GSSY - Guru Siyag's Siddha Yoga

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साधक के लिए जानने योग्य

गुरू के प्रति पूर्ण निष्ठा धैर्य आवश्यक
आरम्भ करने वाले इस बात को लेकर चिन्त्तित होते हैं कि किस प्रकार प्रयास कर जाप किया जाय लेकिन कुछ दिनों तक ही निष्ठापूर्वक लगातार प्रयास की आवश्यकता होती है। जब कुछ दिनों तक लगातार मंत्र का जाप किया जाता है तो यह स्वतः ही जपा जाने लगता है फिर भी यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी निष्ठा, ईमानदारी और लगन के साथ प्रयास किया गया है। साधक को यह सख्त हिदायत दी जाती है कि यदि उनकी प्रगति धीमी लगे तो भी वह इसे छोड़े नहीं, अन्त्ततः वह इसे प्राप्त कर लेंगे।
जो भी इसमें रूचि रखता है उसके लिये सिद्धयोग का अभ्यास करना बहुत सरल है। योग के बारे में पूर्व जानकारी या अनुभव आवश्यक नहीं है और न ही कोई खास उपकरणों, सहायता अथवा ड्रेस विशेष की आवश्यकता होती है। योग प्रशिक्षक की उपस्थिति भी आवश्यक नहीं होती। किसी रस्मो-रिवाज की भी जरूरत नहीं होती। सिद्धयोग के साधक को अपना धार्मिक विश्वास छोडने या जीवन पद्धति में बदलाव लाने या खानपान में परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती। अच्छा स्वास्थ्य तथा आध्यात्मिक प्रगति के लिये साधक को सिर्फ गुरू सियाग के प्रति पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति की जरूरत होती है।
सिद्धयोग में गुरू सियाग के प्रति पूर्ण विश्वास एवं समर्पण के साथ दीक्षा में दिये गये मंत्र का जाप एवं ध्यान शामिल है। गुरू सियाग एक साधक को जो उनका शिष्य बनना चाहता है “एक मंत्र-एक दिव्य शब्द” देते हैं जिसका चुपचाप मानसिक रूप से जाप करना होता है तथा वह बतलाते हैं कि प्रतिदिन ध्यान कैसे करना है रोजाना ध्यान, मानसिक रूप से मंत्रजाप के साथ होता है। कुछ दिनों तक लगातार मंत्र का जाप करते रहने से “अजपा जाप” बन जाता है। यह सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि जाप कितनी निष्कपटता, विश्वास तथा तीव्रता के साथ किया गया है। कुछ साधकों में यह जाप एक सप्ताह में ही अजपा बन सकता है तथा अन्य में कुछ महीने या अधिक समय भी लग सकता है। शिष्य को मंत्र जाप के साथ-साथ सुबह शाम १५-१५ मिनट के लिये ध्यान भी करना होता है।
 एक दीक्षित व्यक्ति जैसे-जैसे सिद्धयोग के मार्ग पर आगे बढता है वह शीघ्र ही महसूस करता है कि तनाव दूर हुआ है, ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढी है तथा विचार अधिक धनात्मक हुए हैं। ध्यान की अवस्था में बहुत से साधकों को विभिन्न यौगिक मुद्रायें तथा क्रियायें स्वतः होती हैं। साधक इन यौगिक क्रियाओं को न इच्छानुसार कर सकता है न नियंत्रित कर सकता है और न रोक ही सकता है। यह क्रियायें हर साधक के लिये उसके शरीर की आवश्यकतानुसार अलग-अलग होती हैं। ऐसा इस कारण होता है कि यह दिव्य शक्ति जो गुरू सियाग की आध्यात्मिक शक्ति के नियंत्रण में कार्य रही होती है वह यह अच्छी तरह से जानती है कि साधक को शारीरिक एवं मानसिक रोगों से छुटकारा दिलाने एवं उसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढाने के लिये कौनसी विशेष मुद्रायें/क्रियायें आवश्यक हैं। इस कारण सिद्धयोग में यौगिक मुद्रायें अन्य योग विद्यालय में इच्छानुसार वांछित प्रभाव लाने के लिये किसी क्रम विशेष में व्यवस्थित विधि द्वारा कराई जाने वाली यौगिक क्रियाओं के अनुसार नहीं होती हैं। सिद्धयोग में लोगों को समूह में ध्यान करते देखकर एक निरीक्षणकर्ता यह देखकर अचम्भित हो जाता है कि भाग लेने वाले लगभग प्रत्येक व्यक्ति की योगिक मुद्रायें भिन्न-भिन्न हैं। बहुत से साधक ध्यान के दौरान उमंग एवं खुशी अनुभव करते हैं जो उन्होंने पहले कभी भी महसूस नहीं की हुई होती है।