Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

आत्मा की अमरता और शरीर से अलग कर दिव्यता की अनुभूति कराई

       सर्व समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग को शत्-शत् नमन्।

       मेरा नाम जाॅकि पर्वतसिंह है। मैं पहली बार मई-जून 2009 में अपनी पत्नी व भाणेज दिलीप सिंह के साथ चैपासनी स्थित आश्रम में आया और गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग के दर्शन किये। गुरुदेव के कार्यक्रम में शक्तिपात दीक्षा ली और संजीवनी मंत्र जप के साथ 15 मिनट ध्यान किया। उसी दिन मेरी पत्नी व भाणेज दिलीप सिंह का ध्यान लगना शुरु हो गया लेकिन मुझे ध्यान नहीं लगा क्योेंकि मुझमें काफी गुरुर (अहंकार) था। और गुरुदेव अपने प्रवचन में कहते थे कि इस ज्ञान की पहली शर्त है-झुककर माँगना। अहंकार रहित, निष्कपट भाव से माँगना।

       मैं पहले भी आध्यात्मिकता की खोज में बहुत जगह घूम चुका था। 1986 से 1994 तक मैं ओशो आश्रम पूणे,गुरु अयंगर आश्रम पूणे, प्रजापिता ब्रह्मकुमारी माऊण्ट आबू, ओम शान्ति, शांतिकुंज हरिद्वार आदि से जुड़ा हुआ था। खूब कर्मकाण्ड करता था लेकिन जीवन में कोई स्थायी बदलाव और किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक अनुभूति नहीं हुई।

       1994 के बाद फिर किसी से जुड़ने का प्रयास नहीं किया। सन् 2009 में, मैं सद्गुरुदेव सियाग जी से जुड़ा था, तब मैं समझता था कि मैं तो इतने बड़े-बड़े गुरुओं के पास होकर आया हूँ, यहाँ इस मंत्र से मेरा क्या होने वाला है? लेकिन मेरी पत्नी डिप्रेशन की मरीज थी। उसको गुरुदेव के ध्यान से फायदा हुआ। उसको ध्यान के दौरान सब देवी-देवताओं के दर्शन होने लगे व डिप्रेशन से काफी राहत मिली। उसको ध्यान के दौरान जिस अलौकिक आनंद की अनुभूति होती थी, उसकी मैं सपने में भी झलक नहीं पा सका। मुझे ध्यान लगाने पर भी, ध्यान नहीं लगता था।

       सन् 2010 में, मैं जाॅकि दिलीप सिंह(गुरुदेव के शिष्य) के पास दिल्ली में था और मैंने कहा कि मैं ध्यान लगाने बैठता हूँ लेकिन मेरा ध्यान क्यों नहीं लगता?  दिलीपसिंह ने कहा  ‘‘आज  मेरे साथ ध्यान लगाने बैठो’’  फिर मैं और दिलीप सिंह ध्यान लगाने बैठे। गुरुदेव से प्रार्थना की और उस दिन पहली बार मेरा ध्यान लगा व ध्यान में अच्छा अनुभव हुआ व फिर मैंने नियमित ध्यान लगाना शुरु कर दिया। चार-पाँच दिन बाद, मैं बिस्तर पर लेटकर ध्यान कर रहा था। मुझे ध्यान में ही एकदम एहसास हुआ कि मैं हूँ लेकिन कहाँ पर हूँ, पलंग पर नहीं, कुर्सी पर नहीं, बिस्तर पर नहीं, पीठ के बल नहीं, पैरों पर नहीं लेकिन मैं हूँ तो कमरे में ही और मुझे मेरे शरीर का कुछ भी एहसास नहीं हो रहा था। मुझे ऐसा एहसास हुआ कि मैं, अपने शरीर से अलग होकर निर्वात्त में विचरण कर रहा हूँ।

       मुझे यह आभाश हो रहा है कि मैं हूँ लेकिन मेरे हाथ नहीं, पैर नहीं, शरीर नहीं, बस मैं हूँ। फिर मेरे ध्यान की गहराई कम होने लगी और धीरे-धीरे एहसास हुआ कि मैं तो पलंग पर ही लेटा हुआ हूँ। मंत्र जप व ध्यान कर रहा हूँ लेकिन गुरुदेव आपने तो सचमुच मेरी आत्मा को, मेरे शरीर से अलग करके दिखा दिया।

       गुरुदेव शक्तिपात दीक्षा कार्यक्रम में, मंत्र से पहले जो प्रवचन देते थे उसमें बोलते थे कि ‘‘यह शरीर नहीं, आत्मा है आत्मा।’’ आत्मा अजर अमर है। और उस दिन ध्यान में गुरुदेव ने अपनी बात को पूर्णतः सत्य प्रमाणित कर, मुझे प्रत्यक्ष अनुभूति करा दी। गुरुदेव आपके चरणों में मेरा शत्-शत्  नमन।

-जाॅकि पर्वतसिंह
जोधपुर
अंक- दिसम्बर 2018

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