Gurudev Siyag Siddha Yoga (GSSY)

आखिर हमें गुरु की आवश्यकता क्यों?

जब प्राणी संसार में जन्म लेता है तो वह सांसारिक ज्ञान से पूर्ण रूप से अनभिज्ञ होता है। वह सर्वप्रथम अपने माता पिता से भौतिक जगत् का ज्ञान प्राप्त करता है, उसके प्रथम गुरु उसके माता पिता होते हैं। इसके बाद विद्यालय में जाकर भौतिक विद्या का ज्ञान प्राप्त करता है। इसके बाद वह भौतिक जगत् का ज्ञान विद्या गुरु से विद्यालय में प्राप्त करता है। इसके बाद ज्यों ज्यों उसका ज्ञान बढ़ता जाता है, उसे आध्यात्मिक जगत्, अपनी तरफ आकर्षित करने लगता है। वह धीरे धीरे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करता है। इस प्रकार उसे जैसा आध्यात्मिक गुरु मिलता है, उसी स्तर का ज्ञान प्राप्त करके, उस पथ पर चलने लगता है।

 

       देवयोग से अगर रास्ता सही मिल जाता है तो कुछ हद तक अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर लेता है। अगर सीधा रास्ता नहीं मिलता तो परिणामों के अभाव में मनुष्य की आस्था धर्म पर से हट जाती है, वह इसे वर्ग विशेष की जीविका चलाने का व्यापार मात्र मान कर, इस पथ से विमुख हो जाता है। इस प्रकार संसार में ऐसे भ्रमित लोगों का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। इस प्रकार इस व्यवसाय में लगे धर्म गुरु, तुच्छदान माँग कर किसी प्रकार अपना जीवन चलाने को विवश हो जाते हैं।

 

       इस प्रकार के आध्यात्मिक गुरुओं की दशा देखकर संसार के लोगों के दिल में धर्म के प्रति ग्लानी पैदा हो जाती है। जब संसार में यह स्थिति चरम सीमा पर पहुँच जाती है, तब भगवान् को अवतार लेना पड़ता है। यह वही स्थिति होती है, जिसका वर्णन भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय में इन शब्दो में किया है। –

 

यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानीर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।4:7

परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम।।

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4:8॥

       इस समय संसार में धर्म कैसी स्थिति में पहुँच चुका है, इससे आगे का पथ ही बंद हो जाता है। अतः ईश्वर का अवतार होने का यह उपर्युक्त समय है। संसार भर के प्रायः सभी संतों ने उस शक्ति के प्रकट होने के संकेत दे दिये हैं। महर्षि अरविन्द ने तो भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार लेने की निश्चित तिथि की घोषणा कर दी थी।

 

       श्री अरविन्द के अनुसार वह शक्ति अपने क्रमिक विकास के साथ सन् 1993-94 तक संसार के सामने प्रकट होकर अपने तेज से पूरे जगत् को प्रभावित करने लगेगी । इस प्रकार 21 वीं सदी में पूरे संसार में एक मात्र सनातन धर्म की ध्वजा फहरायेगी। जिस व्यक्ति में ईश्वर कृपा से और गुरु के आशीर्वाद से वह आध्यात्मिक प्रकाश प्रकट हो जाता है, ऐसा व्यक्ति सारे संसार को चेतन करने में सक्षम होता है। ईश्वर कभी जन्म नहीं लेता है, ऐसे ही चेतन व्यक्ति के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है।’ इस प्रकार के संत सद्गुरु के प्रकट होने पर संसार का अन्धकार दूर होने में कोई समय नहीं लगता। केवल सजीव और चेतन शक्ति ही संसार का भला कर सकती है। “ईश्वर के धाम का रास्ता मनुष्य शरीर में से होकर ही जाता है।” हमारे सभी संत कह गए है कि जो ब्रह्माण्ड में है, वही पिण्ड (शरीर ) में है। अतः अन्तर्मुखी हुए बिना उस परमसत्ता से सम्पर्क और साक्षात्कार असम्भव है। श्री अरविन्द ने भी कहा है, “हिन्दू धर्म के शास्त्रों में बताई गई विधि से, मैंने अपने अन्दर ही उस पावन पथ पर चलना प्रारम्भ कर दिया है, जिस पर चलकर उस परमसत्ता से साक्षात्कार संभव है।

 

       एक माह के थोड़े समय में ही शास्त्रों में वर्णित उन सभी आध्यात्मिक शक्तियों से साक्षात्कार होने लगा है, जो उस परमसत्ता, तक पहुँचाने में सक्षम सहयोगी हैं। इस प्रकार मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि मैं अपने उद्देश्य में अवश्य सफलता प्राप्त कर सकेंगा। ठीक इसी प्रकार इसी रास्ते से चलकर पूर्ण सत्ता से सम्पर्क और साक्षात्कार किया हुआ चेतन व्यक्ति ही गुरु पद का अधिकारी होता है। ऐसा चेतन संत सद्गुरु ही संसार का कल्याण कर सकता है।

 

       उससे जुड़ने वाले व्यक्ति को उस पथ पर चलकर अपने परम लक्ष्य तक पहुँचने में कोई भी कठिनाई नही होती है। वह पूर्ण शुद्ध चेतन आध्यात्मिक शक्तियों के संरक्षण में अपनी जीवन यात्रा निर्विघ्न पूरी करके अपने परम लक्ष्य तक पहुँचने में सफल होते हैं। हमारे शास्त्रों के अनुसार मनुष्य शरीर में छःचक्र होते हैं। बिना चेतन गुरु के सरंक्षण के, कोई व्यक्ति आध्यात्मिक आराधना प्रारम्भ करता है तो सफलता संदिग्ध होती है, उसे अपनी आराधना मूलाधार से प्रारम्भ करनी होती है। उस स्थान से चलकर छठे चक्र तक पहुँचने में, उसे कई मायावी सिद्धियों से सम्पर्क करना होता है। ये शक्तियाँ इतनी प्रबल होती है कि जीव को अपनी सीमा से बाहर नहीं जाने देती है। अगर किसी प्रकार जीव उठता-पड़ता नाभि चक्र में प्रवेश कर भी जाता है तो उससे पार निकलना असम्भव है।

 

       इस समय सारा संसार इसी चक्र की शक्ति के इशारे पर नाच रहा है। इस क्षेत्र में पतन के सभी साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इस शक्ति के भंवरजाल में फंसकर जीव अन्त-समय में भारी पश्चाताप करता है।

 

       चक्रवर्ती राजगोपालाचार्यजी से पत्रकारों ने अन्त समय में केवल एक ही प्रश्न पूछा था।”आप भारत में सर्वोच्च राजनीति के शिखर तक पहुँचे हुए पहले व्यक्ति है।

 

       आप एक मात्र भारतीय हैं जो वॉयसराय लॉर्ड के पद पर आसीन हुए । अब संसार से विदा होते समय आपको कैसा लग रहा है? राजाजी ने उतर दिया -“मेरे इस अन्तिम समय में, जब मैं, मेरे पूरे जीवन पर नजर डालता हूँ तो मुझे भारी पश्चाताप होता है। मैं देख रहा हूँ, मेरे जीवन की कमाई का एक गन्दा राजनीति का घोंघा मेरे हाथ में है। मुझे इस गंदे घोंघे को लेकर आगे की यात्रा पर जाना पड़ेगा, यह देख कर मुझे भारी वेदना हो रही है। मैंने अमूल्य मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गवां दिया, इसका मुझे भारी पश्चाताप हो रहा है। राजाजी जैसे व्यक्ति की अनुभूति से भी किसी ने सबक नही लिया। संसार भर के सभी धर्माचार्य और तथाकथित अध्यात्मवादी राजनीति की धुरी के, याचक बन कर चक्कर लगा रहे हैं। राजाजी के अनुसार उसी गन्दे घोंघे से मोक्ष प्राप्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। वह गन्दा घोंघा किस स्थान पर रहता है और उसके क्या गुण धर्म है? सर्वविदित है। कहने की आवश्यकता नहीं, ये आध्यात्मिक गुरु संसार को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।

 

       श्री अरविन्द की भविष्यवाणी के अनुसार ”जिस समय राज्य सत्ता, अध्यात्म सत्ता के अधीन हो कर उसके निर्देशानुसार कार्य करने लगेगी, धरा पर स्वर्ग उतर आएगा।” हम देख रहे हैं, इस समय उल्टी गंगा बह रही है। ऐसी स्थिति में संसार का कल्याण असम्भव है। चेतन संत सतगुरु जो कि सभी मायावी शक्तियों को पराजित करके ‘अगम लोक’ की सत्ता से जुड़ चुका होता है, संसार का कल्याण करने में सक्षम होता है। छठे चक्र यानि आज्ञाचक्र तक सारा क्षेत्र माया का क्षेत्र है, इस क्षेत्र को बिना संत सतगुरु की कृपा के, पार करना असम्भव है। संत सतगुरु क्योंकि माया अतीत परम् सीधा सम्पर्क रखते है इस लिए मायावी शक्तियाँ, उनके आगे करबद्ध खड़ी रहती है। इस प्रकार जो जीव ऐसे चेतन संत सतगुरु की शरण में चला जाता है, अनायास स्वतःही मायावी क्षेत्र को पार कर लेता है। इस प्रकार उसकी परम लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा सीधा आज्ञाचक्र को भेद कर प्रारम्भ होती है। गुरु कृपा से ज्यों ही आज्ञाचक्र को भेद कर जीव मायावी शक्तियों से निकल जाता है, उसके पतन के सारे रास्ते अवरूद्ध हो जाते हैं। केवल एक रास्ता परम धाम का खुला रह जाता है, जिस पर चलकर परमसत्ता में लीन होने पर आवागमन से छुटकारा मिल जाता है।

 

       इस प्रकार सनातन धर्म में गुरु पद की जो महिमा गाई गई है, पूर्ण सत्य है। बिना गुरु के आराधना करने पर माया के क्षेत्र की, भौतिक जगत् की सारी सुख सुविधाएँ मिलना सम्भव है, परन्तु मोक्ष सम्भव नहीं है। मोक्ष तो मात्र संत सतगुरु की शरण में जाने से मिलता है। एक बार मायावी शक्तियों के चक्कर में आ जाने के बाद उसका पतन अवश्यंभावी है। इस प्रकार असंख्य जन्मों तक ऊपर उठ उठ कर, गिरता रहता है और फिर मूलाधार से चढ़ाई प्रारम्भ करनी पड़ती है। इस प्रकार उठावा- पटकी का अन्त तब तक नहीं हो सकता, जब तक जीव संत सतगुरु की शरण में नही चला जाता है। ऐसे कृपालु संत सत्गुरु का पद, अगर भक्त ईश्वर से बड़ा मानें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?

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