधि बताई गई है। पातंजलि ऋषि ने जब योग दर्शन लिखना आरंभ किया तो योग की व्याख्या करते हुए दूसरे सूत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा है – ‘चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।’ और यह कार्य मनुष्य स्वयं नहीं कर सकता। इसमें चेतन गुरु की नितान्त आवश्यकता होती है। इस संबंध में महोपनिषद् में कहा हैः

दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्वदर्शनम्।

दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरोः करुणां बिना।77॥

     ‘सद्गुरु की दया के बिना विषय-त्याग दुर्लभ है, तत्त्वदर्शन दुर्लभ है,और सहजावस्था दुर्लभ है’।

     मेरे संत सदगुरु देव बाबा श्री गंगाईनाथ जी योगी (ब्रह्मलीन ) की अहैतुकी कृपा मुझ पर नहीं होती तो मैं, सौ जन्म आराधना करके भी यह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता था। अतः इसे गुरुप्रसाद समझकर बाँटने निकला हूँ।

     विश्व के सभी सकारात्मक स्त्री-पुरूषों को सच्चाई जानने के लिए सप्रेम आमंत्रित करता हूँ।

– समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग

Read more

आध्यात्मिक-ज्ञान प्राप्ति का समय भी युवावस्था

मनुष्य जीवन में क्रमिक विकास के अनुसार ही कार्य करने के नियम निर्धारित किये गये हैं। शारीरिक और बौद्धिक विकास को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण जीवन को चार भागों में बाँटा है ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रथम 25 वर्षों में विद्या अध्ययन अर्थात् भौतिक और अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति, ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते हुए करने का विधान निश्चित किया हुआ है।

     विद्यार्थी जीवन के आखिरी 2-3 वर्षों में वैदिक दर्शन और योगदर्शन की शिक्षा सम्पूर्ण ढंग से दी जाती थी, ताकि वह अगले तीनों आश्रमों में पूर्णरूप से अर्थात् शरीर, मन और बुद्धि से स्वस्थ रहते हुए सार्थक जीवन जी सकें। दूसरे 25 वर्ष गृहस्थ धर्म का पालन करने के लिए निश्चित किये हुए थे। तीसरे 25 वर्ष वानप्रस्थ धर्म के लिए निश्चित थे। इसमें मनुष्य, गृहस्थ में रहते हुए भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता था और अपने सम्पूर्ण अर्जित ज्ञान की शिक्षा अपनी संतानों को देकर उनका पथ प्रदर्शन करता था।

      इस प्रकार उसकी संताने भी जो ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में होती थी, सार्थक जीवन जीने के लिए सम्पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर लेती थी। इसके बाद वह घर का सम्पूर्ण त्याग करके पूर्ण रूप से संन्यासी का जीवन बिताने जंगलों में चला जाता था।

     उपर्युक्त व्यवस्था त्रेता और द्वापर में रही होगी, जबकि मनुष्य की क्षमता और संसार का वातावरण पूर्णरूप से ठीक था। उन युगों में तामसिक वृतियों की प्रधानता नहीं थी, अतः मनुष्य का चरित्र बहुत उज्ज्वल था। परन्तु जब से कलियुग का प्रहर प्रारंभ हुआ है, तामसिक वृतियों ने सभी धर्मों को छिन्न-भिन्न कर दिया है। मनुष्य पूर्णरूप से स्वेच्छाचारी हो गया है। जीवन की सभी मर्यादायें पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं।

      हम जिस वैदिक दर्शन और योगदर्शन की बात करते हैं, वह व्यावहारिक जीवन से लोप प्रायः हो चुका है। आज हमारे उपर्युक्त दोनों दर्शन मात्र दार्शनिक ग्रंथों में कैद पड़े हैं। जब तक इस ज्ञान को कैद से मुक्त करके, मनुष्य शरीर रूपी प्रयोगशाला में प्रमाणित नहीं किया जायेगा, सार्थक जीवन बिताना असंभव है। काल के गुणधर्म के कारण योगदर्शन लुप्त प्रायः हो गया है। सांख्य दर्शन निरन्तर उन्नति कर रहा है। उसकी सभी उपलब्धियों पर पूर्णरूप से तामसिक वृत्तियों का आधिपत्य है।

      अतः उसका उपयोग वे वृतियाँ मात्र अपने स्वार्थ के लिए कर रही हैं। ऐसी स्थिति में मानव शांति एक सुखद कल्पना मात्र है। तामसिक वृत्तियों के कारण ईश्वर, कल्पना का ही विषय है। जीवन की सच्चाई लुप्त हो चुकी है। एक सर्वमान्य सिद्धान्त बन गया है कि अध्यात्म ज्ञान प्राप्ति का समय मात्र वृद्धावस्था ही है। कैसी भ्रांति फैला दी है, मानो अध्यात्म ज्ञान व्यावहारिक जीवन में एक अड़चन है। अगर वह ईश्वर व्यावहारिक जीवन में सार्थक नहीं था तो बुढ़ापे में वह क्या कर देगा? बुढ़ापे में सभी अंग प्रत्यंग शिथिल पड़ जाते हैं। अनेक प्रकार की बीमारियाँ घेर लेती हैं। उन्हीं कष्टों की तरफ ध्यान रहेगा, ईश्वर याद ही नहीं आएगा। अतः सभी प्रकार के ज्ञान प्राप्त करने का समय किशोरावस्था ही है।

      अध्यात्म-विज्ञान, मनुष्य को पूर्ण सार्थक जीवन जीने के योग्य बनाता है। हमारे धर्म में घुसी हुई भ्रांति के कारण ही धर्म का पतन हुआ है। मेरे पास प्रथम बार कुछ पॉलीटेक्निक कॉलेज और मेडिकल कॉलेज के छात्र आये। उन्होंने पूछा अध्यात्म विज्ञान कैसा विज्ञान है और मनुष्य जीवन में इसकी क्या सार्थकता है? मैंने कहा, “जहाँ आपका भौतिक विज्ञान खत्म होता है, अध्यात्म विज्ञान वहाँ से शुरू होता है। आपका विज्ञान एक टैस्ट ट्यूब में कैद है। हमारे विज्ञान की टैस्ट ट्यूब पूरा ब्रह्माण्ड है।” उन्हें मेरी बात बहुत ही बुरी लगी।

      उन्होंने ताने के रूप में कहा, ”हमारे वैज्ञानिक तो चन्द्रमा पर पहुँच गये और आप लोग पहुँच गये रसातल में, और आप अध्यात्म विज्ञान रूपी काल्पनिक ज्ञान को बड़ा बताते हो।“मैंने कहा, ”बेटा। आपकी बात ठीक है, परन्तु जहाँ सच्चाई है, वहाँ तो वैसा ही है, जैसा मैंने कहा। इससे वे और उत्तेजित हो गये और मेरी तरफ हाथ से इशारा करते हुए कहा ”आप ही सच्चाई बताने निकले हैं क्या ? दूसरे बड़े-बड़े मठाधीश क्या कर रहे हैं?

      मैं अच्छी तरह जानता था कि मुझे यही बातें सुनने को मिलेगी। मैंने कहा, ‘देखो बेटा जैसा चाहो प्रमाण पत्र दे जाना, मैं सहर्ष स्वीकार कर लूंगा। परन्तु प्रमाणपत्र देने से पहले मेरी बात तो सुनो।” तो वे कुछ शांत हुए और सुनने समझने के लिए तैयार हो गये।

     मैंने कुण्डलिनी महाविज्ञान, योगदर्शन और शक्तिपात की बात समझाकर, इस संबंध की पुस्तकें उन्हें दे दी। वे पुस्तकें अपने हॉस्टल में ले गये। कई साथियों ने उन्हें पढ़ा। इसके बाद करीब 25-26 छात्र मेरे पास आये, और बोले कि पुस्तकों में जो लिखा है उसकी अनुभूति जब तक हमें नहीं होती, हम नहीं मानेंगे। मैंने कहा, “कोई भी नहीं मानेगा।” जिस प्रकार ध्यान की विधि मैंने बताई, वे मेरे सामने बैठ कर ध्यान करने लगे। ज्योंहि मन शांत हुआ, उन्हें कुछ आनन्द आने लगा। और ज्योंहि वे लोग मानसिक रूप से तैयार हुए, शक्तिपात की लहर उनमें प्रवेश कर गई और सभी को यौगिक क्रियाएँ स्वतः होने लगी।

     करीब आधे घंटे बाद मुद्राएँ बंद हो गई। मैंने उनसे पूछा, “आप लोग यह कैसी कसरत करने लगे। क्या मेरा कमरा खेल का मैदान था?” लड़कों की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई। कहने लगे “हमने नहीं किया, यह तो हमारी इच्छा के विपरीत हो गया” मैंने कहा, “मैं देख रहा था, आप ही कर रहे थे।” उन्होंने कहा, “आपके आदेश के अनुसार आँख बंद करके, हमेशा की तरह आज्ञाचक्र पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे कि अचानक अन्दर से ये क्रियाएँ करवाई जाने लगी। हमने आँखें खोलने का प्रयास भी किया परन्तु आँखे नहीं खुली। शरीर को मजबूती से रोकने का प्रयास किया, परन्तु नहीं रोक सके। आखिर सोचा, होने दो आगे क्या होता है? अब अपने आप बंद हो गई। कोई अंदर से निर्देश दे रहा था, उसी कारण से हो रही थी। अन्दर कौन दिशा निर्देश दे रहा था, हमें दिखाई नहीं दिया !” तब मैंने कहा, इसका अर्थ यह हुआ कि अन्दर कोई ऐसी शक्ति भी है, जो आपको अपनी इच्छा से चला सकती है।” वे बोले, “अब इसमें तर्क की गुंजाईश ही नहीं। मैं बोला “फिर अन्दर वाले से गहरी दोस्ती करो, वह आपको बहुत कुछ बताएगा।”

      इसके बाद शाम पाँच से छह बजे तक, वे रोज आकर ध्यान करते और सभी को विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ होती। ज्योंहि कुण्डलिनी आज्ञाचक्र के निकट पहुँची प्राणायाम स्वतः होने लगा। तब मैंने कहा कि इस दीक्षा में मंत्र दीक्षा के बिना आप समाधिस्थ नहीं हो सकोगे। आज्ञाचक्र तक तो हठ योग से भी काम चल जाता है, परन्तु आज्ञाचक का भेदन करके परब्रह्म (सत्+चित्+आनन्दः सच्चिदानन्दघन ) के जगत् में प्रवेश करने के लिए उपयुक्त मंत्र का जप, ध्यान के साथ नितान्त जरूरी है। तब तक वे सभी मानसिक रूप से तैयार हो चुके थे। दीक्षा के बाद थोड़े दिनों में उनकी समाधि लगने लगी। तब एक दिन मैंने उनसे कहा, ”बेटा। अब जो भी प्रमाणपत्र देना चाहो, दे दो, मैं सहर्ष स्वीकार करने को तैयार हूँ।” लड़के बहुत ही शर्मिन्दा हुए और बोले, “गुरुजी। आप हमें कुछ भी कहें, हम निर्दोष थे।” क्या भारत के आध्यात्मिक जगत् में यह ज्ञान करवाया जा रहा है?

     अतः मेरी यह मान्यता है कि जब संसार के लाखों युवा अपनी आन्तरिक चेतना की अभिवृद्धि करके भौतिक-विज्ञान पर शोध कार्य करेंगे, तो भौतिक विज्ञान की असंख्य समस्याएँ सुलझ जायेगी। मैं सामूहिक दीक्षा देता हूँ। उस परमसत्ता के लिए एक लाख लोगों को चेतन करने के लिए एक क्षण के समय की भी आवश्यकता नहीं। अगर मेरे सामने एक लाख लोग दीक्षा लेने बैठे हैं तो उनमें से सभी सकारात्मक लोग एक साथ चेतन हो जायेंगे, चाहे उनकी संख्या कितनी ही अधिक क्यों न हो। सामूहिक शक्तिपात दीक्षा बिना, विश्वशांति असम्भव है।

      अतः विश्व के सभी सकारात्मक स्त्री-पुरुषों को सप्रेम आमंत्रित करता हूँ।

     “पवित्र ग्रंथ बाइबल की भविष्यवाणियाँ’ पुस्तक से

Read more

सिद्धियाँ

जब साधक योग साधना में आगे बढ़ता है तो उसको आराधना काल में अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। सिद्धयोगियों ने इन सिद्धियाँ में नहीं फंसने की बात कही है। सद्गुरुदेव ने अपनी कर कमल की लेखनी से लिखकर यह पाठ्य सामग्री ‘स्पिरिचुअल-साइंस’ पुस्तक में छापने का आदेश दिया था। शास्त्रिय महर्षियों ने मोटे तौर से तीन प्रकार की सिद्धियाँ बताई हैं। हम उन तीनों को तमोगुण-सिद्धि, रजोगुण-सिद्धि एवं सतोगुण-सिद्धि के नाम से समझ सकते हैं:-

      1. मैली (तमोगुणी) वह है, जो अशुद्धि व्रत, मंत्र या द्रव द्वारा प्राप्त की जाती है। इस मैली-सिद्धि जानने वालों को यदि स्नान करवा कर शुचि और पवित्र बना दिया जाय तो वह अपनी सिद्धि नहीं कर सकता। जब वह हाथ या पैर मैला करता है, तभी सिद्धि का प्रदर्शन कर सकता है। यह सिद्धि दूसरों का अनिष्ट करती है, किसी का मंगल नहीं कर सकती।

     2. मंत्र-सिद्धि वह है,जो देश और काल की अपेक्षा रखकर किसी एक देवता को लक्ष्य करके मंत्रजप से प्राप्त की जाती है। यह सिद्धि जिसको प्राप्त हो, वह देवता का स्मरण या मंत्रजप करके हाथ में फल, मिठाई एवं सोने-चाँदी के आभूषण इत्यादि लाता है या कोई वस्तु एक स्थल से दूसरे स्थान पर संक्रमित करता है। तथा और भी कई प्रकार के चमत्कार दिखा सकता है। इस प्रकार की सिद्धियाँ दिखाने से लोग आकर्षित होते हैं। ऐसी कृत्रिम रीति से मिली हुई क्षुद्र सिद्धियाँ ज्यादा समय तक नहीं टिकती।

     3. अष्टांगयोग करने से जो संयमसिद्धि प्राप्त होती है, वह योग सिद्धि है। यह सत्य और शास्त्रिय सिद्धि है।

     4. चौथी सिद्धि त्रिगुणातीत उस परमसत्ता की है, जिसे महासिद्धियाँ त्रिगुणातीत सिद्धि कहते हैं। यह वह सिद्धि है, जो हमेशा ईश्वर के आदेश से ही कार्य करती है। उस परम सिद्धि के अधीन आठ प्रकार की शक्तियाँ होती हैं, जिनका वर्णन पातंजलि योगदर्शन के विभूतिपाद के 45 वें सूत्र में निम्न प्रकार से किया है:-

     “ततोणिमादिप्रादुर्भाव:कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च॥ 3:45॥

     डस (भूतजय ) से अणिमादि आठ सिद्धियों का प्रकट होना कायसम्पत्त की प्राप्ति और उन भूतों के धर्मों से बाधा न होना (ये तीनों होते हैं)

     अणिमाः- अणु के समान सूक्ष्म रूप धारण कर लेना।

      लघिमाः- शरीर को हल्का ( भारहीन ) कर लेना।

     महिमाः- शरीर को बड़ा( विशालकाय ) कर लेना।

      गरिमाः- शरीर को भारी कर लेना।

      प्राप्तिः- जिस किसी इच्छित भौतिक पदार्थको संकल्पमात्र से ही प्राप्त कर लेना।

      प्राकाम्यः- बिना रुकावट भौतिक पदार्थ संबंधी इच्छा की पूर्ति अनायाश हो जाना।

      वशित्वः- पाँचों भूतों का और तंजंन्य पदार्थों का वश में होना।

     ईशित्वः- उन भूत और भौतिक पदार्थों का नाना रूपों में उत्पन्न करने और उन पर शासन करने की सामर्थ्य प्राप्त करना।

     – समर्थ सदगुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

आध्यात्मिक सत्संग

इस युग में आध्यात्मिक सत्संग का सही अर्थ प्रायः लुप्त हो चला है। भजन, कीर्तन, कथा, उपदेश आदि सत्संग के कई प्रकार, इस समय संसार में प्रचलित हैं। सत्संग का सीधा साधा अर्थ है, सत्य का साथ करना। केवल ईश्वर ही सत्य है बाकी दृश्य जगत् सारा नाशवान है। अतः जिसके संग के कारण उस परमतत्त्व परब्रह्म परमात्मा, सच्चिदानन्दघन की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार हो जाय, वही सच्चा सत्संग है।इस समय संसार से ईश्वर तत्त्व प्रायः पूर्ण रूप से लोप हो गया है।

     इस समय उस तत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति मात्र कल्पना का विषय रह गया है। उस परमतत्त्व के लोप होने के सम्बन्ध में समर्थ गुरु स्वामी रामदास जी महाराज कहते हैं:-

‘‘तिन्ही लोक जेथून निर्माण जालेतया देवरायासि कोणी न बोले।

जगी थोरलादेव तो चोरलासे गुरुवीण तो सर्वथाही न दीप्ते।।’’

     ‘‘तीनों लोक-भूलोक, द्युलोक, पाताल लोक जहाँ से उत्पन्न हुए उस सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म देवाधिदेव श्रीराम को कोई नहीं कहता। जग में, सर्वोत्तम देव चुराया गया है। उसके चोरी हो जाने के बाद, वह दिखाई नहीं दे रहा है। उस सर्व देवाधिदेव की चोरी की तो गई है किन्तु सदगुरुरूपी गुप्तचर की सहायता के बिना वह नहीं दिख सकेगा।’’ परन्तु इस युग में संत सद्गुरु मिलना बहुत ही कठिन है। इस सम्बन्ध में समर्थ गुरुदेव कहते हैं :-

गुरु पाहता पाहतां लक्ष कोटी।बहुसाल मंत्रावली शक्ति मोठी।

मनी कामना चेटके धातमाता।जनीव्यर्थरे तो नव्हे मुक्तिदाता॥

      “गुरुओं को देखते-देखते तो लाखों-करोड़ो गुरु मिलेंगे। वे बहुत वर्षों तक मंत्र द्वारा चतुराई से अपने भीतर जादूगरी की बड़ी शक्ति द्वारा कामना-पूर्ति कर लोगों को अपने चंगुल में चिन्तामणि सदृश अपनी मन्त्र शक्ति के प्रभाव से ही हँसाते फिरते हैं। ऐसे लोग व्यर्थ होते हैं। वे मोक्षदाता-सद्गुरु पद पाने के अधिकारी नहीं होते।” आगे ऐसे गुरुओं के लिए समर्थ गुरु कहते हैं।:-

नव्हे चेटकीचालकूद्रव्यभोंदू।नव्हे निंदकू मत्सरू भक्तिमंदु। 

नव्हे उन्मतू वेसनी संगबाधू।जगी ज्ञानियो तोचि साधु अगाधू॥

     जो जादू करने वाला होता है, लोगों के सम्मुख दीनता दिखाकर आह्लाद उत्पन्न करनेवाला या मिथ्या प्रशंसा करनेवाला होता है। तथा अपने साधुत्व का प्रदर्शन कर लोगों से पैसा लूटनेवाला द्रव्यलोभी होता है, वह सद्गुरु पद का अधिकारी नहीं होता।”

      “वह किसी की निन्दा नहीं करता किसी से मत्सर्य नहीं रखता, उन्मत्त नहीं होता, व्यसनी नहीं होता तथा बुरी संगति में नहीं रहता जो बुरी संगतियों में बाधा डालनेवाला ज्ञान सम्पन्न होता है, वही अगाधाज्ञानी व्यक्ति साधु है। ऐसा जानना चाहिए।

नव्हे वाडगीचाहुटी काम पोटी। क्रियेवीण वाचालत तेचि मोटी।

मुखे बोलिल्यासारिखें चालताहे। मना सद्गुरु तोचि शोधूनि पाहे॥

     वह व्यक्ति चुगलखोर नहीं होता। उसके अन्तरंग में काम भावना नहीं होती। वह मुख से बोले गये शब्दों का वैसा ही आचरण करने में सभ्य होता है। हे मन इन लक्षणों से युक्त व्यक्ति को ही सद्गुरु समझना चाहिए।

जन भक्त ज्ञानी विवेकी विरागी। कृपालू मनस्वी क्षमावंत योगी।

प्रभूदक्ष व्युत्पन्न चातुर्य जाणे। त्याचेनि योगे समाधान बाणे॥

      वह सद्गुरु पद का अधिकारी भक्त होता है और विवेक वैराग्य सम्पन्न, कृपालू मनस्वी क्षमाशील, योगी, समर्थ, अत्यन्त सावधान, व्युत्पन्न (प्रत्युत्पन्नमतिवाला) चातुर्यसम्पन्न तथा संगति करने पर समाधान की प्राप्ति कराकर समाधानी बनाने वाला होता है।

नव्हें तेंचि जाले नसे तेंचि आल।कलों लागले सज्जनाचेनि बोल॥

अनिर्वाच्य ते वाच्य वाचे वदावें। मना संत आनंत शोधीत जावें।

      जो पहले नहीं था, वह हो गया – स्वरूप का बोध पहले नहीं था, वह हो गया। जो नहीं आता था, वह समाधान आ गया। ब्रह्मज्ञान से पूर्ण स्वरूपानन्द का भोग करने से समाधान चित्त में वास करने लगता है। गहन वेदान्त वाक्यों का बोध जो स्वरूप का संकेत दिया करता था, वह पहले नहीं समझता था। वह बोध महावाक्य (तत्त्वमसि ) आदि का अर्थ सद्गुरुदेव के कृपा वचनों से सहज ही आत्मसात् हो जाने से समझ में आने लगा।

      जो ब्रह्म निर्गुण निराकार और वाणी से परे अनिर्वचनीय था, वही वाणी से कहने योग्य और वाच्य हो गया। यह सदगुरुदेव की कृपा है। कि वही ब्रह्म अब मेरे कथन का विषय हो गया है। हे मन !नित्य अनन्त ब्रह्म को सत्संग

     उपर्युक्त से स्पष्ट होता है कि ऐसे संत सदगुरु की सत्संग को ही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक सत्संग कहा जा सकता है।

     अगर आध्यात्मिक सत्संग प्रत्यक्ष परिणाम न दे तो उसे सत्संग नहीं कहा जा सकता। केवल विश्वास से काम नहीं चल सकता। जिस प्रकार गुड़ खाते ही मुँह में मिठास पैदा हो जाता है, ठीक वैसा ही परिणाम सत्संग का होना चाहिए। इसके विपरीत सभी कर्मकाण्ड और प्रदर्शन हैं। समर्थ गुरु स्वामी रामदास जी महाराज ने जो संत सद्गुरुदेव की पहचान बताई है, वैसा ही गुरु, ‘सत्संग’ के योग्य होता है।

     संसार के प्रायः सभी धर्म संसार के सर्वभूतों (जड़ और चेतन) की उत्पत्ति शब्द से मानते हैं। सभी धर्म कहते हैं कि वह शब्द ‘प्रकाशप्रद’ हैं। सर्व प्रथम शब्द और प्रकाश से ज्ञान की उत्पत्ति होती है, फिर संपूर्ण ब्रह्माण्ड और त्रिगुणमयी माया की उत्पत्ति होती है। फिर त्रिगुणमयी माया अपने जनक ‘शब्द’ और प्रकाश (प्रकाशप्रदशब्द ) की प्रेरणा से संसार के सर्वभूतों की रचना करती है। संसार का यह सारा प्रपंच उसी प्रकाशप्रद शब्द की देन है। दूसरे शब्दों में यह सारा संसार एक ही परमसत्ता का विस्तार मात्र है। संत सद्गुरुदेव निराकार ब्रह्म का सगुण साकार स्वरूप ही होता है।

     अतः संत सद्गुरुदेव द्वारा प्राप्त प्रकाशप्रद शब्द की धार के सहारे उस दिव्य प्रकाश के आनन्द और रोशनी में उस पथ पर चलना सम्भव ने आदि में वह प्रकाशप्रद शब्द प्रकट होता है। उसी को अलख लोक के ऊपर वाला प्रकट होता है। उसी को अलख लोक के ऊपर वाला, अगम लोक संतों ने बारम्बार कह कर वर्णन किया है। उस लोक में जाते ही जीवात्मा अपने जनक परमात्मा में पूर्ण रूप से लीन हो जाता है। इसी का नाम‘मोक्ष’ है। प्रकाशप्रदशब्द के दिव्य प्रकाश से मनुष्य को अपने अन्दर उस दिव्य आनन्द की प्रत्यक्षानुभूति होने लगती है। बिना उस आनन्द की प्राप्ति के मनुष्य को मोक्ष का अर्थ ही समझ में नहीं आ सकता।

     जब तक संत सद्गुरुदेव की कृपा से उस दिव्य आन्तरिक आनन्द का स्वाद मनुष्य चख नहीं लेता, उसे माया के प्रभाव से बाहरी भौतिक सुख ही प्रभावित करते रहते हैं। वह बारम्बार यही कहता है कि क्या जरूरत है मोक्ष की ? संसार के इस आनन्द को छोड़ कर मोक्ष का प्रयास मूर्खता है। क्योंकि उसने उस दिव्य आन्तरिक आनन्द का स्वाद चखा ही नहीं है। इस लिए वह सांसारिक सुखों में और दिव्य आन्तरिक आनन्द में भेद समझ ही नहीं सकता है। यह सारा प्रपंच केवल उपदेश, प्रदर्शन शब्दजाल और दर्शन शास्त्र के ग्रन्थों आदि से समझ में नहीं आ सकता।

     ये सब मनुष्य को बुद्धि की कसरत मात्र करवा कर ज्ञानी बनने का भ्रम ही पैदा कर सकते हैं। इस समय संसार में यही भ्रम खुला बिक रहा है। अध्यात्म ज्ञान के नाम से यह संसार में सर्वत्र उपलब्ध है। क्योंकि यह ज्ञान कोई प्रत्यक्ष परिणाम नहीं देता है, इसलिए संसार के युवा वर्ग का विश्वास इससे खत्म हो चुका है। मृत्यु के करीब पहुँचे हुए शक्तिहीन स्त्री-पुरुष ही जीवन में किये हुए काम को याद करके अपनी ही तस्वीर से भयभीत होकर इसे पाने का प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि भय के कारण बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, अतः वे असन्तुलित प्राणी कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते।

     अध्यात्म का पतन उस समय प्रारम्भ हुआ, जब धर्म गुरुओं ने इसका सम्बन्ध पेट से जोड़ लिया। आज सभी धर्मों के धर्मगुरुओं को जीवित रहने के लिए हठ धर्मिता से अध्यात्म पर चलना पड़ रहा है। ऐसा करना उनकी मजबूरी है। इस हठधर्मी प्रवृत्ति ने संसार के लोगों को विद्रोही बना दिया। इस प्रकार अध्यात्म एक तमाशा बन चुका है। सर्व भूतों के जनक आदि कारण के प्रति ऐसा भाव परिवर्तन विशेष का द्योतक है। यह वैज्ञानिक सच्चाई है कि जब किसी बात की अति हो जाती है तो उसका अन्त हो जाता है। ऐसा होना अनिवार्य भी है। क्योंकि अनादि काल से उत्थान और पतन का यह क्रम चला आ रहा है।

     संसार का अन्धकार उस दिव्य ज्ञान ज्योति के उदय हुए बिना हटना असम्भव है। पहला दीपक जलना ही कठिन होता है, उसके बाद तो दीपक से दीपक जलने की प्रक्रिया के अनुसार पूरे विश्व में प्रकाश फैलने में देर नहीं लगेगी। जब यह मधुर स्वर लहरी संसार के वायु मण्डल में तरंगित होने लगेगी तो आम प्राणी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इस प्रकार यह दिव्य प्रकाश, प्रकाश की गति से भी तेज, पूरे संसार में फैल जावेगा। प्रतिरोधक शक्तियाँ संभल भी नहीं पाएंगी। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि वे बिना विरोध के शान्त हो जाएंगी। उस परमसत्ता को संसार से उनका सफाया करना है। अतः उस विकृति के सफाये के लिए अन्धेरे और उजाले का संघर्ष अनिवार्य है। इसके बिना पूर्ण शान्ति असम्भव है। यह क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है। पाप का अन्त कुरुक्षेत्र में ही होता है। महर्षि श्री अरविन्द की यह घोषणा कि वह परमसत्ता भारत की भूमि पर 24 नवम्बर 1926 को अवतरित हो चुकी है, गलत नहीं है। उसके अवतरित होने का स्पष्ट अर्थ है, अन्धकार का सफाया। ऐसा अनादि काल से होता आया है। हमें इतिहास को ध्यान में रखते हुए ऐसे संघर्षों से घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि ऐसा होना अनिवार्य है। ऐसा अनादि काल से होता आया है।

     संसार में अन्धकार से जो संहार और हा-हा कार मचा हुआ है। वह पूर्ण शान्ति का उषाकाल है। दीपक जब बुझते समय तेज प्रकाश फैलाता है, वैसे ही अन्धकार मिटने से पहिले भयंकर तबाही मचाता है। यह प्रकृति का अटल नियम है।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

यह सम्पूर्ण संसार एक ही परमसत्ता का विस्तृत स्वरूप है।

 भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के 10 वें अध्याय के 39 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है:-

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।      

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥10:39॥

     “और हे अर्जुन ! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ। क्योंकि वह चर और अचर भूत नहीं है, जो मेरे रहित होवे। इसे और स्पष्ट करते हुए 42वें श्लोक में कहा है :-

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।      

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 10:42॥

     “अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है। मैं इस सम्पूर्ण जगत् को एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।” ऐसी स्थिति में संसार में जो कुछ हो रहा है, उसका दोष किसी को भी देना व्यर्थ है। वह परमसत्ता सब भूत प्राणियों को भरमाते हुए अपनी इच्छा के अनुसार चला रही है। इस सम्बन्ध में महर्षि अरविन्द को भगवान् ने अलीपुर जेल में जो आदेश दिया था, उससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भारत में निश्चित रूप से अवतरित हो चुके हैं।

     भगवान् ने कहा है :- ”मैं इस देश को अपना संदेश फैलाने के लिए उठा रहा हूँ, यह संदेश उस सनातन धर्म का संदेश है जिसे तुम अभी तक नहीं जानते थे, पर अब जान गये हो। तुम बाहर जाओ तो अपने देशवासियों से कहना कि तुम सनातन धर्म के लिए उठ रहे हो, तुम्हें स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, अपितु संसार के लिए उठाया जा रहा है। श्री अरविन्द को दिये उपर्युक्त आदेश से मालूम होता है कि वह परमसत्ता इस देश में अवतरित होकर संसार भर में पुनः सनातन धर्म की एक मात्र सत्ता स्थापित करके, युग परिवर्तन करना चाहती है। ईसाई धर्म के संतों की यह भविष्यवाणी है कि:-“बीसवीं शताब्दी के अन्त तक चर्चा का अस्तित्व मिट जायेगा।

     यीशु ने अपने अन्तिम दिनों में स्वयं अपने शिष्यों से कहा था :- मैं तुम्हें सच्चाई बताता हूँ। यह तुम्हारे लिए लाभदायक है कि मैं तुम्हें छोड़ कर जा रहा हूँ। यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास नहीं आएगा। पर यदि मैं जाऊँ तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। जब वह आ जाएगा तो वह संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में दोषी ठहराएगा। पाप के विषय में इसलिए कि संसार के लोगों ने मुझ पर विश्वास नहीं किया। धार्मिकता के विषय में इसलिए कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ और तुम मुझे फिर न देखोगे। न्याय के विषय में इसलिए कि इस संसार का शासक दोषी ठहराया गया है।

     मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, पर अभी तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते ।जब वह सत्य का आत्मा आएगा, तब वह सम्पूर्ण सत्य में तुम्हारा मार्ग दर्शन करेगा। वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। जो बातें वह सुनेगा, वही कहेगा। वह होने वाली घटनाओं के विषय में तुम्हें बतलाएगा। वह मेरी महिमा करेगा क्योंकि वह मेरी बातें ग्रहण करेगा और तुम्हें बताएगा। जो पिता है, वह मेरा है इसलिए मैंने कहा कि आत्मा मेरी बात ग्रहण करेगा और तुम्हें बताएगा।

     यह शब्द कि ”जो पिता का है वह मेरा है” स्पष्ट करता है कि जो शक्ति अवतरित होगी, उसका सीधा सम्पर्क उस परमसत्ता से होगा। क्योंकि आगे होने वाली बात ईश्वर के सिवाय कोई भी नहीं जान सकता। भगवान् ने 10 वें अध्याय के 34 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है :-

मृत्युः सर्वहरचाह मुभवश्च भविष्यताम्।      

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।। 10:34।।

      मैं सब का नाश करने वाला, मृत्यु और आगे होनेवालों की उत्पत्ति का कारण (हूँ) तथा स्त्रियों में कीर्ति श्री, वाक्, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।

     उपर्युक्त श्लोक में भगवान् ने कहा है कि संसार में आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण केवल वही है। यीशु का यह कहना है कि वह सत्य की आत्मा ‘आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” स्पष्ट करता है कि वह पूर्ण सत्ता ही मनुष्य के रूप में अवतरित होगी। इसी प्रकार संसार के अनेक संत उस परम सत्ता के अवतरित होने की भविष्यवाणियाँ काफी समय से कर रहे हैं।

     15वीं शताब्दी में ब्रिटेन की एक महिला ने घोषणा की थी कि ”बीसवीं सदी के आखिरी दो दशकों में सारा संसार ग्रह युद्ध की लपेट में आकर भारी जन-धन की हानि उठाएगा। अन्त में 20वीं सदी के आखिरी दशक में भारत के उत्तरी हिस्से में एक ऐसा मनुष्य प्रकट होगा जो संसार को सम्बोधित करेगा। उसकी सभी बातें सत्य होगी और सारा संसार उसकी बातों का अनुसरण करने लगेगा। इस प्रकार 21वीं सदी में पूरे संसार में सुख शान्ति स्थापित हो जायेगी और भारत पुनः जगत्गुरु का स्थान ग्रहण कर लेगा अतः श्री अरविन्द ने 24 नवम्बर 1926 को भगवान् श्रीकृष्ण के अवतरण की जो घोषणा की है वह सत्य प्रमाणित होगी।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

मोक्ष की प्राप्ति केवल कृष्ण उपासना से ही सम्भव है।

 मनुष्य योनि, प्राणधारियों में सर्वोत्तम योनि है। मनुष्य शरीर, ईश्वर का सर्वोत्तम स्वरूप है। केवल इसी योनि में ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार संभव है और इसके बिना मोक्ष असम्भव है। केवल मोक्ष ही जीवन का आखिरी उद्देश्य है। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि यह मनुष्य शरीर सुखरहित क्षण भंगुर है। केवल ईश्वर प्राप्ति से ही मोक्ष और परमानन्द की प्राप्ति संभव है। इस सम्बन्ध में भगवान् ने गीता के नौवें अध्याय के 32वें और 33वें श्लोक में साफ कहा है :-

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।      

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥9:32॥      

किं पुनर्बाह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।      

अनित्यमसुख लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥9:33॥

     क्योंकि हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य शुद्रादिक तथा पापयोनि वाले भी जो कोई होवें, वे भी मेरे शरणागत हो कर परमगति को प्राप्त होते हैं, फिर क्या कहना है। पुण्य शील ब्राह्मणजन तथा राजर्षि भक्तजन (परमगति को )प्राप्त होते हैं, इसलिए सुख रहित क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर। परन्तु हम देख रहे हैं, भगवान् ने गीता में सारी स्थिति स्पष्ट कर दी है फिर भी संसार का मानव भ्रमित हुआ, अविश्वासी नस्तिकों की तरह भटक रहा है। या फिर छोटे-छोटे देवताओं तथा प्रेतों के सामने नतमस्तक हुआ, भयंकर कष्ट भोगते हुए नष्ट होकर अधोगति को प्राप्त हो रहा है। एक तो कलियुग के कारण संसार में पूर्ण रूप से तामसिक शक्तियों का साम्राज्य और फिर ऐसी स्थिति में त्रिगुणमयी, योगमाया के चक्कर से निकलना, इस युग में बड़ा कठिन है। केवल भगवान् की अनन्य शरण से ही काम बनना सम्भव है। इस सम्बन्ध में भगवान् ने सातवें अध्याय के 14वें श्लोक में स्पष्ट कहा है :-

दैवी ह्योषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।      

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥7:14॥

     क्योंकि यह अलौकिक त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है, जो पुरुष मेरे को ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं। ऐसी स्थिति में इस युग में प्रचलित आराधनाओं से मोक्ष प्राप्त करना असमर्थ है। संसार के सभी प्राणी त्रिगुणमयी माया के क्षेत्र की शक्तियों को ही मोक्ष देने वाली सत्ता समझ कर, उनके चक्कर में भ्रमित हो रहे हैं। इस सम्बन्ध में गीता के आठवें अध्याय के 16वें श्लोक में स्थिति को स्पष्ट करते हुए भगवान् ने कहा हैं :-

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।      

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥16॥

      हे अर्जुन ! ब्रह्मलोक से लेकर सब लोक पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं।, परन्तु हे कुन्ती पुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता है। इस पर भी काल के गुण धर्म के कारण लोगों की मति ऐसी भ्रमित हो रही है कि जन्म मरण के चक्कर में डालने वाली शक्तियों से ही लोग मोक्ष की उम्मीद कर रहे हैं। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के अठारहवें अध्याय के 66वें श्लोक में साफ कहा है :-

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।      

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। 18:66॥

     सब धर्मों को त्यागकर केवल एक मुझ परमात्मा की शरण को प्राप्त हो। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर। इसके बावजूद संसार के प्राणी उस सनातन सत्ता को छोड़ माया की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। संसार में तामसिक वृत्तियों का एक छत्र साम्राज्य स्थापित हो चुका है।

     भारत में तो यह अन्धकार सर्वाधिक ठोस बनकर जम चुका है। जब आध्यात्मिक गुरु, भौतिक विज्ञान की सच्चाई के विरुद्ध प्रचार करते हैं। तो मुझे भारी दुःख होता है। ऐसे ढोंगी लोग अपना जीवन तो बिगाड़ ही रहे हैं, भोलेभाले लोगों को धर्म की आड़ में भारी संकट में डालकर, भारी पाप के भागी बन रहे हैं।

     ऐसी स्थिति में अगर भारत के हिन्दू कितना ही प्रयास करें, संसार के लोगों को प्रभावित नहीं कर सकेंगे। भारत में इस समय न धर्म बचा है, न सच्चाई और ईमानदारी बची है और न ही राष्ट्रीयता। जब तक हम इस कटु सत्य को स्वीकार करके, बीमारी का इलाज नहीं खोजेंगे, हमारा कल्याण असम्भव है। तिलक-छापे करने, कपड़े रंगने, तन रंगने से काम चलने वाला नहीं है। यह रोग तो मन रंगने से ही ठीक होगा। क्योंकि यह ही सारा प्रपंच हम से करवा रहा हैं। मीरा बाई ने ठीक ही कहा है “अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया।”

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

सात्विक आराधना का फल कभी नष्ट नहीं होता।

 संसार की हर वस्तु नाशवान है, परन्तु ईश्वर भक्ति का फल कभी भी नष्ट नहीं होता है। वह हर जन्म में निरन्तर बढ़ता ही जाता है। इसके बारे में अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से पूछा :-

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।      

अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति।।6:37॥

     हे कृष्ण ! योग से चलायमान हो गया है मन जिनका, ऐसा शिथिल यत्न वाला श्रद्धायुक्त पुरुष योग सिद्धि को न प्राप्त होकर, किस गति को प्राप्त होता है। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन :-

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।

न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गति तात गच्छति ॥ 6:40॥

     हे पार्थ, उस पुरुष का न तो इस लोक में (और) न परलोक में ही नाश होता है, क्योंकि हे प्यारे कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।

शुचीनां श्रीमता गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥6:41।।

     योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर, बहुत वर्षों तक वास करके, शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।

एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीद्दशम्॥6:42॥

     अथवा ज्ञानवान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। इस प्रकार का जो यह जन्म है, संसार में निःसन्देह अति दुर्लभ है।

तत्र तं बुद्धिसंयोग लभते पौर्वदेहिकम्।

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥6:43॥

     वहाँ उस पहले शरीर में साधन किये हुए बुद्धि के संयोग को अनायास ही प्राप्त हो जाता है, और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभाव से फिर भगवत् प्राप्ति के निमित्त यत्न करता है।

पूर्वाभ्यासेन तेनैव हृियते ह्यवशोऽपि सः।

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्द ब्रह्मातिवर्तते ॥6:44।।

     वह विषयों के वश में हुआ भी उस पहिले के अभ्यास से ही निःसन्देह भगवत् की ओर आकर्षित किया जाता है। समत्वबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल का उल्लंघन कर जाता है।

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्ध किल्बिषः।

अनेकजन्मसद्धिस्ततो याति परां गतिम॥6:45॥

     अनेक जन्मों से अन्तः करण की शुद्धि रूप सिद्धि को प्राप्त हुआ और अति प्रयत्न से अभ्यास करने वाला योगी, संपूर्ण पापों से अच्छी प्रकार शुद्ध होकर, उस साधन के प्रभाव से परम गति को प्राप्त होता है।

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।

कर्मिभ्यश्राधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन। 6:46॥

     योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, और शास्त्र के ज्ञानवालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, सकाम कर्म करने वालों से (भी) योगी श्रेष्ठ है, इसलिये हे अर्जुन (तू) योगी हो।

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान्भजते यो मांस मे युक्ततमो मतः ॥ 6:47॥

     संपूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान् योगी मेरे में लगे हुए, अन्तरात्मा से मेरे को निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।”

     भगवान् ने उपर्युक्त आदेश से यह स्पष्ट कर दिया कि आराधना का फल मोक्ष पर्यन्त नष्ट नहीं होता। एक बार जब यह क्रम प्रारम्भ हो जाता है। तो जन्म दर जन्म इसका स्तर ऊपर उठता ही जायेगा, और इसका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष होगा। कभी-कभी हमें यह देख कर आश्चर्य होता है कि कोई मानव अनायास साधारण स्तर से बहुत ऊपर उठकर ‘आध्यात्मिक शक्ति की प्रत्यक्षानुभूति करने लगता है।

     ऐसी स्थिति में हमें समझ लेना चाहिए कि उसके पाप कर्म पूर्ण रूप से नष्ट हो चुके हैं, और पूर्व जन्म के संचित शुभ कर्मों का कर्मफल मिलना प्रारम्भ हो गया है। ऐसी स्थिति अगर जवानी में ही हो जाय तो निश्चित रूप से यह उसका अन्तिम जन्म होगा। आज्ञा चक्र से ऊपर की यात्रा का प्रारम्भ इसका स्पष्ट संकेत है।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

अध्यात्म विज्ञान और भौतिक विज्ञान

उत्थान-पतन के प्रकृति के अटल सिद्धांत के कारण आज योग-दर्शन लोप प्रायः हो चुका है, जबकि सांख्य-दर्शन ( भौतिक विज्ञान ) ने बहुत अधिक तरक्की कर ली है। ज्यों-ज्यों भौतिक विज्ञान उन्नति करता गया, अध्यात्म विज्ञान स्थिर भी नहीं रह सका बल्कि अधोगमन करने लगा। भौतिक विज्ञान के आचार्यों ने जब अध्यात्म-विज्ञान के आचार्यों से पूछा कि भौतिक विज्ञान ने प्राणियों के लाभ और सुख के लिए अमुक-अमुक कार्य किये, आपके विज्ञान की क्या स्थिति है।

     क्योंकि अध्यात्म जगत् के लोग, उन सकारात्मक जगत् के लोगों को उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे, अतः उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए एक काल्पनिक लक्ष्मण रेखा से विश्व को दो भागों में विभक्त कर दिया। स्वयं को आस्तिक घोषित कर दिया, और भौतिक विज्ञान के सच्चे लोगों को नास्तिक की संज्ञा देकर अपनी झेप मिटाने का असफल प्रयास करने लगे।

     होना तो यह चाहिए था कि अपनी कमजोरी को खुले दिलदिमाग से स्वीकार करके शौध कार्य में लग जाते, परन्तु कलियुग के गुण-धर्म ने ऐसा नहीं करने दिया। उन्होंने परमात्मा को पेट में डाल लिया तभी तो स्वामी श्री विवेकानन्द जी ने अमेरिका से अपने एक पत्र में लिखा था।तुम लोगों में किसी प्रकार की धार्मिक भावना नहीं है। रसोई ही तुम्हारा ईश्वर है तथा हण्डिया-बर्तन हैं, तुम्हारा धर्म शास्त्र, अपनी तरह की असंख्य सन्तानोत्पादन में, तुम्हारी शक्ति का परिचय मिलता हैं।

     (द कम्पलीट वर्कस ऑफ स्वामी विवेकानन्द-वॉल्युम.5)

     एक बार मनुष्य झूठ बोल देता है तो उसे छिपाने के लिए झूठ पर झूठ बोलता ही चला जाता है। इस प्रकार वह मात्र झूठ के अम्बार ही लगाता है। योगदर्शन मात्र वेदान्त दर्शन की देन है।

     करीब सौ साल पहले, स्वामी जी का लिखा पत्र, हमारे धर्म का जो चित्र प्रस्तुत करता है। वह बहुत ही निराशाजनक है। हमें इसे स्वीकार करना पड़ेगा कि कलियुग के गुणधर्म के कारण आज हम उस स्थिति से कुछ नीचे ही गिरे हैं। हम योग का जो ढोल पीट रहे हैं, उसका उस योग से कोई संबंध नहीं जो वेदरूपी कल्पतरू का अमर फल है। हमारे योगियों ने जिस योग की महिमा की है। वह मानव के त्रिविध ताप-आधिदैहिक, आधिभौतिक और आधिदैविक का शमन (नाश ) करने के साथ-साथ कैवल्यपद अर्थात् मोक्ष देता है। इस समय हम शारीरिक कसरत को ही योग कह रहे हैं।

     पातंजलि योग दर्शन में जिस क्रियात्मक ढंग से त्रिविध तापों का शमन करते हुए, सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान की पूर्ण जानकारी प्राप्त करते हुए, कैवल्य पद प्राप्त करने का वर्णन हैं वही वेद रूपी कल्पतरू का अमर फल अर्थात सिद्ध योग (पूर्ण योग)। महर्षि श्री अरविन्द ने इसी योग का वर्णन करते हुए, कहा है- “भारत, जीवन के सामने योग का आदर्श रखने के लिए उठ रहा है। वह योग के द्वारा ही सच्ची स्वाधीनता, एकता और महानता प्राप्त करेगा और योग के द्वारा ही उसका रक्षण करेगा।”

     इसी संदर्भ में महर्षि ने कहा है -एशिया जगत् हृदय की शांति का रखवाला है। यूरोप की पैदा की हुई बीमारियों को ठीक करने वाला है। यूरोप ने भौतिक-विज्ञान नियन्त्रित-राजनीति, उद्योग, व्यापार आदि में बहुत प्रगति कर ली है। अब भारत का काम शुरू होता है। उसे इन सब चीजों को आध्यात्मिक सत्ता के अधीन करके धरती पर स्वर्ग बसाना है।

     आज धार्मिक दृष्टि से विश्व की वस्तुस्थिति यह है कि सम्पूर्ण युवा वर्ग का धर्म पर से विश्वास प्रायः समाप्त हो चुका है। क्योंकि विज्ञान एक सच्चाई है। वह प्रत्यक्ष परिणाम देता है। अतः सभी लोग उसको सत्य मान रहे हैं। दूसरी तरफ जब धर्माचार्यों ने हठधर्मी रूख अपनाया तो विश्व भर के युवा लोगों ने इनके खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। आज ईश्वर एक कल्पना का विषय है। पश्चिमी जगत् में सेवारत एक डॉक्टर ने बात-चीत के दौरान मुझे बताया कि पश्चिम का युवा-वर्ग, ईश्वर में बिल्कुल ही विश्वास नहीं रखता है। उन्होंने कहा कि मेरा छोटा पुत्र ऑक्सफॉर्ड में पढ़ा रहा है, उसकी मान्यता है कि कमजोर, डरपोक और बुजदिल लोग ही ईश्वर नाम की काल्पनिक शक्ति का सहारा लेने का असफल प्रयास करते हैं।

     ऐसी स्थिति में मात्र कब्र में पाँव लटके हुए लोग धर्म की रक्षा कितने दिन और कैसे करेंगे ? ऐसा लगता है कि संसार के लोग पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का डर दिखाकर जो धर्म चला रहे हैं, वह आखिरी सांसे गिन रहा है। ईश्वर के नाम से भय तो दूर भागता है और स्वर्ग-नरक रूपी बन्धनों से बाँधकर, भय से भगवान् की प्रत्यक्षानुभूति करवाई जा रही है।

     बिल्कुल उल्टी गंगा बहाई जा रही है। आज विश्व के सभी सकारात्मक लोगों को, पूर्वाग्रहों को त्याग कर, जाति, धर्म और देशों की संकीर्ण भावनाओं का त्याग करके, सोचने की जरूरत है कि मानव धर्म कैसे बचें ? विश्व शांति का मात्र यही उपाय शेष बचा है।

     महर्षि श्री अरविन्द के अनुसार पश्चिम के लोग जो कुछ कर सकते थे, वे कर चुके हैं। इसके आगे का काम करने की उनमें सामर्थ्य है ही नहीं। जिन यंत्रों को वह परमसत्ता, संसार को दे चुकी है, उनकी पकड़ में वह नहीं आयेगी। वे लोग मानवीय बुद्धि से उन यंत्रों द्वारा जो परीक्षण कर रहे हैं, वह पूर्णरूप से संदिग्ध है। यह कार्य तो हमारे ऋषियों द्वारा बताये हुए तरीके से ही होगा। मात्र सुषुम्ना के रास्ते से ही उस चक्रव्यूह का भेदन संभव है, जहाँ से वह परमसत्ता विश्व का संचालन कर रही है। कुछ माह पूर्व बी.बी.सी.ने लगातार तीन बुद्धवार को चेतन-अवचेतन पर वैज्ञानिक व्याख्या प्रसारित की थी। मैंने उसे सुना था। उसके अनुसार पातंजलि दर्शन में उस परमसत्ता का वर्णन करते हुए सहस्रार में उसके स्थित होने की बात कही गई हैं। उसे आज विज्ञान पूर्ण सत्य मानता है।

     उस चक्रव्यूह के अन्दर घुसने की विधि तो मात्र हमारा योग दर्शन ही बताता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए विश्व को, भारत को धर्म-गुरु स्वीकार करना ही पड़ेगा। भौतिक ज्ञान की कीमत भौतिक धन है। अध्यात्म ज्ञान को भौतिक धन से नहीं खरीदा जा सकता और न ही कभी बेचा जा सकेगा। उसके लिए तो आध्यात्मिक संत के सामने पूर्ण समर्पण करना पड़ेगा। तथा तन,मन,धन से निष्कपट भाव से उसकी सेवा करनी पड़ेगी।

     उस परम आत्मा सद्गुरु देव के दिल से प्रसन्न होने पर ही यह ज्ञान मिलता है अन्यथा नहीं। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के 34वें श्लोक में कहा है।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥:34॥

     इसलिए तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी पुरूषों से भली प्रकार दण्डवत प्रणाम सेवा (और ) निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को जानकर वे मर्म को जानने वाली ज्ञानी जन ( तुझे उस) ज्ञान का उपदेश करेंगे। इस संबंध में कबीर जी ने कहा हैं।

     गुरु मिलि ताके खुले कपाट, बहुरि न आवे योनी बाट। (कबीर ग्रंथावली-पृष्ठ 283) “मनुष्य योनि ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।” मनुष्य योनि में ईश्वर के तद्रूप बना जा सकता है। इस संबंध में श्री कृष्ण ने गीता के 13वें अध्याय के 22वें श्लोक में कहा हैं।

उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरूषः परः ।।13:22॥

     वास्तव में तो यह पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ( त्रिगुणातीत ) ही हैं (केवल साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता (एवं ) सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीवनरूप से भोक्ता (तथा ) ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्द घन होने से ‘परमात्मा’ ऐसा कहा गया हैं।)

     पांतजलि योगदर्शन में साधनपाद के 21वें श्लोक में योग के आठ अंगों यथा-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का वर्णन हैं। बौद्धिक प्रयास से इस युग में उनका पालन करना असम्भव है। इसीलिए इतने महत्त्वपूर्ण दर्शन के बारे में नगण्य लोगों को ही जानकारी है। परन्तु गुरु-शिष्य परम्परा में शक्तिपात दीक्षा से कुण्डलिनी जाग्रत करने का सिद्धान्त है। सिद्धगुरु साधक की शक्ति (कुण्डलिनी) को चेतन करते हैं। वह जाग्रत कण्डलिनी साधक को उपर्यक्त अष्टांगयोग की सभी साधना स्वयं अपने अधीन करवाती है। इस प्रकार जो योग होता है उसे सिद्धयोग अर्थात महायोग कहते हैं। यह एक अखंड मार्ग है। जाग्रत कुण्डलिनी पर गुरु का पूर्ण प्रभुत्व होता है, जिससे वह उसके वेग को अनुशासित और नियंत्रित करते हैं। शक्तिपात दीक्षा के बाद साधक के प्रारब्ध कर्मों के अनुसार शक्ति का विविध रीति से प्रकटीकरण होता हैं।

     किसी साधक को शक्तिपात होते ही विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाए जैसे आसन् बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम आदि स्वतः होने लगती हैं। किसी को ज्योति दर्शन, नाद, दिव्यगन्ध, रस-स्पर्श-रूप का अनुभव होता है। किसी साधक को सुषुम्ना नाड़ी में चक्रों और ग्रंथियों के वेधन का अनुभव होता है।

     मेरे संत सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाई नाथ जी योगी की अहैतु की कृपा के कारण मुझे अनायास ही शक्तिपात की सामर्थ्य प्राप्त हो गई। मेरे शिष्यों में सैकड़ों (स्त्री-पुरूष ) साधकों को उपर्युक्त सभी यौगिक क्रियाएँ जैसे आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम स्वतः होने लगती हैं। साधक न तो उसे रोकने की क्षमता रखता है, और न करने की। वह तो मात्र गुरु द्वारा प्राप्त मंत्र का मानसिक जप करता, आज्ञाचक पर गुरु के स्वरूप का ध्यान करते हुए, आँख बंद किये, सहज आसन में बैठा रहता है। सभी प्रकार की यौगिक क्रियाएँ, वह चेतनशक्ति (कुण्डलिनी ) सीधा अपने अधीन स्वयं करवाती है। वह शक्ति साधक का शरीर, प्राण, मन एवं बुद्धि अपने अधीन कर लेती है। साधक की आँखें बंद रहती है। परन्तु आंतरिक चक्षु खुल जाते हैं। जिससे साधक को 72 हजार नाड़ियों सहित कुण्डलिनी छह चक्र और तीनों ग्रंथियाँ स्पष्ट दिखती हैं। सभी अंगों की आंतरिक क्रियाएँ साधक को स्पष्ट दिखाई देती हैं। कौन से अंग में किस प्रकार क्रियाएँ हो रही हैं, ध्यान की अवस्था में उसे स्पष्ट दिखती हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पिण्ड में है। योग दर्शन के इस सिद्धांत के अनुसार पूर्ण ज्ञान, इस साधना से होता है। यह योग संसार की असंख्य समस्याओं का सामाधान करने में भौतिक-विज्ञान को सक्षम बनाएगा।

     भारतीय योगदर्शन मनुष्य को विकास के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने के साथ-साथ मोक्ष भी देता है। यह योग मनुष्य को सभी प्रकार के रोगों से पूर्ण रूप से मुक्त करता है। रोगों से मुक्त हुए बिना शांति नहीं, और पूर्ण शांति के बिना मोक्ष असम्भव है। कुण्डलिनी के जाग्रत होते ही साधक को इन्द्रियातीत दिव्य अक्षय आनन्द की निरन्तर प्रत्यक्षानुभूति होती है। जिससे साधक का मानसिक तनाव पूर्ण रूप से शांत हो जाता है तथा उसके कारण उत्पन्न कई असाध्य रोग जैसे उन्माद, पागलपन, रक्तचाप, अनिद्रा आदि अनेक बीमारियाँ बिना दवा के चन्द दिनों में स्वतः ही ठीक हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त सभी शारीरिक रोग विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ करवाकर वह जगत् जननी( कुण्डलिनी) पूर्णरूप से ठीक कर देती है। उस आंतरिक चेतना शक्ति के ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। ज्ञान की तो उसमें “पराकाष्ठा” है। अतःउसके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं है। दिव्य आनन्द के निरन्तर बने रहने के कारण, सभी प्रकार के नशों से पूर्णरूप से मुक्ति मिल जाती है। मेरे कई साधक अफीम, शराब, भांग, गांजा आदि नशों से बुरी तरह से ग्रसित थे। दीक्षा के बाद चन्द दिनों में ही उन्हें बिना किसी प्रकार के कष्ट के, सभी नशों से पूर्ण मुक्ति मिल गई। ऐसे अनेक मनोरोगी शक्तिपात के कारण पूर्णरूप से ठीक हो गये, जिन्हें विद्युत चिकित्सा और इन्सुलीन चिकित्सा से भी लाभ नहीं हुआ था। आज सभी बिना दवा खाये पूर्णरूप से स्वस्थ हैं, और ईश्वर का भजन करके सात्विक जीवन जी रहे हैं।

     इस प्रकार सभी प्रकार के मनोरोगों, शारीरिक रोगों और सभी प्रकार के नशों से, बिना किसी प्रकार का कष्ट पाये और बिना दवा के, पूर्ण रूप से मुक्ति पाने का, हमारे अध्यात्म विज्ञान में ठोस आधार है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। उपर्युक्त सभी लाभ किसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से नहीं, अध्यात्म विज्ञान के ठोस सिद्धांतों से मिलते हैं। पातंजलि योगदर्शन के कैवल्यवाद के दूसरे श्लोक में ऋषि ने जाति (वृत्ति ) बदलने का विवरण देते हुए कहा है कि इसके बिना कार्य सिद्धि संभव नहीं है। वह किस प्रकार होता है, उस सम्बन्ध में ऋषि कहता है- ‘जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्’ (यह) एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना रूप जात्यन्तर परिणाम (एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना ) प्रकृति के पूर्ण होने से होता है। ऋषि के अनुसार मनुष्य मात्र तीन जाति के होते हैं। ‘सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी। औषधि, मंत्र दीक्षा आदि निमित्त कारण प्रकृतियों (वृत्तियों) की पूर्णता कैसे कर देते हैं; क्या वे प्रकृतियों (वृतियों) के प्रयोजक (चलाने वाले ) हैं? इस संबंध में ऋषि ने कहा है।

‘निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्’ ॥४:३॥

     ‘निमित्त प्रकृतियों (वृत्तियों) को चलाने वाले नहीं है, उससे तो (केवल) किसान की भांति, रुकावट का छेदन किया जाता है। अतः संत सदगुरु देव की शक्तिपात दीक्षा के कारण प्रथम तामसिक वृत्तियाँ दबकर कमजोर पड़ जाती हैं। बाकी दोनों वृतियाँ प्राकृतिक रूप से, स्वतंत्र होने के कारण, क्रमिक रूप से विकसित होती जाती हैं। चन्द दिनों में प्रकृति उन्हें इतनी शक्तिशाली बना देती हैं कि फिर वे तामसिक वृत्तियों की शरीर में प्रधानता कभी स्थापित नहीं होने देती हैं। इसी प्रकार फिर रजोगुणी वृत्ति दब जाती है। मनुष्य क्रमिक बदलाव की अर्थात् जाति बदलने की प्रकिया से, तमोगुणी से रजोगुणी और फिर रजोगुणी से सतोगुणी जाति में बदल जाता है। शक्तिपात-दीक्षा में उपर्युक्त कार्य कुण्डलिनी शक्ति (जगत् जननी ) स्वयं अपने नियन्त्रण में करवाती है, अतः। साधक में परिवर्तन बहुत ही त्वरित गति से होता है। क्योंकि वह जगत् जननी (पृथ्वी तत्त्व) उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है, “सृष्ट्युत्पति’’ का आदि कारण है। इसलिए वह सर्वज्ञ, सर्वस्व, और सर्वत्र हैं, उसके लिए कोई कार्य कठिन नहीं है। ज्यों-ज्यों मनुष्य की जाति बदलती जाती है, उस वृत्ति के सभी गुणधर्म खत्म हो जाते हैं। जो दब चुकी है। अतः मनुष्य के खानपान, रहन-सहन, व्यवहार और आचरण आदि सभी बदल जाते हैं क्योंकि वृत्ति बदल जाती है, इसलिए उस वृत्ति के खानपान (सभी प्रकार के नशों से तथा पदार्थो) से मनुष्य को आंतरिक भाव से घृणा हो जाती है।

      अतः किसी प्रकार के कष्ट के बिना ही सभी प्रकार की बुरी आदतें स्वतः छूट जाती हैं। स्वामी श्री विवेकानन्द जी के शब्दों में मनुष्य उन वस्तुओं को नहीं छोड़ता है, वे वस्तुए उसे छोड़कर चली जाती हैं। इस संबंध में स्वामी जी ने अमेरिका में कहा था।- “You need not to give up the things, the things will give you up” इस संबंध में भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के १४वें अध्याय में इस संबंध में कहा है

सत्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति संभवाः ।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥१४:५॥

     ‘हे अर्जुन ! सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण ऐसे (यह ) प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण (इस) अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। इसके बाद में भगवान् तीनों गुणों की अलग-अलग व्याख्या करते हुए कहते हैं –

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाश कमनामयम्।।

सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ।१४:६॥

     ‘हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में प्रकाश करने वाला निर्विकार सत्त्वगुण (तो) निर्मल होने के कारण सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।’

रजो रागात्मक विद्धि तृष्णासंग समुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥१४:७॥

     ‘हे अर्जुन ! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान, (इस ) जीवात्मा को कर्मों की और उनके फल की आसक्ति से बाँधता है।’

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत14:8॥

     ‘और हे अर्जुन ! सर्व देहाभिमानियों के मोहने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है।’

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।

ज्ञानमावृत्य तु तमःप्रसादे संजयत्युत ॥१४:९॥

     ‘हे अर्जुन ! सत्वगुण सुख में लगाता है (और) रजोगुण कर्म में ( तथा ) तमोगुण तो ज्ञान को आच्छादन करके (ढक के) प्रमाद में भी लगाता है।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत।

रजः सत्त्वं तमयश्चैव तमः सत्वं रजस्तथा।।१४:१०।

     ‘और हे अर्जुन ! रजोगुण (और) तमोगुण को दबाकर सत्वगुण बढ़ता है, तथा रजोगुण (और) सत्वगुण को दबाकर तमोगुण (बढ़ता है )

     उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि समर्थ संत सद्गुरु, शक्तिपात दीक्षा द्वारा साधक की कुण्डलिनी जाग्रत करके जात्यान्तरण करने में अर्थात् एक वृत्ति को दबाकर साधक को दूसरी वृत्ति में बदलने में सक्षम होता हैं। क्योंकि सभी शास्त्रों तथा संतों ने गुरु को निर्गुण निराकारं का सगुण साकार स्वरूप माना है, (अर्थात् वह परम तत्त्व, जन्म-मरण से मुक्त, गुरु के माध्यम से अपनी सम्पूर्ण शक्ति प्रकट करता है) तभी गुरु की व्याख्या करते हुए हमारे शास्त्रों स्पष्ट शब्दों में कहते हैं

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः । गुरुगीता ३२॥

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत॥

तदोत्तमविदां लोकानमलान्य तिपद्यते॥१४:१४॥

     ‘जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के मलरहित लोकों को प्राप्त होता है।’

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१४:१५॥

     रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है, तथा तमोगुणों के बढने पर मरा हुआ पुरूष मुढ़योनियों में उत्पन्न होता है।’

नान्यं गुणेभ्यःकर्तारं? यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मभावं सोऽधिगच्छति १४:१९॥

      ( हे अर्जुन ) ‘जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानन्दघन स्वरूप मुझे परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस काल में वह पुरूष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।’

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि गुरु अपने शिष्य को अपनी जाति (चौथी-त्रिगुणातीत जाति ) में बदलने में पूर्णरूप से समर्थ होता है, क्योंकि वह निर्गुण निराकार का सगुण-साकार स्वरूप होता है। इसीलिए हमारे संतों ने स्पष्ट कहा हैं

गुरु करता गुरु कर जोगु। गुरु परमेसुर है भी होगु॥

कहु नानक प्रभिइहै जनाई। बिन गुरु मुकति नपाइ भाई । महला ५, शब्द ३:७॥

तीन लोक नौ खड में, गुरुते बड़ा न कोड़।

करता करै न कर सके, गुरु करै सो होइ॥  

     संत कबीर साखी संग्रह

     अतः गुरु; शिष्य को गीता के १३वें अध्याय के २२वें श्लोक में वर्णित स्वरूप के “तदूप” बना देता है।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

आध्यात्मिक जीवन का मतलब भौतिक संसार से विरक्ति नहीं

इस युग में आध्यात्मिक जीवन की व्याख्या बड़े विचित्र ढंग से की गई है। इन मन घड़न्त और कृत्रिम जीवन मान्यताओं के कारण ही इस युग का मानव अध्यात्मवाद को निरर्थक और कोरा ढोंग मानता है। यही कारण है कि इस युग में धर्म का अधिक हास हुआ है। किसी भी कार्य के करने से उसका ठोस परिणाम निकलना चाहिए। परन्तु इस युग में आराधना का जो निर्जीव स्वरूप बचा है, वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी रूप में कोई परिणाम नहीं देता है। हमें केवल काल्पनिक रूप से कोरा विश्वास करने की आज्ञा दी जाती है।

     हमारे सभी संतों ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि ‘धर्म’ प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार का विषय है। केवल विश्वास का नाम धर्म नहीं है। जीवन के हर कार्य में ईश्वरीय शक्ति काम करती है। ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसमें ईश्वरीय शक्ति काम न करती हो। धर्म का संबंध बाहरी प्रदर्शनों से बिलकुल नहीं है। कोरे कर्मकाण्ड, शब्द जाल और तर्क शास्त्र से उस परम सत्ता से कभी भी साक्षात्कार संभव नहीं। इस युग में निर्जीव वस्तुओं से सजीव प्राणी को उस परम चेतन सत्ता से जोड़ने का निरर्थक प्रयास करवाया जा रहा है। त्याग, वैराग्य, तप, दान, धर्म, ज्ञान, पाप, पुण्य आदि के काल्पनिक चित्र दिखाकर मानव को गुमराह और भ्रमित करने के अलावा आज कुछ भी नहीं हो रहा है। ऐसी स्थिति में मानव का धर्म से विद्रोही होना न्याय संगत है। इस युग का मानव अब अंधेरे में भटकने को तैयार नहीं हैं।

     भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में जो उपदेश दिया और उससे अर्जुन को जो ज्ञान मिला, वही सच्चा ज्ञान है। अर्जुन ने उपदेश के बाद जो कार्य किया जो रास्ता अपनाया, वही सही मार्ग है। भौतिक विज्ञान, आध्यात्मिक शक्ति की देन है। अतः विज्ञान और अध्यात्म में भेद करना भूल है। जिस समय आध्यात्मिक शक्ति का सही ज्ञान भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को हो जाएगा, तत्काल समस्या का समाधान हो जाएगा। जब वैज्ञानिकों को उस परमसत्ता की शक्ति का ज्ञान हो जाएगा तो उनका भ्रम खत्म हो जाएगा। जब इस प्रकार भौतिक विज्ञान, अध्यात्म विज्ञान के अधीन कार्य करने लगेगा, पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आएगा।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

भारत की स्थिति

आज भारत में जितनी तामसिकता है, उतनी किसी युग में नहीं रही। आज देश में जितना अविश्वास है, उतना पहले कभी नहीं रहा। आज देश का हर व्यक्ति एक-दूसरे को ठगने का प्रयास कर रहा है।

     कोई समझ नहीं पा रहा है, देश किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। ईश्वर पर सही अर्थों में किसी का विश्वास रहा ही नहीं। हर व्यक्ति भविष्य के बारे में सर्वाधिक चिन्तित है। सभी लोग लोभ, लालच के वशीभूत होकर येनकेन प्रकारेण धन संग्रह में लगे हैं। ऐसे लोगों की संख्या देश में बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। देश का आधे से ज्यादा धन, इस वृत्ति के लोगों के पास अनधिकृत रूप से काले धन के रूप में जमा किया हुआ पड़ा है। एक तरफ लोगों को खाने-पीने की मूलभूत जरूरत पूरी करने के लिए धन नहीं मिल रहा है, दूसरी तरफ खर्च करने को कोई जगह नहीं है। जब तक सरकार में बैठे लोग धार्मिक और चरित्रवान् नहीं होंगे, देश का उत्थान असंभव है।

     मैं देख रहा हूँ, ऐसी वृत्ति के लोगों का पतन प्रारम्भ हो चुका है, सबसे खुशी की बात तो यह है कि इस बार यह कार्य ऊपर से प्रारम्भ हुआ है, अतः नीचे तक फैलने में अधिक देर नहीं लगेगी। किसी हद तक यह परिवर्तन नीचे तक पहुँच चुका है, यह बहुत ही शुभ लक्षण है।

गुरु का पद ईश्वर से भी महान्

     वैदिक धर्म अर्थात् हिन्दू-धर्म में ‘गुरु का पद’, ईश्वर से भी महान् माना गया है। इस संबंध में गुरुगीता में कहा हैः

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुरेव साक्षात् परब्रह्म तस्मैः श्रीगुरवे नमः॥

     मैं नाथमत का अनुयाई हूँ। मेरे मुक्तिदाता परमश्रद्धेय सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाईनाथ जी योगी आईपंथी नाथ थे। कलियुग में नाथ मत के आदिगुरु योगेन्द्र श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी महाराज माने गए हैं। मैं उन्हीं के आदेश से पश्चिमी जगत् में ज्ञानक्रान्ति का नेतृत्व करूंगा।

     भारत, इस समय घोर तामसिकता में डूबा हुआ है। भारत के उत्थान के लिए सर्व प्रथम “रजोगुण” के विकास की आवश्यकता है। व्यावहारिक भाषा में भारतीयों की प्रथम आवश्यकता ‘रोटी’ की है, ‘राम’ का स्थान द्वितीय स्थान पर है।

     पश्चिमी जगत्, भौतिक सुविधाएँ भोगते-भोगते बहुत ही दुःखी हो चुका है। आज जितना अशांत ‘पश्चिमी जगत’ है, उतना अशांत संसार का कोई देश नहीं। आज उन्हें मात्र शांति की ही भूखा बाकी बची है। और शांति केवल राम अर्थात् ईश्वर तत्त्व ही दे सकता है। क्योंकि यह काम केवल वैदिक-धर्म अर्थात हिन्द-धर्म के मलभत सिद्धान्तों के अनुसार जीवन जीने से ही संभव है। अतः मुझे कलियुग के आदिगुरु से आदेश मिला है कि मेरा कार्य विशेष रूप से पश्चिमी जगत् को चेतन करने का है। उसी आदेश के कारण अब मैं प्राथमिक रूप से पश्चिमी जगत् में कार्य करना चाहता हूँ।

      21वीं सदी, मानव जाति के पूर्ण विकास का समय है, और पूर्ण विकास की क्रियात्मक विधि केवल भारत ही जानता है। अतः अब भारत का कार्य प्रारम्भ होता है।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

"धन-शक्ति"

“सारा धन भगवान् का है। वह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके मालिक नहीं न्यासी या ट्रस्टी है। आज वह उन लोगों के पास है, कल कहीं और हो सकता हैं। सब कुछ उस पर निर्भर है कि जब तक धन उसके पास है, वे अपनी धरोहर को किस प्रकार रखते हैं, उसका किस भाव से, किस चेतना से, किस उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं। किसी को उसके धन के कारण ऊँचा न समझो, और न उसके आडम्बर, शक्ति या प्रभाव का अपने ऊपर असर होने दो।”

     महर्षि श्री अरविन्द ने धन की शक्ति के विषय में लिखा हैं-‘धन एक वैभव-शक्ति का प्रत्यक्ष ‘चिह्न’ है। यह शक्ति धरती पर प्रकट होकर ‘प्राण’और ‘जड़’ पर कार्य करती है और ‘बाहरी जीवन’ की पूर्णता के लिए यह अनिवार्य है। अपने मूल और वास्तविक कर्म की दृष्टि से यह ‘भगवान्’ की शक्ति है। परन्तु भगवान् की अन्य शक्तियों की भांति यह शक्ति भी यहाँ औरों को सौंप दी गई है, और निम्नतर प्रकृति के अज्ञान में इसका अपहरण ‘अहंकार’ के उपयोग के लिए हो सकता है या आसुरी प्रभावों की पकड़ में आकर “उनके” उद्देश्यों के लिए विकृत की जा सकती है।

     वास्तव में यह उन तीन शक्तियों-सत्ता, धन, काम-वासना में से एक है, जिनके लिए मानव अहंकार और असुरों का सबसे अधिक आकर्षण होता है और जिन लोगों के पास ये हैं, वे अधिकतर इनके अनधिकारी हैं और इनका दुरुपयोग ही करते हैं।

     धन को खोजने वाले या रखने वाले उसके स्वामी नहीं, दास ही होते हैं। बहुत कम ही लोग उस विकृतिकारक प्रभाव से पूरी तरह बच पाते हैं, जिनकी छाप लम्बे समय से असुरों के हाथों में रहने और उनके द्वारा इसका दुरुपयोग होने से इस पर लग गई है। इसी कारण अधिकांश आध्यात्मिक साधनामार्ग, आत्मसंयम और अनासक्ति पर तथा धन के सारे बन्धनों और उसे पाने की सारी व्यक्तिगत और अंहकार युक्त अभिलाषा के त्याग पर बल देते हैं। यहाँ तक कि कुछ तो धन और वैभव पर प्रतिबन्ध लगा देते हैं और जीवन की दरिद्रता तथा रिक्तता को ही एकमात्र आध्यात्मिक अवस्था घोषित कर देते हैं।

     किन्तु यह एक भूल है, जो शक्ति को विरोधी सत्ताओं के हाथों में छोड़ देते हैं। यह भगवान् की है और भगवान् के लिए पुनः जीतना और भागवत जीवन के लिए, भागवत भाव से उसका उपयोग करना है, यही साधक के लिए “अतिमानसिक मार्ग” है। सारा धन भगवान् का है।

     वह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके मालिक नहीं न्यासी या ट्रस्टी है। आज वह उन लोगों के पास है, कल कहीं और हो सकता है। सब कुछ उस पर निर्भर है कि जब तक धन उसके पास है, वे अपनी धरोहर को किस प्रकार रखते हैं, उसका किस भाव से, किस चेतना से, किस उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं। किसी को उसके धन के कारण ऊँचा न समझो, और न उसके आडम्बर, शक्ति या प्रभाव का अपने ऊपर असर होने दो। माँ के लिए जब किसी से माँगो तो यह अनुभव करो कि तुम्हारे द्वारा माँ की उस वस्तु का एक छोटा सा अंशमात्र ही माँ माँग रही है। जो उनकी है और तुम जिस व्यक्ति से माँगते हो, उसकी जाँच उसके उत्तर से होगी।

     यदि तुम धन के दोष से मुक्त हो- लेकिन बिना वैरागियों की सी विरक्ति से तो तुम्हें भगवान् के काम के लिए धन पर अधिकार करने की अधिक क्षमता प्राप्त होगी। मन की समता, माँग का अभाव और जो कुछ तुम्हारे पास है और तुम्हें मिलता है, जो कुछ तुम्हारी उपार्जन शक्ति है, उस सबका भगवती शक्ति के चरणों में और उसी के कार्य में पूरा अर्पण, ये इस मुक्ति के लक्षण हैं।

     धन के संबंध में या उसके उपयोग में किसी प्रकार की चंचलता, अधिकार भावना या अनिच्छा का होना किसी न किसी अपूर्णता या बन्धन का निश्चित चिह्न है।

     चूंकि आजकल धन शक्ति विरोधी शक्तियों के हाथ में है, अतः स्वाभाविक रूप से हमें उनके साथ ‘लड़ना’ पड़ेगा। वे जब कभी देखेंगी कि तुम उन्हें निकाल बाहर करने की कोशिश में हो, वे तुम्हारे प्रयत्नों को असफल करने की कोशिश करेंगी, तुम्हें उनको नीचा दिखाने के लिए उनसे ज्यादा ‘ऊँची शक्ति’ को यहाँ उतारना पड़ेगा।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

धर्म सम्पूर्ण विश्व से लोप प्रायः हो चुका है।

इस समय ‘धर्म, ‘सम्पूर्ण विश्व से लोप हो चुका है। विश्व के सभी धर्मों के धर्माचार्य चीख-चीख कर कह रहे हैं- हमारे धर्म में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। फिर विश्व में जो नरसंहार हो रहा है, उसका संचालन कहाँ से, क्यों और कैसे तथा किसके लिए हो रहा है? आज सम्पूर्ण विश्व में जातियाँ जिन्दा है, धर्म जिन्दा नहीं है।

     हमारे धर्म प्रधान कहे जाने वाले देश में भी जातियाँ अलग-अलग संगठित हो कर ”लट्ठम् शरणम् गच्छामि” हो रही है। क्यों? एक ही नारा दिया जाता है, धर्म रक्षा हेतु तो हर जाति अलग-अगल अस्त्रों का प्रयोग, एक दूसरे के खिलाफ क्यों कर रही हैं? जबकि वे सभी जातियाँ एक ही धर्म के अनुयाई होने का दम्भ भरे रही हैं। लठ्ठ, डंडा, त्रिशूल, तलवार, शंख, मंजीरा, घंटा, चिमटा, मंदिर, मस्जिद आदि। सभी एक धर्म के अनुयाई होने की डींग हांक रहे हैं और यही नहीं सभी जातियाँ एक साथ एक ही नारा लगा रही है- अहिंसापरमोधर्मः।फिर लट्ठम् शरणम् क्यों ?

     गिरिजाघर और मस्जिद में एक ही ईश्वर की आराधना की जा रही है। अंसख्य अलग-अलग गिरिजाघर हैं-एक ही धर्म के अनुयाइयों के।सभी एक दूसरे के विरूद्ध विभिन्न प्रकार घातक, यही नहीं संहारक अस्त्रों का प्रयोग भी कर रहे हैं। कमोवेश ऐसी ही स्थिति विभिन्न मस्जिदों में एक ही खुदा की इबादत करने वालों की हैं।

     फिर आवणिक, रासायनिक एवं जैविक अस्त्रों का एक दूसरे के विरूद्ध प्रयोग किस ‘ईश्वर’ के आदेश एवं आशीर्वाद से कर रहे हैं। ईश्वर तो सबका एक ही है।

     आज सम्पूर्ण विश्व में भौतिक विज्ञान की भाषा में कई प्रकार के भयानक प्राणघातक वायरस सक्रिय हो गए हैं। मध्यपूर्व के वायरस ने 11 सितम्बर को अमेरिका पर जो भीषण प्राणघातक प्रहार किया, उससे विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अपना संतुलन खो बैठा। आघात अचानक इतना गहरा लगा कि सम्पूर्ण अमेरिका मृत्यु भय से काँप उठा। मानव की इस स्थिति को भौतिक विज्ञान ने ‘फोबिया’ रोग की संज्ञा दी है। अभी तक भौतिक विज्ञान के पास इसका कोई उपचार नहीं है।

     अभी-अभी हूणों ने एक ऐसे वायरस का आविष्कार किया है, जो मनुष्यों को दम घोट कर मार देता है, अभी तक उसका भी कोई इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है। यह वायरस अपने जन्म स्थान से पश्चिमोत्तर की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। यह वायरस हवा के रुख के साथ फैलता है। अतः इसका फैलाव और विस्तार मनुष्य के हाथ में न होकर ईश्वर के हाथ में है।

     ये सभी प्रकार के वायरस भारत को भी भयंकर कष्ट दे रहे हैं। यह बात अभी तक ज्ञात नहीं हो सकी है कि भारत ने किस प्रकार के वायरस का आविष्कार किया है। क्योंकि भारत “अहिंसापरमोधर्म” के सिद्धान्त में विश्वास करता है, अतः उसका वायरस अशान्ति नहीं, शांति फैलावेगा। अब हिंसा और अहिंसा का युद्ध होना आरम्भ होने वाला है। परिणाम तो अभी तक भविष्य के गर्भ में छिपा है।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

भारत का भविष्य

भारत सदियों तक गुलाम रहा, इसलिए इस पवित्र भूमि पर अंधकार ठोस बनकर जम गया है। वैदान्तियों को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व के धर्मों के अनुयाइयों का विकास अभी द्वैत भाव तक ही हुआ है। आज भारत में भी द्वैतवादियों का ही बोलबाला है। दर्शन के हिसाब से भारत अद्वैतवाद तक सदियों पहले विकसित हो चुका था। यह सत्य हमारे दार्शनिक ग्रन्थों से पूर्ण सत्य प्रमाणित होता है।

     प्रकृति का एक अटल सिद्वान्त है- उत्थान-पतन। पतन की भी एक सीमा होती है। भारत उस सीमा तक पहुँच चुका है। | इस संबंध में महर्षि श्री अरविन्द ने कहा हैः

     “भारत की नियति का सूर्य उदय हो चुका है। अब प्रवाह ऊपर की ओर है। पतन का काल समाप्त हो गया है। अब प्रभात निकट है, और अगर एक बार प्रकाश अपना दर्शन दे दें तो रात्रि फिर कभी नहीं हो सकती। उषा काल शीघ्र ही पूरा हो जाएगा, और सूर्य क्षितिज पर उदित होगा। भारत की नियति का सूर्य उदित होगा, और समस्त भारत को अपनी ज्योति से भर देगा। और केवल भारत को ही नहीं एशिया और जगत् भर को प्लावित कर देगा। हर घड़ी, हर पल उन्हें दिवस की क्रान्ति और दीप्ति के निकट लाते हैं जिसकी स्वीकृति भगवान् ने दी है।

     पतन का काल समाप्त हो गया है। नया भारत उठ रहा है। सचेतन हो रहा है, और राष्ट्रों की बिरादरी में अपना उचित स्थान लेने की तैयारी कर रहा है।

     महर्षि श्री अरविन्द ने भारत तथा सम्पूर्ण विश्व को अन्तर्दृष्टि से जितना निकट से देखा है, उतना कम ही लोगों ने देखा है। श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है कि “आगामी मानव-जाति दिव्य शरीर धारण करेगी।” इसका स्पष्ट अर्थ है मानव-जाति हमारे अद्वैतवाद के सिद्धान्त के अनुसार क्रमिक विकास के सिद्धान्त के मुताबिक पूर्णता प्राप्त कर लेगी।

     मैंने परिस्थितियों वश सन् 1968 में, सर्दियों में आरम्भ होने वाली नवरात्रि पर्व से, गायत्री मंत्र का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। सवा लाख मंत्रों का जप, हवन कुण्ड में प्रत्येक मंत्र के बाद स्वाहा के साथ आहुति देते हुए किया। 1969 के प्रारम्भ में मुझे गायत्री मंत्र की सिद्धि हो गई।

     मुझमें हुए इस परिवर्तन के कारण ही मेरे माध्यम से मानवता में यह दिव्य परिवर्तन आ रहा है। भविष्य में मानवता में होने वाले इस परिवर्तन को देख कर ही श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है कि आगामी मानव जाति दिव्य शरीर धारण करेगी।”।

     क्योंकि यह विकास सार्वभौम है, अतः सम्पूर्ण विश्व इससे प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकता।

श्री रामकृष्ण परमहंस को कैंसर क्यों?

     एक शिष्य ने श्री अरविन्द से प्रश्न किया- कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस को कैंसर अपने शिष्यों के पाप के कारण हुआ?

       श्री अरविन्द- हाँ यह बात उन्होंने स्वयं कही थी, और उनकी बात ठीक होनी ही चाहिए। तुम्हें पता है, उन्होंने इस बात के पक्ष और विपक्ष में युक्तियाँ दी थी कि गुरु को शिष्यों की बहुत सी चीजें अपने ऊपर लेनी पड़ती है।

      एक प्रसिद्ध योगी ने अपने शिष्य से, जब वह गुरु बनने लगा तब कहा था, “अब तुम अपनी कठिनाइयों के अतिरिक्त औरों की कठिनाइयाँ भी अपने ऊपर ले रहो हो।’

      हाँ, अगर गुरु चाहे तो शिष्यों से अपना संबंध काट सकता है, तब ( गुरु को) ऐसी कोई कठिनाई नहीं आएगी, लेकिन साथ ही उसका मतलब होगा कि काम आगे नहीं बढ़ेगा और साधक अपनी किस्मत पर बिना किसी सहारे के छोड़ दिए जाएँगे।

      

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

शक्ति के अवतरण के खतरों से 'गुरु''रक्षा करता है।

श्री अरविन्द द्वारा मार्च, 1928 में लिखा लेख-”ऊपर से होने वाले अवतरण तथा उसे क्रियान्वित करने की इस प्रक्रिया में सबसे प्रधान बात है, स्वयं अपने ऊपर पूर्ण रूप से निर्भर न करना, बल्कि पथप्रदर्शन पर निर्भर करना और जो कुछ घटित हो उस पर विचार करने, मत देने और निर्णय करने के लिए उन्हें बतलाना (यह कार्य गुरु के साथ आंतरिक पथ प्रदर्शन से किया जा सकता है )। क्योंकि प्रायः ऐसा ही होता है कि ‘अवतरण के कारण निम्नतर प्रकृति की शक्तियाँ जाग्रत और उत्तेजित हो जाती है (क्योंकि उन्हें उनका अधिकार क्षेत्र छिनता नजर आता है) और उसके साथ मिल जाना तथा उसे अपने लिए उपयोगी बनाना चाहती है। प्रायः ही ऐसा होता है कि स्वभावतः अदिव्य कोई शक्ति या कई शक्तियाँ ‘परमेश्वर’ या भगवती माता के रूप में सामने प्रकट होती है और हमारी सत्ता से सेवा और समर्पण की माँग करती है। अगर इन्हें स्वीकार किया जाए तो इसका अत्यन्त सर्वनाशी परिणाम होगा।

     अवश्य ही, यदि साधक केवल ‘भागवत’ क्रिया की अवस्था तक ऊपर उठा हुआ हो और उसी पथ प्रदर्शक के प्रति उसने ‘आत्मदान’ और ‘समर्पण’ किया हो तो सब कार्य आसानी से चल सकता है। साधक का यह आरोहण तथा समस्त अहंकार पूर्ण शक्तियों या अहंकार को अच्छी लगने वाली शक्तियों का त्याग पूरी साधना के भीतर हमारी रक्षा करता है। परन्तु प्रकृति के रास्ते जालों से भरे हैं,

      ‘अहंकार’ के छद्मवेश अंसख्य हैं, अन्धकार की शक्तियों की माया- राक्षसी माया-असाधारण चातुरी से भरी है, हमारी बुद्धि अयोग्य पथ प्रदर्शक है, और प्रायः ही विश्वासघात करती है, प्राणगत कामना सदा हमारे साथ रहकर हमें किसी आकर्षक पुकार का अनुसरण करने का लोभ देती रहती है।

      – समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

Read more

Facebook
Facebook
YouTube
INSTAGRAM
WhatsApp chat