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 गुरुदेव सियाग सिद्धयोग द्वारा विश्व शांति

 ‘‘विश्व शांति के लिए सभी बहिर्मुखी बौद्धिक प्रयास असफल हो चुके हैं, क्योंकि  शांति अंदर से आती है; शांति का संबंध दिल से है। अतः ‘‘अन्तर्मुखी आराधना’’ द्वारा उस परमसत्ता से जुडे़ बिना, शांति असंभव है।’’

        आज पूरे विश्व में शांति के भरसक प्रयास किये जा रहे हैं। वैज्ञानिक व राजनीतिज्ञ बाहरी प्रयासों व हथियारों से शांति स्थापित करने में लगे हुए हैं। अशांति उतनी ही तेज गति से बढ़ रही है। वर्तमान मानव शांति का प्रयास बाहर ढूँढ़ रहा है जबकि असीम शांति का अकूट भण्डार तो मानव के भीतर है। 

         इस संबंध में ‘‘पवित्र ग्रंथ बाइबल की भविष्यवाणियाँ’’ पुस्तक में सद्गुरुदेव सियाग ने वर्षों पहले लिख दिया है कि यदि मानव संपूर्ण विश्व में शांति चाहता है तो उसे अपने भीतर की गहराइयों में उतरना पडे़गा और उसका पथ है सिद्धयोग में समर्थ सद्गुरुदेव द्वारा बताई गई आराधना। ‘‘जब तक संसार में मनुष्य शरीर-रूपी सुन्दर ग्रंथ को पढ़ने का दिव्य विज्ञान प्रकट नहीं होगा, तब तक विश्व शांति का भाव ‘‘मृगमरीचिका’’ ही बना रहेगा।’’

        संसार में धार्मिक ग्रन्थों की संख्या अन्य ग्रन्थों से अधिक हैं और उनका पठन-पाठन भी सबसे अधिक होता है परन्तु फिर भी सम्पूर्ण विश्व में अशांति का एक छत्र साम्राज्य है। दूसरी तरफ शांति के लिए जितने प्रयास किए जाने चाहिए, भौतिक-विज्ञान के आचार्य कर चुके, तथा पूरी तरह से असफल भी हो चुके हैं। जिन विध्वंसक हथियारों के बनाने में वे असीम धन खर्च कर चुके हैं, प्रायः उतना ही धन अब उनको नष्ट करने में लगेगा। क्या घातक हथियार नष्ट भी किए जा सकेंगे या नहीं, यह प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इनको नष्ट करने में जितना समय और धन लगने का हिसाब लगाया गया है,उससे तो यही तथ्य प्रकट होता है कि ये हथियार जिस कार्य के लिए बनाए गए है, उसी में प्रयोग होंगे। घातक हथियारों द्वारा स्थापित,भय मिश्रित-शांति, सर्वनाश का कारण ही सिद्ध होगी।’’

         धर्म के बारे में एक व्याख्या मुझे पूर्ण सत्य लगती है, वह हैः-

         ‘धर्म का प्रमाण किसी ग्रंथ पर नहीं, मनुष्य की रचना की सत्यता पर निर्भर है। ग्रंथ तो मनुष्य की रचना के बर्हिगमन हैं, बौद्धिक परिणाम हैं, मनुष्य ही इन ग्रंथों के प्रणेता हैं।’ इससे एक बात स्पष्ट होती है कि जब तक संसार में मनुष्य शरीर-रूपी ग्रंथ को पढ़ने का दिव्य विज्ञान प्रकट नहीं होता,शांति पूर्ण रूप से असम्भव है। हम देख रहे हैं, संसार में बौद्धिक प्रयासों द्वारा शांति स्थापित करने के सभी प्रयास असफल हो चुके हैं। वैज्ञानिकों ने जो हथियार मानव की सुरक्षा और शांति  के लिए बनाये थे, उन्हीं से मानव अब अधिक भयभीत हैं। सभी उन्हें अतिशाीघ्र नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं, परन्तु विश्व में परिवर्तन का जो तूफान आरम्भ हो गया है, वह उन्हें क्या ऐसा करने देगा? संसार में धर्म और जाति के नाम पर जो नया ध्रुवीकरण प्रारंभ हो गया है, उसकी गति तेज होती ही जावेगी। यह भी संभव है कि यह संकीर्ण धु्रवीकरण ही विश्व के महाविनाश का मुख्य कारण बन जाए।

        संसार भर के सभी धर्म जब तक ‘‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’’ के वैदिक सिद्धांत को पूर्ण सत्य मानकर उसके अनुसार आचरण प्रारम्भ नहीं करेंगे, तब तक शांति केवल कल्पना का ही विषय रहेगी। सभी धर्मों के धर्माचार्यों की कथनी और करनी में भारी अंतर है। सभी मूलभूत सिद्धातों को मानने का मात्र झूठा स्वांग रच रहे हैं। संसार में मोटे तौर से तीन बल- धनबल, जनबल और मनबल माने गये हैं। इस समय संसार पूर्णरूप से पहले दो बलों (शक्तियों) का ही उपयोग कर रहा है। हम स्पष्ट देख रहे हैं, ‘धनबल’ अपनी सुरक्षा के लिए ‘जनबल’ का उपयोग ढाल (कवच) के रूप  में कर रहा है। इस प्रकार हम देख रहे हैं कि ‘धन’ (माया) का संसार पर एक छत्र साम्राज्य है। इस संबंध में मुझे मेरे एक मित्र की राजस्थानी भाषा की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आ गई। कविता का शीर्षक था

‘‘लिछमी’’
हद हुकम हेकड़ी आ लिछमी मिनखां ने नाच नचावे है;
कोई भूख मरे,कोई मोज करे, कोई नर माटी बण जावे है;
आ-लिछमी बड़ी बावळी-गेली मिनख जींवता खावे है।

आध्यामिक जगत् के लोग, धर्म के नाम पर केवल अतीत के गुणगान मात्र करके इतिश्री कर रहे हैं। जबकि हमारे दर्शन के अनुसार ‘ईश्वर’ प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार का विषय है। ‘मनबल’, जो कि हमारे दर्शन के अनुसार सर्वोत्तम-बल है, संसार से लोप प्रायः हो चुका है। भारत मनबल के सहारे ही अनादिकाल से विश्व द्वारा पूजा जाता रहा है, और पुनः उसी के सहारे ही अपने स्वर्णयुग में प्रवेश करेगा।

        महर्षि श्री अरविन्द ने इस संबंध में कहा है- ‘‘पश्चिम के लोग भौतिक जीवन को उसकी चरम सीमा तक पहुँचा चुके हैं। अब एक ऐसी चीज की जरूरत है, जिसे देना उनके वश की बात नहीं है। क्योंकि यह कार्य आत्मा और अंतःचेतना की अभिवृद्धि द्वारा ही होगा, और इसका प्रारंभ भारत ही करेगा।’’ इसके साथ ही महर्षि ने भारत के भविष्य के बारे मेें स्पष्ट शब्दों में कहा है- ‘‘भारत, जीवन के सामने ‘योग’ का आदर्श रखने के लिए उठ रहा है। वह ‘योग’ के द्वारा ही सच्ची स्वाधीनता, एकता और महानता प्राप्त करेगा और ‘योग’ के द्वारा ही उसका रक्षण करेगा।’’

        पुस्तक लिखने का यह प्रयास मात्र विश्व के जिज्ञासु जनों को सप्रेम आमंत्रित करना हैं। दूसरी पुस्तकों की तरह यह भी उस दिव्यज्ञान की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार नहीं करवा सकेगी। मनुष्य को उस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तो अपने शरीर-रूपी ग्रन्थ को ही पढ़ना पड़े़गा, क्योंकि उसका निवास हमारे शरीर में ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 18वें अध्याय के 61 वें श्लोक में स्पष्ट कहा हैः-

ईश्वरःसर्वभूतानां हृदेशेऽअर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया।।
 

 हे अर्जुन! शरीररूपी यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से भरमाता हुआ, सब भूतप्राणियों के हृदय में स्थित है। ईसाइयों के पवित्र धार्मिक ग्रंथ बाइबल में भी इस संबंध में 2 कुरिन्थियों के 6‘16 में स्पष्ट कहा हैः- ‘‘और मूरतों के साथ परमेश्वर का क्या संबंध? क्योंकि  हम तो जीवते परमेश्वर के मंदिर हैं; जैसा परमेश्वर ने कहा कि मैं उनमें बसूँगा और उनमें चला- फिरा करूँगा; मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।’’

        यीशु मसीह सहित संसार के प्रायः सभी भविष्यद्रष्टाओं ने एक स्वर में यही कहा है कि 20 वीं सदी का आखिरी दशक संसार में अभूतपूर्व क्रांतिकारी परिवर्तन लावेगा। सभी ने एक ही स्वर में भविष्यवाणी की हैं कि 21 वीं सदी में भारत अपने स्वर्णयुग में पुनः प्रवेश कर जावेगा, और धर्म और कर्म के क्षेत्र में सम्पूर्ण विश्व का नेतृत्व करने लगेगा।

        पवित्र धार्मिक ग्रंथ बाइबल  विश्व-व्यापी भीषण नरसंहार की जो घोषणा करता है, विश्व के अविश्वासी नास्तिक उसकी तरफ ध्यान दें या न दें, उसमें कोई अन्तर नहीं आने वाला है। क्या मृत्यु ने कभी किसी को माफ किया है? कालचक्र अनादिकाल से सबको निगलता आया है और निगलता रहेगा। उस निर्दोष पवित्रात्मा यीशु मसीह ने प्राणरक्षा के लिए कैसी करुण पुकार की थी, परन्तु फिर भी क्या वह अपने प्राण बचा सका?

        ‘‘तब उसने कहा, मेरा जी बहुत उदास है, यहाँ तक कि मेरे प्राण निकलता चाहते हैं, तुम ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो। फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर, मुँह के बल गिरा और यह प्रार्थना करने लगा कि हे मेरे पिता! यदि हो सके तो यह कटोरा मुझसे टल जाए तो भी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।’’

        बाइबल अपनी भविष्यवाणियों के संबंध में स्पष्ट कहती है कि ‘‘प्रभु का दिन चोर की नाई(तरह) आवेगा।’’ उन दिनों में कितना भयंकर संकट होगा, उस संबंध में कहा है- ‘‘क्योंकि वे दिन ऐसे क्लेश के होंगे कि सृष्टि के आरम्भ से, जो परमेश्वर से सृजी है, अब तक न तो हुए, और न फिर कभी होंगे। और यदि प्रभु उन दिनों को न घटाता तो कोई भी प्राणी न बचता, परन्तु उन चुने हुओं के कारण, जिनको उसने चुना है, उन दिनों को घटाया हैं।’’ उन दिनों में मानव को कितना भयंकर कष्ट होेगा, उसका अन्दाज बाइबल की निम्नलिखित पंक्तियों से लगाया जा सकता है- ‘‘उन दिनों में मनुष्य मृत्यु को ढूंढेंगे, और न पाएँगे, और मरने की लालसा करेंगे, और मृत्यु उनसे (दूर) भागेगी ।’’

        बाइबल का उपर्युक्त वर्णन कितना दिल दहलाने वाला है, कहने की आवश्यकता ही नहीं। परन्तु इस पवित्र ग्रंथ को मानने वालों की वस्तु-स्थिति को ध्यान से देखा जाए तो ऐसा लगेगा कि अब प्रलय का समय अधिक दूर नहीं है। धार्मिक स्थानों में जो कुछ भी होता है, उस पर कितने सुंदर ढंग से पर्दा डाला गया है- ‘‘ परमेश्वर का परिवार पापियों से मिलकर बना है। यदि आप परमेश्वर के परिवार के लोगों में पूर्ण या लगभग-पूर्ण लोग देखने की अपेक्षा करते हैं तो आपको निराश होना पड़ेगा।’’ यह कलियुग के गुणधर्म के कारण है। प्रायः सम्पूर्ण विश्व की एक जैसी ही स्थिति है। मैं तो इस संबंध में सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि प्रभु विश्व भर के सकारात्मक विचारों वाले मनुष्यों को शीघ्र सद्बुद्धि प्रदान करें क्योंकि नकारात्मक विचारों वाले व्यक्ति न कभी सुधरे हैं, और न कभी सुधरेंगे। रावण,कंस,दुर्योधन आदि अनेक उदाहरण हर युग में मिलेंगे।’’

- समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग